आपकी ‘जीरो लॉस’ की थियरी को पब्लिक ज्यादा ‘टॉलरेट’ नहीं करेगी प्रधानसेवक जी!

व्यालोक पाठक

आज सीबीआई की विशेष अदालत का 2जी घोटाले पर दिया गया फैसला, फैसला मात्र न होकर सरकार के मुंह पर एक झन्नाटेदार तमाचा है. इस मामले में केंद्र सरकार की दशा उस केजरीवाल से भी गयी-बीती हो गयी है, जिनके बारे में मशहूर है कि वह आरोप लगाना मात्र जानते हैं. एक लाख पचहत्तर हज़ार करोड़ के घोटाले में एक को भी सजा नहीं, एक दिन की भी नहीं, एक रुपए की नहीं. मतलब, सरकार पिछले चार साल से हवा में ही तीर भांज रही थी. उसके पहले के तीन साल जब भाजपा विपक्ष में थी, तो उसने एक झूठ पर अपने आरोपों का महल खड़ा किया, ऐसा कहा जाए तो क्या अतिशयोक्ति होगी?

पत्रकार एवं टिप्पणीकार व्यालोक पाठक

2014 के आमचुनाव की याद करें, तो भाजपा ने ‘भ्रष्टाचार से लड़ाई को मुख्य मुद्दा बनाया था. कांग्रेस के अकल्पनीय भ्रष्टाचार के नमूनों की जब भी बात होती थी, तो 2जी घोटाले का मामला ज़रूर उठता था. ए राजा और कनिमोई को इसकी वजह से भला-बुरा भी कहा जाता था. कनिमोई तो कुछ समय तक जेल में भी रह कर आयी थीं. एक बडा मज़ेदार संयोग यह है कि एक दिन पहले कोयला घोटाले में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को तीन साल (!) की सज़ा हुई, और आज स्पेक्ट्रम घोटाले के सभी आरोपित पाक-साफ सिद्ध हो गए.

इस लेखक का मानना है कि 2014 में भाजपा हिंदुत्व और भ्रष्टाचार की दोधारी तलवार लेकर कांग्रेस के खिलाफ उतरी थी. नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी के तौर पर उसको एक ऐसा नायक भी मिला था, जिसकी इन दोनों ही कसौटियों पर छवि बेदाग थी. जनता कांग्रेस के स्पष्ट तुष्टीकरण औऱ बेलगाम भ्रष्टाचार (हालांकि, जिस तरह 2जी में हुआ, उसी तरह अगर बाक़ी मामलों में हुआ, तो क्या होगा?) के साये तले त्रस्त थी, त्राहि-त्राहि कर रही थी. उसी आसपास केजरीवाल, बाबा रामदेव, अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल आंदोलन भी खड़ा हुआ और देश में एक माहौल बना.

प्रधानसेवक नरेंद्र मोदी ने ‘अबकी बार, भ्रष्टाचार पर वार’ के दमदार नारे के साथ जनता का आशीर्वाद मांगा और जनता ने भी उनको निराश नहीं किया. अपना प्यार उलीच दिया, झोली भर दी. जनता ने इंतजार भी किया, लेकिन अब तक उसे परिणाम कुछ खास नहीं दिख रहे हैं. दिल्ली और बिहार को अगर हम सीधी चेतावनी और गुजरात को रूठन की संभावना मानें तो ज़ाहिर है कि जनता का धैर्य अब चुक रहा है. अगर ‘नो वन किल्ड जेसिका’ की तरह 2जी में भी किसी तरह का घोटाला नहीं है, या सरकार यह साबित नहीं कर पायी कि किसी भी तरह दो संबंधित पक्षों में पैसे का लेनदेन हुआ था या किसी तरह का भ्रष्टाचार हुआ था, तो यह नाकामी किसके खाते में जाएगी? क्या सरकार इतने दिनों से भाड़ झोंक रही थी?

जिन पाठकों की याददाश्त थोड़ी कमज़ोर है, वे याद करें कि एक लाइन में कहना हो तो टूजी घोटाला बिना किसी कसौटी के और औने-पौने दामों में दूरसंचार स्पेक्ट्रम बेचने का घोटाला था. तत्कालीन दूसरसंचार मंत्री ए राजा को भी इसकी आंच झेलनी पड़ी और उनके सहित कनिमोई, कई दूरसंचार कंपनियां भी शक के घेरे में थीं. मशहूर वकील और मनमोहन सरकाऱ में एचआरडी मिनिस्टर रह चुके कपिल सिब्बल भी तभी अपना मशहूर ‘ज़ीरो लॉस थियरी’ लाए थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि सरकार को किसी भी तरह का घाटा नहीं हुआ है.

आज सीबीआई की विशेष अदालत ने सिब्बल की बात की पुष्टि की है और वह गरजदार सुर में तत्कीलीन कैग विनोद राय और वर्तमान सरकार पर बदनाम करने का आरोप लगा रहे हैं. मनमोहन सिंह ने भी तत्काल ही सरकार को दोषी बताकर अपना दामन पाक-साफ कर लिया है.

हमारी न्यायपालिका मुकदमों के बोझ से दबी है, इसकी कमियों औऱ खामियों की भी चर्चा समय-समय पर होती है, भले ही कोई मुखर तौर पर उसे न बोले. (आज एक और मज़ेदार संयोग है कि न्यायिक प्रक्रिया की अवमानना के दोषी पर्व न्यायाधीश एस सी करनन भी आज ही कोलकाता की जेल से रिहा हुए हैं और उन्होंने न्यायिक प्रक्रिया में जातिगत भेदभाव के खिलाफ लड़ाई जारी रखने की बात कही है). सलमान खान की कार फुटपाथ पर बिना ड्राइवर के चढ़ सकती है, हिरण मारने के मामले में वो अब तक छुट्टा घूम रहे हैं, रातोंरात गवाह बदल जाते हैं, तो इस देश के सामान्य आदमी का भरोसा न्याय पर से उठता है.

देर से ही सही, पर जेसिका हत्याकांड में न्याय हो या तलवार दंपति की रिहाई, कुछ फैसले ऐसे होते हैं जिनसे जनता अंतिम उपाय न्यायालय को ही मानने लगती है. हाल-फिलहाल कोर्टों की सक्रियता देखकर भी कई को विधायिका-न्यायपालिका के बीच खटास के संकेत तक मिलने लगे थे. हालांकि, इससे सबसे बड़ा नुकसान अगर किसी को हुआ है, तो वह हैं- प्रधानमंत्री नरेंद्रभाई दामोदरदास मोदी को. यह फैसला उनकी साख पर सवाल उठाएगा, जिन्हें 2015 में पांच राज्यों की जनता से विधानसभा के लिए और 2019 में पूरे देश से वोट मांगना है.

हिंदुत्व के मसले पर मोदी की दो कदम आगे, तीन कदम पीछे वाली नीति से उनका हार्डकोर वोटर खफा है, भ्रष्टाचार के मसले पर बस यही गनीमत है कि इस सरकार पर कोई दाग नहीं अब तक, हालांकि वाड्रा से लेकर कोड़ा तक सभी हाइ-प्रोफाइल मामलों में कुछ न होना, बहुत कम होना या आरोपितों का बेदाग छूटना मोदी सरकार के लिए परेशानी का सबब है.

गालिब का शेर उधार लें तो, ‘काबे किस मुंह से जाओगे, मियां?’ प्रधानसेवक जान लें कि उनके पास बस एक साल बचा है औऱ चुनौतियां बेशुमार हैं. उनका विकास का झुनझुना भी लोग नहीं थाम रहें. राजनीति में वे खुद माहिर हैं, इसलिए उनको कोई सलाह देना उचित नहीं. हां, कई बार सत्ता के पाये इतने ऊंचे होते हैं कि नीचे से ज़मीन खिसकने का पता नहीं चलता, उसके लिए सावधान!

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