हम क्यों श्रीदेवी को इतनी शिद्दत से याद कर रहे हैं

पुष्यमित्र

हर रोज सुबह उठने के बाद एक बार मोबाइल का नोटिफिकेशन चेक कर लेना एक आदत सी बन गयी है. कल भी वही किया और इसका खामियाजा उठाना पड़ा. राज झा सर ने श्रीदेवी की सदमा वाली तसवीर पोस्ट की थी और किसी से सवाल किया था कि क्या यह सच है? नीचे कमेंट बॉक्स में कई RIP थे.

अभी हफ्ता भी शायद ही गुजरा हो. किसी चैनल पर मिस्टर इंडिया आ रहा था. इस फिल्म को मैं अक्सर देखने बैठ जाता हूं. श्रीदेवी के लिए नहीं, न ही अनिल कपूर के लिए. इसकी डीटेलिंग के लिए. शेखर कपूर की यह पहली फिल्म थी. और इस पहली फिल्म में उन्होंने पर्दे पर जिन बारीकियों को उकेरा है वह आज भी चकित कर जाता है. चाहे वह अखबार के दफ्तर का सीन हो या अनाथालय बना नायक का घर. एक-एक छोटी चीज वहां ऐसी नजर आती है कि पूरा दृश्य रियल लगने लगता है. फिल्म के सेट पर किसी भी दृश्य को रियल बनाना बहुत बारीक काम होता है.

तो खैर, फिल्म देखते-देखते एक दृश्य में अचानक मेरी आंखों से धरासार आंसू बहने लगे. वह दृश्य था, जब बच्चे तीन-चार दिन से भूखे थे, यह खबर नायिका श्रीदेवी को मिली थी और वह नायिका जो इन बच्चों से सख्त नफरत करती थी, उस रोज अचानक ऐसी द्रवित हुई कि उन बच्चों के लिए ढेर सारा खाना लेकर आ गयी. अब उसे खाना भी खिलाना था, अपनी भावनात्मक कमजोरी से भी बचना था और उन भूखे बच्चों का मान भी रखना था. और श्रीदेवी ने वह दृश्य इतनी खूबसूरती से किया कि मुझे रहा नहीं गया. देर तक रोता रहा, पास में बैठी उपमा चकित और परेशान थी. उसने मुझे कभी इस तरह रोते नहीं देखा था.

मेरे साथ कई बार ऐसा होता है. आनंद और सदमा के कई दृश्य मुझे रुला देते हैं. सदमा का वह आखिरी दृश्य जिसका जिक्र कल कई लोगों ने किया. वह श्रीदेवी की अभिनय की पराकाष्ठा थी. एक भावुक दृश्य में निर्विकार रह जाना. जैसे उसे कुछ पता ही न हो कि सामने वाला कौन है, क्या कर रहा है. हालांकि इस पूरी फिल्म में श्रीदेवी ने जिस चरित्र को परदे पर उतारा है, वह भी अपनेआप में मानवीय अनुभवों से परे है. एक युवती का बचपन में लौट जाना और बच्चों जैसी हरकत करना. आप हर फ्रेम में एक बच्ची को देखते हैं, जो एक युवा स्त्री के शरीर में जिंदा है, हरकतें कर रही है. मगर आखिरी दृश्य में श्रीदेवी के चेहरे पर जो भाव उभरते हैं, उसकी तुलना किससे की जाये, कहना मुश्किल हो जाता है.

कल दिन भर फेसबुक का न्यूज फीड स्क्रॉल करता रहा. लोगों के पोस्ट पढ़ता रहा, ‘श्री’ की अलग-अलग मुद्राओं में तसवीरें देखता रहा. औपचारिक किस्म के एक-दो पोस्ट भी किये, बाद में लगा कि कुछ लिखने से बेहतर है, लोगों को पढ़ना. लोगों ने कितना डूब कर उन्हें याद किया. विविध भारती के युनूस भाई, टीवी वाले मित्र देवांशु झा, और भी कई मित्र. युनूस भाई की मिस्टर इंडिया वाली तसवीर जिसपर लिखा था ‘सॉरी दीदी, अब हम नहीं करेंगे शोर’, और उनका कवर फोटो, जिसमें पटरी पर कान लगाकर श्रीदेवी और कमल हसन आवाज सुन रहे हैं. इन दोनों ने एक बार फिर से रुला दिया.

अफसोस हुआ कि किसी ने यह याद नहीं किया कि कभी श्रीदेवी को स्विच ऑन, स्विच ऑफ एक्ट्रेस कहा जाता था. वैसी बात सिर्फ एक ही अभिनेता में नजर आते है, गोविंदा में. वह भी सिर्फ कॉमेडी टाइमिंग के लिए. सदमा और लम्हे जैसे सीरियस किरदारों के लिए नहीं, इंसान ने नागिन बन जाने के लिए नहीं. मुझे अक्सर लगता था कि श्रीदेवी कुछ भी बन सकती है, कुछ भी कर सकती है. उसने इंग्लिश-विंग्लिश में भी मुझे इसी तरह रुलाया था.

मगर शाम आते-आते फेसबुक का रंग बदलने लगा. लोग श्रीदेवी को याद करने वालों को ट्रोल करने लगे. कहा जाने लगा कि हम बिहार में नौ बच्चों की मौत और केरल में भूखे व्यक्ति की हत्या को लेकर क्यों इतनी बातें नहीं कर रहे हैं. उन्हें क्यों याद नहीं कर रहे. श्रीदेवी एक नाचने-गाने वाली भर है. उसके लिए भावनाओं का इतना उढेलना जरूरी है क्या?

मगर ट्रोल करने वालों ने यह नहीं सोचा कि ऐसा क्यों हुआ? क्यों इस असामयिक मृत्यु की खबर पाते ही लोग इतने भावुक हो गये. मुझे याद है, इसी तरह लोग राजेश खन्ना की मृत्यु के बाद भावुक हो गये थे. इन लोगों में कई ऐसे थे, जो खांटी एक्टिविस्ट हैं, उन्हें भी इस मौत से सदमा पहुंचा…

यह ठीक है कि बिहार में जो सड़क हादसा हुआ है, वह कहीं बड़ा हादसा है, केरल की हत्या मानवता तो झकझोर देने वाली घटना है. ऐसा नहीं है कि लोग इन पर बात नहीं कर रहे. मगर इसका अर्थ कतई नहीं है कि श्रीदेवी की मृत्यु के बाद जो भावोद्गार उमड़ा वह गलत था. मुझे तो वह स्वभाविक लगता है.

सत्तर के दशक के बाद की पीढ़ी को जितना साहित्य और धार्मिक कथाओं ने नहीं गढ़ा, उसके कहीं अधिक फिल्मों ने गढ़ा है. इनमें दीवार, आनंद, शोले, सदमा, मिस्टर इंडिया, अराधना से लेकर मैंने प्यार किया, दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे, लगान और बाद में मुन्ना भाई एमबीबीएस, चक दे इंडिया, थ्री इडियेट्स, दिल चाहता है जैसी सैकड़ों फिल्मों हैं.

इन फिल्मों के चरित्रों ने हमारे दिल को वहां जाकर छुआ, जहां किसी की पहुंच नहीं थी. पहुंचना आसान भी नहीं था. हम गुनाहों का देवता के सुधा और चंदर नहीं, ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे’ के राज और सिमरन के अधिक करीब हैं. आनंद के चरित्र ने न जाने कितने लोगों को प्रभावित और वैसा बनने के लिए प्रेरित किया होगा कहना मुश्किल है. उसी तरह दीवार के अमिताभ के चरित्र ने और हाल के दिनों में थ्री इडियेट्स के आमिर खान के चरित्र ने.

यही वजह है कि फिल्में, उनके चरित्र और अभिनेता हमारे दिल के करीब हैं. फिल्मी गानों में हम अपने सुख और दुख को, मुहब्बत और बिछड़न को तलाशते हैं, अभिव्यक्त करते हैं. इसलिए श्रीदेवी जैसा सितारा जब टूटता है, तो हम रोते हैं. यह हमारा व्यक्तिगत दुख है. हमने जो पाया था, उसे वापस कर रहे हैं. जाने वाले को शुक्रिया कर रहे हैं. कि आपने हमें अधिक सुंदर और संवेदनशील बनाया.

इसलिए हम केरल के उस युवक की हत्या पर कम रोते हैं, क्योंकि केरल के युवक की घटना हमें झकझोरती है, गुस्सा दिलाती है, मगर हमारा कोई पर्सनल अटैचमेंट नहीं है. हम चाहते हैं कि ऐसी घटनाएं बंद होनी चाहिये, दुनिया बदलनी चाहिए. हम उस युवक में अपने किसी परिचित की छवि ढूंढते हैं, किसी अनुभव को तलाशते हैं. मगर एक क्षण के बाद, कुछ देर गुस्सा जाहिर करने के बाद हम उस अनुभव से मुक्त हो जाते हैं. मगर श्रीदेवी हमें पल-पल याद आती है. जूली से लेकर मॉम तक. एक-एक छवि, एक-एक अटैचमेंट. ऐसा लगता है कि अपने किसी मित्र, परिचित या रिश्तेदार को हमने खो दिया है.

मुमकिन है, मेरी बात गलत हो. हो सकता है, मैं पोलिटिकली करैक्ट नहीं होऊं. मगर मुझे यही लगता है. मुझे लगता है कि किसी दो मौतों की तुलना नहीं होनी चाहिए और किसी को इस बात का ताना नहीं दिया जाना चाहिए कि तुम इस मामले में जितने भावुक हो उस मामले में क्यों नहीं हुए. क्योंकि, यह तो दिल का मामला है.

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