आजाद भारत के पहले नव वर्ष में क्यों गिरा दी गयी थीं दो हजार आदिवासियों की लाशें?

आज हैप्पी न्यू इयर के मौके पर क्या आप आजाद भारत के पहले नव वर्ष की कहानी सुनना चाहेंगे? अगर हां तो आपको झारखंड के खरसावां चलना पड़ेगा… जहां आज ही के दिन ऐसा कांड हुआ था जो जलियावाला बाग कांड से भी अधिक नृशंस था. और हैरत की बात है कि यह कांड किसी विदेशी शासक ने नहीं बल्कि आजाद भारत की सरकार ने किया था. हाट में पहुंचे दसियों हजार निहत्थे आदिवासियों पर गोली चलायी गयी थी और गैर सरकारी आंकड़ों के हिसाब से दो हजार आदिवासियों को मार डाला गया था. आजाद भारत के इतिहास के मानक किताबों में शायद ही आपको यह कहानी मिले…

पुष्यमित्र

झारखंड का एक जिला है सरायकेला-खरसावां. जमशेदपुर शहर से सटा हुआ. ओड़िशा की सीमा पर. आजादी के वक्त सरायकेला-खरसावां एक देसी रियासत हुआ करता था. यह बिहार की सीमा के अंतर्गत आने वाला एकमात्र देसी रियासत था. जब इस रियासत के भारत में विलय की बात उठी तो यह बात भी उठी कि इसे किस राज्य में मिलाया जाये. ओड़िशा सरकार की इच्छा थी कि यह ओड़िशा राज्य में शामिल हो, क्योंकि वहां के शासक ओड़िया भाषी थे, सरदार पटेल की भी यही इच्छा था. मगर वहां की बहुसंख्यक आदिवासी आबादी बिहार के साथ रहना चाहती थी. क्योंकि वे आजादी के पहले से ही झारखंड राज्य के लिए संघर्षरत थे और जानते थे कि अगर झारखंड में शामिल होना है तो बिहार में ही रहना चाहिये. डॉ. राजेंद्र प्रसाद भी सरायकेला-खरसावां के बिहार में विलय के पक्षधर थे.

इस बात को लेकर सरायकेला-खरसावां के आदिवासी समुदाय और ओड़िशा सरकार के बीच अक्सर तनातनी का माहौल रहता है. बिहार के साथ अपनी सॉलिडिटरी प्रदर्शित करने के लिए आज ही के दिन आदिवासियों का मसीहा कहे जाने वाले मरांग गोमके जयपाल सिंह के नेतृत्व में खरसावां हाट मैदान में एक विशाल आम सभा का आयोजन किया गया. जमशेदपुर, रांची, तमाड़ व कोल्हान समेत उड़ीसा के कई जिलों से यहां हजारों आदिवासी जनता एकत्रित हुई. यहां आए बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे सभी पारंपरिक हथियारों से लैस थे.

इन आदिवासियों द्वारा सरायकेला व खरसावां को बिहार में बनाए रखने संबंधी गगनभेदी नारे लगाए जा रहे थे. इस बीच अचानक भीड़ में काफी इजाफा हुआ, मरांग गोमके के न पहुंचने के कारण भीड़ अनियंत्रित हो गयी थी, तभी खबर मिली कि किसी कारणवश मरांग गोमके जनसभा में शामिल नहीं हो सकते हैं. इसी दौरान लोगों ने खरसावां रियासत के तत्कालीन राजा रामचन्द्र सिंहदेव को एक ज्ञापन सौंपने का निर्णय लिया जिसमें खरसावां व सरायकेला रियासत को उड़ीसा में शामिल करने का विरोध किया गया था.

आगे बढ़ी भीड़ को पुलिस ने रोकना चाहा तो एक आदोलनकारी ने कमांडेंट की बांह पर तीर चला दिया. इससे पुलिस जवान उग्र हो गए और अचानक उनकी मशीनगनों ने आग उगलना शुरू कर दिया. मशीनगन और बंदूकों की आवाज से खरसावां दहल उठा. देखते ही देखते खरसावां हाट मैदान आदिवासियों की लाशों के बोझ तले खरसावां शहीद स्थल में तब्दील हो गया. इस गोलीकांड में मरने वालों की संख्या को दर्शाने वाला कोई दस्तावेज नहीं है.

यहां अब हर साल पहुंचते हैं झारखंड के मुख्यमंत्री

सरकारी आंकड़ों के हिसाब से उस गोलीकांड में सौ से अधिक लोगों की मौत हुई, मगर सरायकेला रियासत के तत्कालीन राजा पीके महादेवसिंह की पुस्तक द मेमोरी ऑफ बारगेन एरा में मृतकों की संख्या दो हजार से अधिक बतायी गयी है. आप सोच सकते हैं कि आजाद भारत में भी हमारी सरकार आदिवासियों के प्रति कितनी असंवेदनशील थी. समाजसेवी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया ने इसकी तुलना जलियावाला बाग के गोलीकांड से की थी.

इस गोली कांड की घटना हजार में से एक भारतीय को भी शायद ही मालूम हो. इस पर कोई मुकम्मल कार्रवाई तक नहीं हुई. मामले को रफा-दफा ही करने की कोशिश की गयी. हां, ये बात अलग है कि इन दो हजार लोगों ने जान गंवा कर अपने इलाके के बिहार में विलय के मसले को पक्का कर दिया.

इसे झाऱखंड आंदोलन का सबसे बड़ा बलिदान माना जाता है. झारखंड राज्य बनने पर उन शहीदों को याद करने की कोशिश की जाती है. वहां एक शहीद स्मारक भी बना है. जहां अब झारखंड के मुख्यमंत्रियों ने जाकर शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित करना शुरू किया है. लोग तो हर साल उन्हें अपने तरीके से याद करते ही हैं.

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