आज के दिन क्यों तिल, गुड़ और खिचड़ी खाते हैं पूरे देश के लोग #makarsankranti

मकर संक्रांति, लोहड़ी और पोंगल की बात तो सबको मालूम है, आज के ही दिन नेपाल में माघे संक्रांति और बांग्लादेश में सकरेन मनाये जाने का भी जिक्र हो रहा है. मगर क्या आप जानते हैं कि एमपी, छत्तीसगढ़ और गुजरात के आदिवासी भी इस दिन को अलग तरह से मनाते हैं और पूरे दक्षिणी एशिया में सूर्य के मकर राशि से वापसी के पर्व को एक चीज जोड़ती है वह है इस दिन का खास खान-पान. गुड़, तिल और खिचड़ी का भोजन. आदिवासियों के पारंपरिक ज्ञान पर शोध करने वाले डॉ. दीपक आचार्य ने इस विषय पर एक विस्तृत आलेख लिखा है कि आखिर आज के दिन गुड़, तिल और खिचड़ी खाने पर इतना जोर क्यों दिया जाता है, क्या इसका कोई स्वास्थ्य से जुड़ा महत्व है. यह खास आलेख आपके लिए…

डॉ. दीपक आचार्य

दक्षिण गुजरात में एक जिला है डांग, यहां शत-प्रतिशत वनवासी आबादी बसी हुई है और यहां आमजनों के बीच मकर संक्रांति को लेकर जितनी जानकारी है शायद ही देश के किसी अन्य हिस्से में इस विषय को लेकर इतनी जानकारी एक साथ एक जगह पर इतने सारे लोगों को हो. मकर संक्रांति की बात की जाए तो वनवासी बेहद उत्साहित नजर आते हैं. बुजुर्ग वनवासियों के अनुसार इसी दिन से सूर्य का उत्तर दिशा में प्रवेश होता है और इस दौरान सूर्य की किरणें तेजवान होने लगती हैं और सूर्य प्रकाश पृथ्वी पर समस्त जीवों को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है. ज्यों-ज्यों सूर्य प्रवेश उत्तर दिशा की ओर अग्रसर होता जाता है वैसे-वैसे हमारे जीवन में भी सकारात्मकता के भाव आते जाते हैं, सूर्य की इस अवस्था को उत्तरायण के नाम से भी जाना जाता है. यहां के वनवासी हर्बल जानकारों के अनुसार मकर संक्रांति यानी उत्तरायण में तिल का सेवन अत्यंत जरूरी है.

उसी तरह मध्यप्रदेश के पातालकोट इलाके में रहने वाले आदिवासी इस रोज तिल से बने व्यंजन तैयार करते हैं जिनमें तिल की पट्टियां, लड्डू, भूनी हुयी तिल, तिल पापड़ आदि मुख्य होते हैं. अलग-अलग रूपों में तिल, चावल, उड़द की दाल एवं गुड़ खाना बेहद इस दौरान हितकर माना जाता है. इन तमाम सामग्रियों में सबसे ज्यादा महत्व तिल को दिया जाता है.

इनका मानना है कि इस दिन तिल अवश्य खाना चाहिए. सच ही है, इस दिन तिल के महत्व के कारण मकर संक्रांति पर्व को तिल संक्राति के नाम से भी पुकारा जाता है. तिल और गुड़ पौष्टिक होने के साथ ही साथ शरीर को गर्म रखने वाले भी होते हैं. वनवासियों से प्राप्त एक जानकारी के अनुसार शीतकाल सूक्ष्मजीवों के संक्रमण का काल होता है और बसन्त के आते-आते इनमें कमी तो आ जाती है लेकिन मकर संक्रांति के दौरान तिल और गुड़ जैसे पदार्थों के सेवन से शरीर को आंततिक गरमाहट मिलती है जो सूक्ष्मजीवों को जड़ से उखाड़ फेंकने में सक्षम होते हैं.

इस दौरान चावल व मूंग की दाल मिला कर खिचड़ी और दाल पेजा बनाना भी इनकी परंपरा का एक हिस्सा है. जहां एक ओर मसालों में पकी खिचड़ी बेहद स्वादिष्ट, पाचक व ऊर्जा से भरपूर होती है वहीं दालपेजा अरहर और उड़द की दालों का मिश्रण होता है. दालों के मिश्रण से बना ये आहार कई मायनों में खास होता है. इस व्यंजन के बेहद औषधीय गुण हैं. बुजुर्ग जानकारों के अनुसार उड़द के बीजों से प्राप्त होने वाली दाल बेहद पौष्टिक होती है. आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि छिल्कों वाली उड़द की दाल में विटामिन, खनिज लवण तो खूब पाए जाते हैं और ख़ास बात ये कि इसमे कोलेस्ट्रॉल नगण्य मात्रा में होता है. आदिवासी अंचलों में इसे बतौर औषधि कई हर्बल नुस्खों में उपयोग में लाया जाता है.

मकर संक्रांति में तिल खाने का शास्त्रीय आधार

शास्त्रों में लिखा है कि माघ मास में जो व्यक्ति प्रतिदिन विष्णु भगवान की पूजा तिल से करता है और तिल का सेवन करता है, उसके कई जन्मों के पाप कट जाते हैं. अगर व्यक्ति तिल का सेवन नहीं कर पाता है तो सिर्फ तिल-तिल जप करने से भी पुण्य की प्राप्ति होती है.

तिल का महत्व मकर संक्रांति में इस कारण भी है कि सूर्य देवता धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं. मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं, जो सूर्य के पुत्र होने के बावजूद सूर्य से शत्रु भाव रखते हैं. अत: शनि देव के घर में सूर्य की उपस्थिति के दौरान शनि उन्हें कष्ट न दें, इसलिए तिल का दान व सेवन मकर संक्रांति में किया जाता है. चावल, गुड़ एवं उड़द खाने का धार्मिक आधार यह है कि इस समय ये फसलें तैयार होकर घर में आती हैं. इन फसलों को सूर्य देवता को अर्पित करके उन्हें धन्यवाद दिया जाता है कि हे देव! आपकी कृपा से यह फसल प्राप्त हुई है. अत: पहले आप इसे ग्रहण करें तत्पश्चात प्रसाद स्वरूप में हमें प्रदान करें, जो हमारे शरीर को उष्मा, बल और पुष्टता प्रदान करे.

मकर संक्रांति पर विभिन्न राज्यों का खान-पान

बिहार तथा उत्तर प्रदेश

बिहार एवं उत्तर प्रदेश में खान-पान लगभग एक जैसा होता है. दोनों ही प्रांत में इस दिन अगहनी धान से प्राप्त चावल और उड़द की दाल से खिचड़ी बनाई जाती है. कुल देवता को इसका भोग लगाया जाता है. लोग एक-दूसरे के घर खिचड़ी के साथ विभिन्न प्रकार के अन्य व्यंजनों का आदान-प्रदान करते हैं. बिहार और उत्तर प्रदेश के लोग मकर संक्राति को खिचड़ी पर्व के नाम से भी पुकारते हैं. इस प्रांत में मकर संक्राति के दिन लोग चूड़ा-दही, गुड़ एवं तिल के लड्डू भी खाते हैं. चूड़े एवं मूढ़ी की लाई भी बनाई जाती है.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में मकर संक्रांति के दिन बिहार और उत्तर प्रदेश की ही तरह खिचड़ी और तिल खाने की परम्परा है. यहां के लोग इस दिन गुजिया भी बनाते हैं.

दक्षिण भारत
दक्षिण भारतीय प्रांतों में मकर संक्राति के दिन गुड़, चावल एवं दाल से पोंगल बनाया जाता है. विभिन्न प्रकार की कच्ची सब्जियों को लेकर मिश्रित सब्ज़ी बनाई जाती है. इन्हें सूर्य देव को अर्पित करने के पश्चात सभी लोग प्रसाद रूप में इसे ग्रहण करते हैं. इस दिन गन्ना खाने की भी परम्परा है.

पंजाब एवं हरियाणा
पंजाब एवं हरियाणा में इस पर्व में विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में मक्के की रोटी एवं सरसों के साग को विशेष तौर पर शामिल किया जाता है. इस दिन पंजाब एवं हरियाणा के लोगों में तिलकूट, रेवड़ी और गजक खाने की भी परम्परा है. मक्के का लावा, मूंगफली एवं मिठाईयां भी लोग खाते हैं.

वनवासियों के लिए खास है मकर संक्रांति

भारतीय वनांचलों में रह रहे आदिवासियों की सदियों पुरानी परंपराओं और सामाजिक कार्यक्रमों में त्योहारों का बेहद महत्व माना जाता है. वनवासियों ने प्रकृति को हमेशा से देवतुल्य माना है. चाहे पेड़-पौधे हों या ब्रह्मांड, इसके हर एक अंग को किसी ना किसी तरह अपनी आस्थाओं से जोड़कर वनवासियों ने प्रकृति को सदैव अपने-अपने तरीकों से अपनाया है, माना है. मकर संक्रांति का त्योहार जहां सारे हिन्दुस्तान में अपनी-अपनी तरह से मनाया जाता है, वहीं दूरस्थ वनों और ग्रामीण इलाकों में भी इसकी अपनी महत्ता है. जहां एक ओर भारत में इसे सूर्य देव के आराध्य से जोड़कर देखा जाता है वहीं डांग जैसे सुदूर इलाकों में इस त्यौहार को मानसिक सुख शांति, फसल कटाई और स्वास्थ्य बेहतरी की दृष्टि से अति उत्तम माना जाता है. मकर संक्रांति का वनवासी जीवनशैली में आध्यात्मिक महत्व के साथ-साथ धार्मिक महत्व भी काफी है.

डांग के आदिवासियों की मान्यता-मकर संक्रांति के दिन से होती है सकारात्मकता की शुरुआत

गुजरात के डांग जिले के सबसे बुजुर्ग हर्बल जानकार और वैद्य स्व जानू काका अक्सर कहा करते थे कि मकर संक्रांति हर मनुष्य के लिए बेहद महत्व का त्यौहार है. इनके अनुसार दक्षिणायन के पूर्ण होने के बाद अगले पंद्रह दिनों में ज्यों-ज्यों सूर्य उत्तर दिशा की ओर अग्रसर होता जाता है त्यों-त्यों मानव शरीर और मानव के इर्द गिर्द घटनाओं में सकारात्मकता आते जाती है और इस दौर में यदि नए व्यवसाय या कार्य की शुरुआत हो तो इन्हें सफलता मिलना लगभग तय होता है. डांग में कुकना, गामित, भीखा, वरली और कुनबी वनवासी अपनी पारंपरिक जीवन शैली में उत्तरायण को विशेष तौर से आज भी अपनाए हुए हैं. इन वनवासियों के लिए आज भी अपनी सामाजिक परंपरा अति-महत्वपूर्ण है.

जहां आम रूप से मकर संक्रांति नयी ऋतु के आगमन का संदेश है वहीं वनवासियों के लिए यह समय पिछली ऋतु में बोयी फसलों की कटाई से जोड़ कर देखा जाता है. वनवासियों की मान्यता के अनुसार यह काल अंधकार से उजाले की तरफ जाने की तरह होता है, सूर्य की रौशनी ज्यादा समय तक धरती पर पड़ती है, रातें अपेक्षाकृत छोटी हो जाती है. नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर इंगित करने वाले इस त्यौहार पर गांव के बुजुर्ग धरती मां, पर्वत और प्रकृति की पूजा कर पिछली फसल के लिए धन्यवाद देते हैं और फसल कटाई का कार्य शुरू करते हैं. मकर संक्रांति के समय वनवासियों का यह विशेष प्रकृति प्रेम एक मिसाल की तरह है. गांव के सबसे ज्यादा सम्माननीय व्यक्ति को इस पूजा अर्चना का दायित्व दिया जाता है. डांग-गुजरात में देव-स्वरूप माने जाने वाले जड़ी-बूटियों के जानकार जिन्हें भगत कहा जाता है, वे इस कार्य का संपादन करते हैं.

इस पूरे पूजन के दौरान जो सबसे खास बात समझ पड़ती है, वह पूजन स्थल का शांतिपूर्ण माहौल. वहां पर उपस्थित सभी लोगों डूंगर देव की पूजन अर्चना में तत्परता से पूजन करते हैं और अंत में उपयोग में लाए अनाज को डूंगर देव का आशीर्वाद माना जाता है, इन अनाज का कुछ हिस्सा लेकर एक अन्य सूती कपड़ें में डाल दिया जाता है और बाद में इस अनाज को ये लोग अपने अपने घरों में लाकर पूर्व से संग्रहित अनाज के साथ मिला लेते है. इनका मानना है कि ऐसा करने से साल भर घर में अनाज की कमी नही होती है. पूजन समाप्ति के बाद लोग घरों में पहुंचकर तिल और मूंगफली से बनी चिक्कियों और लड्डूओं का भोग अपने-अपने आराध्य देव को कराते हैं और बाद में परिवार के सभी सदस्य मिलकर इनका स्वाद लेते हैं. डूंगर देव की आराधना के अलावा इस त्यौहार का विशेष महत्व सेहत बेहतरी को लेकर होता है.

पातालकोट के आदिवासियों की मान्यता-रोगहारक होती है उत्तरायण सूर्य की किरणें

चलिए अब चर्चा मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले की पातालकोट घाटी वनवासियों की भी कर ली जाए. पातालकोट एक अलग दुनिया है, विकसित समाज की मुख्यधारा से कोसों दूर ये आदिवासी आज भी प्रकृति को अपना सबसे बड़ा देव मानते हैं. धरातल से 3000 फीट की गहराई में गोंड और भारिया जनजाति के वनवासी इस घाटी में वास करते हैं. गौत्र, गृह-नक्षत्रों के बारे में इनकी समझ दुनिया से अलग है, जड़ी-बूटियों का भी इनकी जीवनशैली में एक महत्वपूर्ण स्थान है. मकर संक्रांति को ये आदिवासी अपने नजरिये से बड़ा ही महत्वपूर्ण मानते हैं. जानकारों के अनुसार इस त्योहार का सीधा सम्बन्ध प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और कृषि से है जो कि जीवन का आधार हैं.

मकर संक्रांति से एक दिन पहले शाम होते ही पातालकोट के हर्बल जानकार (जिन्हें भुमका कहा जाता है) अपने घर- आंगन के चारों तरफ़ गौ-मूत्र का छिड़काव कर परिवेश शुद्धि की प्रक्रिया करते हैं और फिर घर में रखी सारी वनौषधियों को घर के छज्जे पर, खुले आसमान में अगले 8 दिनों के लिए रख देते हैं. इनका मानना है कि शीत ऋतु की विदाई के साथ बसंत ऋतु के आगमन यानी उत्तरायण काल में सूर्य की किरणें रोगहारक होती हैं और ज्यों-ज्यों सूर्य की चमक तेज़ होती जाती है, इसकी किरणों में रोगों को हर लेने की क्षमता होती जाती है. इन किरणों का असर त्वचा के रोग को भी ठीक कर सकता है.

इन आदिवासियों के अनुसार अपनी किरणों से सूर्य इन जड़ी-बूटियों में अमृत का संचार कर देता है और ये जड़ी बूटियां फिर रोगोपचार के लिए उपयोग में लायी जाती है. देर रात ये आदिवासी अपने आंगन में अलाव जलाकर नाच गाना भी करते हैं और वाद्य-यंत्र जैसे ढोल, टिमकी, शहनाई, टिमगा आदि बजाए जाते हैं और मकर संक्रांति के सूर्योदय का इंतज़ार करते हैं.

घाटी के वनवासी मानते हैं कि इस दिन से ही शीत ऋतु की विदाई हो जाती है और बसन्त का आगमन हो जाता है और बसन्त स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए सबसे उत्तम काल माना जाता है. इस दिन घाटी के तमाम लोग झरनों और पोखरों में जाकर सूर्यदेव की उपासना के साथ स्नान करते हैं और बहते हुए जल में तिल का तर्पण कर प्रकृति का धन्यवाद करते हैं. इनका मानना है कि मकर संक्रांति से सूर्य की गति तिल–तिल बढ़ती है, इसीलिए इस दिन तिल के तर्पण और भोग का विशेष महत्व है.

तिल से करते हैं मधुमेह और बवासीर का उपचार

तिल एक जाना पहचाना बीज है जो लगभग हर भारतीय रसोई में देखा जा सकता है. मकर संक्रांति के दौरान तिल के बीजों से बने लड्डू तो हिन्दुस्तान में हर घर में देखे जा सकते हैं. इसके बीजों से प्राप्त तेल का उपयोग खाद्य तेल के तौर पर भी किया जाता है. वनवासी तिल से जुड़े अनेक पारंपरिक नुस्खों का जिक्र करते हैं. बवासीर होने पर तिल के बीजों (10 ग्राम) को कुचलकर पानी (50 मिली) में उबाला जाए और ठंडा होने पर घाव वाले हिस्से पर लेपित किया जाए तो तेजी से आराम मिलता है, आदिवासियों के अनुसार दिन में कम से कम 2 बार इस प्रक्रिया को किया जाना चाहिए. जिन महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान होने वाली दर्द की शिकायत हो उन्हें तिल के बीजों (5 ग्राम) को सौंफ (5 ग्राम) और गुड़ (5 ग्राम) के साथ मिलाकर पीसकर सेवन करना चाहिए, दर्द में काफी राहत मिलता है. इन वनवासियों के अनुसार तिल के भुने हुए बीजों की आधा चम्मच मात्रा को दिन में कम से कम 4-5 बार चबाने से मधुमेह के रोगियों को काफी फायदा होता है.

आधुनिक वैज्ञानिक शोध दर्शाता है कि तिल में खून से शर्करा कम करने का गुण है. मकर संक्रांति के दौरान तिल और गुड़ के पाक का मिश्रण शरीर में गर्मी प्रदान करता है. ग्रामीण इलाकों में काले तिल का इस्तमाल सर्दी को दूर भगाने के लिए सदियों से किया जाता रहा है. जानकारों के अनुसार काले तिल की एक चम्मच मात्रा की फांकी लेने से सर्दी में आराम मिलता है.

उड़द के सेवन से बढ़ता है वजन

आदिवासियों के अनुसार पुरुषों में शक्ति और यौवन बनाए रखने के लिए उड़द एक बेहतर उपाय है. इस हेतु इसकी दाल का पानी के सेवन की सलाह दी जाती है और यह भी माना जाता है कि इसकी दाल पका कर प्रतिदिन खाना चाहिए. पोटेशियम की अधिकता की वजह से आधुनिक विज्ञान भी इसे मर्दाना शक्ति बढ़ाने के लिए मानता है. दुबले लोग यदि छिलके वाली उड़द दाल का सेवन करे तो यह वजन बढ़ाने में मदद करती है. अपने भोजन में उड़द दाल का सेवन करने वाले लोग अक्सर वजन में तेजी से इजाफा देख सकते हैं. आदिवासी जानकारी के अनुसार इसकी दाल का नियमित सेवन और उबली दाल के पानी को रोज सुबह पीना वजन बढ़ाने में सहायक होता है. इसी तरह दाल के रूप में उपयोग में लिए जाने वाली सभी दलहनों में अरहर का प्रमुख स्थान है. अरहर को तुअर या तुवर भी कहा जाता है. अरहर के कच्चे दानों को उबाल कर पर्याप्त पानी में छौंककर स्वादिष्ट सब्जी भी बनाई जाती है. आदिवासी अंचलों में लोग अरहर की हरी-हरी फलियों में से दाने निकालकर उन्हें तवे पर भूनकर भी खाते हैं. इनके अनुसार यह स्वादिष्ठ होने के साथ-साथ पौष्टिक भी होते हैं. पातालकोट के आदिवासी अरहर की दाल छिलको सहित पानी में भिगोकर रख देते हैं. आदिवासी इस पानी से कुल्ले करने पर मुँह के छाले ठीक होने का दावा करते है. अरहर की ताजी हरी पत्तियों को चबाने से भी छालों में आराम मिलता है. दालपेजा इन दोनों का दालों का मिश्रण होने की वजह से खास तौर से औषधीय महत्व का होता है.

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