कमला नदी के पश्चिमी किनारे जो मधु का वन था, वही आज मधुबनी है

अगर सच पूछा जाये तो मधुबनी ही बिहार की सांस्कृतिक राजधानी होने की हकदार है. यहां की चित्रकला, यहां की धरोहरें और यहां की ज्ञान की परंपरा अद्भुत है. मधु जैसी मिठास के साथ यह जिला पग-पग में आश्चर्य को समेटे हुए है. आइये इस मधुबनी की कहानी जानते हैं गजानन मिश्र जी से.

बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग के एडीशन सेक्रेटरी पद से हाल ही में रिटायर हुए गजानन मिश्र मूलतः नदियां और संस्कृति के प्रेमी और गंभीर अध्येता हैं. सरकार उनके कौशल का लाभ नहीं ले पायी, मगर उम्मीद है कि अवकाश के बाद उनके विचारों का लाभ समाज को मिलेगा. उन्होंने मधुबनी नगर के इतिहास पर एक रोचक और तथ्यपूर्ण आलेख लिखा है, आप भी पढ़ें.

गजानन मिश्र

मधुबनी मिथिला का एक प्रख्यात नगर है. इसका दक्षिणी भाग भौआरा है जो अधिक प्राचीन है. इस्लामी काल में भौआरा ही प्रसिद्ध था.

गजानन मिश्र

ऐसा लगता है कि मधुबनी 16 वीं सदी तक जंगलमय था और यहाँ क़स्बा का विकास नहीं हुआ था. यामलसारोद्धार के एक अप्रकाशित संस्कृत अभिलेख जो पंडित भवनाथ झा के सौजन्य से प्रकाश मे आया है, और जो 16-17वीं सदी की रचना प्रतीत होती है, के अनुसार कोइलख भगबती के पश्चिम कमला नदी के पश्चिमी किनारे पर मधु-वन है; इस मधु-वन के उत्तर मंगल वन तथा एक मठ है जहाँ चतुर्भुजा भगवती की पूजा होती है तथा जहाँ ज्ञान-विज्ञान का शिक्षण कार्य होता है. यह मंगलवन आज के मंगरौनी ग्राम से पहचाना जाता है. उक्त मधुवन ही आज का मधुबनी है. इस संस्कृत अभिलेख में यह भी उल्लेख है कि मधु-वन के पश्चिम एक अन्य विशाल जंगल है जिसमें कपिलेश्वर महादेव स्थित हैं. स्पष्टतः मधुबनी का अस्तित्व मध्य काल में स्थापित होता है. मध्यकालीन मधुवनी के भौआरा के प्रशासनिक संरक्षण मे मंगरौनी का प्रसिद्ध शिक्षण केंद्र विकसित, पल्लवित और पुष्पित हुआ-ऐसा सहज अनुमान किया जा सकता है. 14वीं सदी में तत्कालीन मंगलवनी ग्राम अर्थात आज के मंगरौनी में मुख्यतः गंगेश उपाध्याय द्वारा और फिर इनके पुत्र बर्धमान उपाध्याय द्वारा जिस नव्य-न्याय दर्शन की आधार शिला न्याय-तत्वचिन्तामणि से रखी गई, जिसे कालांतर में पक्षधर, अयाची, शंकर, महेश जैसे उद्भट विद्वानों ने और अधिक अन्वेषित, प्रचारित एवं प्रसारित किया. जिसके फलस्वरूप गंगेश उपाध्याय के तत्वचिन्तामणि के आधार पर बंगाल, बनारस, कांचीपुरम भी परवर्ती काल मे नव्य न्याय के महान शिक्षण केंद्र बन गए. इतना अधिक और यहाँ तक कि 18वीं सदी और उसके बाद की अवधि में मे मिथिला की नव्य-न्याय के शिक्षण केंद्र के रूप में कोई प्रख्याति नहीं रही और गुरु मिथिला अब शिष्य की कोटि में अवनत हो चुका था. ऐसे नव्य-न्याय के उत्थान में मध्यकालीन मधुबनी-भौआरा के प्रशासनिक केद्र की महती भूमिका का अनुमान होता है.

मधुबनी के पूरब चकदह है. यह एक विशाल जल-क्षेत्र था. मधुबनी के उत्तर और मंगरौनी के दक्षिण होकर बीच से एक धार बहा करती थी; मधुबनी के पश्चिम भी एक धार बहने का अनुमान होता है. ऐसे भौगोलिक स्थिति मे मधुबनी का 18-19वीं सदी तक जंगलमय रहना कोई आशचर्य नहीं.

अल्लाउद्दीन हुसैन शाह बंगाल का सुल्तान था 1500 ई के दरम्यान. मधुबनी के भौआरा में सर्वाधिक पुरानी मस्जिद उसी के द्वारा बनायी हुई कही जाती है. जयनगर मे पहले जिस किला का अवशेष था, वह किला भी इसी सुल्तान का बनवाया हुआ माना जाता है. बंगाल सुल्तान के मस्जिद से मधुबनी प्रक्षेत्र की राजनीतिक महत्ता इंगित होती है. सकरी-मधुबनी-जयनगर होकर नेपाल मोरंग जाने का रास्ता भी प्राचीन लगता है. इस प्राचीन सड़क पर मधुबनी की अवस्थिति इसके राजनयिक और रणनीतिक महत्व को रेखांकित करती है.

मुग़ल सम्राट बाबर ने अपनी आत्मकथात्मक ग्रन्थ बाबरनामा में लिखा है कि उसका शासन ‘भौरा से बिहार’ तक था. उसके समय मे बिहार का तात्पर्य था दक्षिण बिहार जिसका मुख्यालय बिहारशरीफ हुआ करती थी. भौरा का तात्पर्य मधुबनी का भौआरा है. यह भी 16वीं सदी के आरम्भ में भौआरा के अस्तित्व को स्थापित करता है.

खंड्बाला राजा महामहोपाध्याय शुभंकर ठाकुर ने सम्राट अकबर द्वारा प्रदत्त तिरहुत की राजधानी 1581ई में अपने निज ग्राम भौर जो लोहट के समीप है, से हटा कर मधुबनी के भौआरा में स्थानांतरित और स्थापित किया. तब से खंड्बाला राज की राजधानी भौआरा तब तक बनी रही जब संभवतः 1762 ई मे राजा प्रताप सिंह यहाँ से राजधानी हटा कर दरभंगा ले गए.

मधुबनी/भौआरा दोनों ही परगना हाटी में पड़ता है. परगना हाटी की पश्चिमी सीमा जगतपुर-भच्छी-गंधवार वाली जीबछ धार है. इसकी पुरबी सीमा राजनगर-रामपति-लोहट-पंडौल वाली कमला धार है. इसकी दक्षिणी सीमा सकरी-पंडौल-भौर ग्राम-झंझारपुर सड़क है. यह सड़क तिरहुत के राजधानी दरभंगा से बंगाल और असम जाने वाला राजमार्ग था जिसका अस्तित्व 12वीं सदी से तो प्रमाणित लगता है. यह हाटी परगना 12-13वीं सदी में कर्नाट राजवंश के शासन में गठित हुआ प्रतीत होता है. इसलिए जिस समय हाटी परगना का सृजन किया गया, उस समय तो मधुबनी के कस्बाई रूप की परिकल्पना नहीं हुई थी-ऐसा माना जा सकता है. मधुबनी मे एक गंगासागर पोखर है. अनेक विद्वान इसे तिरहुत के 12वीं सदी के राजा गंगदेव द्वारा इसकी स्थापना को होना बताते हैं. साक्ष्य के अभाव में इस तथ्य को अभी अनुमान ही मान सकते हैं. लेकिन गंगासागर पोखर खंड्बाला राजाओं द्वारा निर्मित नहीं है-यह तथ्य विवाद रहित है. इससे गंगासागर पोखर की ऐतिहासिकता का अभास होता है.

मधुबनी की चर्चा पंजी अभिलेख में नहीं मिलती है. 14वीं सदी में संकलित पंजी अभिलेख में मधुबनी का उल्लेख नहीं होना उस समय तक इसके बस्ती के रूप में विकसित नहीं होने की ओर इंगित करता है.

सम्राट अकबर के समय भौआरा एक राजस्व महाल था. राजस्व महाल अपने आप मे सामान्यतः एक प्रशासनिक केंद्र भी हुआ करती थी. यह भी उल्लेख मिलता है कि 16वीं सदी में सम्राट शेरशाह ने बंगाल की ओर अपनी फौज भौआरा-लौकहा-अमरपुर (नेपाल तराई) होकर पुरनिया-गौर मालदह के रास्ते भेजा था.

18वीं सदी के फारसी ग्रन्थ मुज़फ्फरनामा में इसके लेखक करम अली लिखते हैं कि 18वीं सदी में भौआरा बंजारों का गढ़ था. बंजारे घुमंतू व्यापारी/पैकार होते थे जो हजारों की संख्या में घोड़े/बैलों पर पत्थर/देसी दवाएं/अन्य सामग्री लाद कर खरीद-बिक्री किया करते थे. लेकिन ये बंजारे उपद्रवी और शासन-व्यबस्था मे बाधा उत्पन्न करते थे. तिरहुत के मुग़ल फौज के दरभंगा स्थित कमांडर अफगान अब्दुल करीम खान ने इनके विरुद्ध सैन्य करवाई कर इनका शमन किया था.

इसी भौआरा गढ़ के तिरहुत राजा नरेन्द्र सिंह ने भी मुग़ल सत्ता के विरुद्ध विद्रोह किया था. इसके फलस्वरूप 1746 ई के कन्दर्पी घाट की लड़ाई हुई. कन्दर्पी घाट कमला-बलान नदी के किनारे रखवार-हरनी स्थित है जिसके पश्चिम गंगद्वार ग्राम है. इस लड़ाई मे राजा नरेंद्र सिंह की जीत हुई थी.
भौआरा में जो महलनुमा भवन है और जिसके चारो ओर पहले किलानुमा दिवाल थी, को राजा राघव सिंह ने बनबाया था जैसा ww hunter अपनी रिपोर्ट 1877 ई में लिखते हैं.

इसी भौआरा गढ़ के थे खंड्बाला राजा महिनाथ ठाकुर. इनके समय में दरभंगा स्थित मुग़ल फौज ने मोरंग नेपाल पर 1667-68 में चढ़ाई किया था. राजा महिनाथ ठाकुर ने मुग़ल सेना को सहयोग करने हेतु अपनी सेना के साथ अपने छोटे भाई नरपत ठाकुर को इस युद्ध में लगाया. मुग़ल फौज की जीत हुई. इस सैन्य उपकार के बदले मुग़ल सम्राट औरंगजेब के द्वारा खंड्बाला राजा को दरभंगा मे रामबाग का क्षेत्र दान मे दिया गया. इस प्रकार रामबाग दरभंगा का क्षेत्र खंड्बाला राजवंश को प्राप्त हुआ. इस तथ्य की चर्चा सम्राट अकबर के दरबारी मुल्ला तकिया ने अपने दरभंगा के भ्रमण के दौरान अपनी डायरी में लिखी थी जिसका उल्लेख इलियास रहमानी ने उर्दू मे प्रकाशित अपने दरभंगा विषयक आलेख में किया है.

मुज़फ्फरनामा मे यह भी उल्लेख है कि भौआरा के खंड्बाला राजा राघव सिंह ने मुग़ल सत्ता के विरुद्ध विद्रोही तेवर अपना लिया था जिसके फलस्वरूप 1735 ई में उनके विरुद्ध सैन्य करवाई की गई, राजा राघव सिंह पलायन कर गए. बाद में सुलह होने पर राजा राघव सिंह को तिरहुत राज वापस किया गया.
मधुबनी में एक मोहल्ला है-नंदनगर. उपरोक्त राजा राघव सिंह के एक छोटे भाई थे-नन्द नंदन सिंह. क्या उपरोक्त नंदनगर इन्हीं नन्द नंदन सिंह के नाम पर है. नाम-साम्यता से ऐसा अनुमान तो लगता है. ज्ञात हो कि इन्ही नन्द नंदन सिंह द्वारा मधुबनी के उत्तर निकटस्थ डोकहर में राजराजेश्वर भगवती की स्थापना की गई थी. राजा राघव सिंह की बहन मधुरवाणी दाई द्वारा मधुबनी के सटे पूरब स्थित रांटी ग्राम में एक मधुरवाणीश्वर शिवालय की स्थापना की गई थी. भौआरा में राजा राघव सिंह द्वारा स्थापित राघवेश्वर महादेव तथा उनकी पत्नी रानी राघवप्रिया द्वारा स्थापित राघवप्रियेश्वर महादेव हैं. उनकी एक अन्य पत्नी रानी राघव कान्ता द्वारा भौआरा से सटे दक्षिण ककना में राघव कांतेश्वर महादेव की स्थापना की गई थी.

उपरोक्त मंगरौनी ग्राम में 1650 से 1750 मध्य थे महापंडित गोकुलनाथ उपाध्याय. नव्य-न्याय के अतिरिक्त मीमांसा, साहित्य, ज्योतिष मे भी इनकी प्रवीणता थी. नव्य न्याय इतिहास ग्रन्थ के लेखक दिनेश चन्द्र भट्टाचार्य लिखते हैं कि गोकुलनाथ उपाध्याय के समय नव्य न्याय के क्षेत्र मे मिथिला की प्रतिष्ठा बनारस और गौर-बंगाल की तरह ही था. इन्ही गोकुलनाथ के भाई मदन उपाध्याय एक महान सिद्ध साधक थे, जिनके तंत्र-ज्ञान के लिए भी मंगरौनी जाना जाता है. मंगरौनी के इस विद्या-केंद्र को मधुबनी/भौआरा का शासकीय संरक्षण होना अनुमान किया जा सकता है.

ईस्ट इंडिया कम्पनी के 1779 ई के कर्नल रेनेल के नक्शा में मधुबनी एक प्रशासनिक केंद्र के रूप मे संकेतित है. यह इंगित करता है कि अंग्रेजी शासन से पहले से ही मधु-वन एक बस्ती मधुबनी के रूप में अस्तित्व मे आ चुका था. इसलिए अंग्रेजी शासन मे आरम्भ से ही मधुबनी एक प्रशासनिक केंद्र के रूप मे रहा है. ऐसा अनुमान होता है कि 17-18 वीं सदी मे मधुबनी में क़स्बा बनने प्रक्रिया का आरम्भ हुआ. मधुबनी की महत्ता खंड्बाला राजा माधव सिंह के पौत्र जिन्हें मधुबनी बाबुसाहेब के नाम से जाना जाता है, के 19वीं सदी के प्रथमार्ध में वहां बसने के बाद बढ़ी. ऐसा 1877 ई के अंग्रेज सर्वेयर w w hunter का अभिमत उनके रिपोर्ट से प्रतीत होता है.

अंग्रेज़ी शासन काल में 1866 ई मे मधुबनी को अनुमंडल बनाया गया. 1872 ई के प्रथम जनगणना में मधुबनी की आबादी पांच हजार से भी कम थी. ऐसा हंटर रिपोर्ट से ज्ञात होता है. तत्कालीन तिरहुत के 26 नगर या नगर जैसा ग्राम-समूह जो 1872 ई की प्रथम जनगणना में चिन्हित हुए थे, में मधुबनी का उल्लेख नहीं है.

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