!!हमें भी है एक अदद टोकियो हसेगावा की तलाश!!

इन दिनों बिहार के सीएम नीतीश कुमार जापान में हैं और उन्होंने वहां निगाटा प्रांत में मिथिला संग्रहालय की यात्रा भी की है, जहां बिहार की मिथिला पेंटिंग्स के अनमोल खजाने को वहां के संगीतकार टोकियो हसेगावा ने काफी जतन से प्रदर्शित किया है. यह अफसोस की बात है कि मिथिला पेंटिंग की जन्मभूमि बिहार में ऐसा कोई संग्रहालय नहीं है और यह हमसे हजार किमी दूर है, जिसे एक परदेसी ने संभाल कर रखा है. उस परदेसी कला संरक्षक की कहानी बता रहे हैं क्राफ्टवाला इस आलेख में…

क्राफ्टवाला

भारत से हजारों मील दूर, पारंपरिक मधुबनी पेंटिंग और कई अन्य कला रूपों, जो स्थानीय भारत देश में संरक्षण और संरक्षक के अभाव में नष्ट होने के कगार पर हैं, उसे जापान में मिथिला म्यूजियम के रूप में एक आसरा मिला है जो कि कला संग्रहालय का विशुद्ध रूप है और इनके संरक्षण के लिए समर्पित है.

जापान के निगाटा प्रान्त में टोकमाची पहाड़ियों में स्थित ‘मिथिला संग्रहालय’ किसी जापानी के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कि अन्य देश से आये सैलानियों के लिए. टोकियो हसेगावा की यह दिमाग यह दिमागी उपज, अब 15,000 उत्कृष्ट मधुबनी चित्रों का खजाना बन गया है. मधुबनी या मिथिला चित्रकला का यह नायाब गुलदस्ता पूरे वर्ष सैकड़ों कलाकारों एवं कलाप्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करता रहता है.

इसके संस्थापक टोकियो हासेगावा के शब्दों में “मैं नहीं चाहता था कि यह #आध्यात्मिक (मधुबनी) लोककला का रूप हमारे लोक गायकों की तरह गायब हो जाए. “बिहार में उत्पन्न इस मिथिला चित्रकला को बचाने के अपने प्रयास पर 60 वर्षीय हसेगावा की जितनी भी प्रशंसा की जाय वो कम है. उनके द्वारा संग्रहित इन चित्रों को संग्रहालय में आने वाली पीढ़ियों के लिए अनंत काल तक संरक्षित की जा रही है.

संग्रहालय का विचार तब आया जब छात्रों के एक समूह ने 1982 में 80 मधुबनी चित्रों के साथ हसेगावा से संपर्क किया था, जो उन्होंने बिहार की यात्रा के दौरान खरीदा था और उन्हें प्रदर्शित करने के लिए एक जगह की तलाश कर रहे थे. टोकियो निवासी प्रसिद्ध #संगीतकार हसेगावा, उस समय “अपने संगीत और भगवान के करीब” होने के लिए पहाड़ों में रहने के लिए शहरी जीवन के चकाचौंध को त्याग आये थे.

हसेगावा कहते हैं, “इसलिए हमने एक संग्रहालय के लिए एक खाली प्राथमिक विद्यालय को गुप्त रखने का फैसला किया”. इसके साथ उन्होंने एक लंबी यात्रा शुरू की जिसकी मंजिल भारत का सुदूर देहात मधुबनी के आसपास का गांव था. वहाँ मिथिला चित्रकला के चित्रों को इकट्ठा करने, कलाकारों को प्रोत्साहित करने और उन्हें जापान पहुंचाने के इस भगिरथी प्रयास की शुरुआत की गई.

1988 में, जब विश्व प्रसिद्ध मिथिला चित्रकला कलाकार गंगा देवी जापान आई तो उनके साथ ही मिथिला संग्रहालय के द्वारा इस चित्रकला के विभिन्न चित्रकारों को आमंत्रित किये जाने का सिलसिला शुरू हुआ. ये कलाकार संग्रहालय द्वारा विकसित की नई सामग्री (पेपर, कैनवास, लकड़ी आदि) पर पारंपरिक तरीकों से चित्रकरी करने लगे. यह प्रयास इतना आसान नही था. प्रसिद्ध संगीतकार हसेगावा कहते हैं, “मैंने कलाकारों की तलाश में कई गांवों को छान मारा और फिर अंत मे गंगा देवी मिली” और उनको जापान चलने के लिए राजी किया गया.

78 वर्षीय कलाकार कर्पूरी देवी कहती हैं, ”मैं संग्रहालय में रहने के लिए नौ बार आई हूं और वास्तव में यहां रहने का अनुभव अपने घर जैसा है. हम अपनी कला का अभ्यास करते हैं और हसेगावा हमें अपने विजन से परिष्कृत करते हैं.” कलाकारों को उनके ठहरने के दौरान हर तरह की सुविधा के साथ मासिक वेतन भी प्रदान किया जाता है.

संग्रहालय की स्थापना के साथ हसेगावा का भारत के साथ जो लगाव होना शुरू हुआ उसने इन्हें भारत की कला-संस्कृति के बारे में और जानने के लिए प्रेरित किया. इसके बाद उन्होंने भारतीय संस्कृति को लोकप्रिय बनाने वाले कई अभियान को संचालित किया और 2003 में टोक्यो में भारत की कला संस्कृति को प्रदर्शित करने वाली ‘नमस्ते भारत’ आयोजन टीम के अध्यक्ष बने.

हसेगावा का कहना है कि इस दौरान जब जब वित्तीय समस्याओं और इसके प्रति सरकारी उदासीनता ने इनको हतोउत्साहित किया, इनके मित्रों और परिवार वालों ने उन्हें सहायता प्रदान की. वे कहते हैं कि “यदि आप केवल पैसों के बारे में सोचते हैं, तो आप इस तरह के कार्य को पूरा नहीं कर सकते. ये एक जुनून है जो कुछ बड़ा कर गुजरने के लिए सदैव आपको प्रेरित करता रहता है.”

हसेगावा कहते हैं, “भारत में कलाकारों ने मुझे अपने कामों से संपर्क किया है और मैं उनके पेंटिंग खरीदता भी था, यहां तक ​​कि जिन लोगों की पेंटिंग मुझे ज़रूरत नहीं होती थी, उन कलाकारों को भी प्रोत्साहित करता था”. उनके प्यार का प्रतिफल, मिथिला म्यूजियम अब अन्य भारतीय कला रूपों से भी भर गया है जिसमे टेराकोटा मुख्य है. इस संग्रहालय के परिसर में एक सरस्वती मंदिर भी है. मधुबनी चित्रकला परंपरा, जो सातवीं शताब्दी की अनोखी कला है. इन पर अधिकांश उन महिलाएं ने अभ्यास कर प्रभुत्व जमाया है, जो विधवा थी.

भारतीय संस्कृति के बारे में जापानी लोगों के बारे में जागरूकता के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं, “यह आसान काम नहीं है, लेकिन सांस्कृतिक संपर्कों को रोकना नहीं है क्योंकि ये दोनों देशों को करीब लाने में मदद कर रहे हैं.” दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत बनाने के लिए हसेगावा को मिथिला चित्रकला का सांस्कृतिक दूत कहा जाता है. काश बिहार में भी कोई एक एक अदद हसेगावा का जन्म होता जो मिथिला म्यूजियम को मिथिला में बनाता.

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