आज के ही दिन तारापुर में अंगरेजों की गोलियों का शिकार हो गये थे 34 लोग

बिहार कवरेज

देश ही नहीं बिहार के भी बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि मुंगेर के तारापुर में आज के दिन 34 निहत्थे लोग अंगरेजों की गोली का शिकार होकर अकालकलवित हो गये थे. यह आजादी के इतिहास का एक ऐसा पहलू है जो आज तक अनछुआ और गुमनाम है. इतिहास के पन्नों में यह किस्सा किसी फुटनोट्स की तरह दर्ज है. भले ही इस कहानी में देश के लोगों की सहज दिलचस्पी न हो, मगर कम से कम बिहार के लोगों को तो उन 34 लोगों की कुरबानी के किस्से के बारे में जानना ही चाहिए. बलिदान के इस किस्से को जयराम विप्लव की अगुआयी में मुंगेर के सैकड़ो युवक जन-जन तक पहुंचाने में जुटे हैं. वे आज के मौके पर तारापुर शहीद यात्रा का आयोजन कर रहे हैं. आइये पहले जानते हैं तारापुर गोलीकांड का किस्सा…

एक आलेख में जयराम विप्लव लिखते हैं,

‘तारापुर बिहार के मुंगेर जिले का एक अनुमंडल है. यह कस्बानुमा शहर 15 फरवरी 1932 को हुए भीषण नरसंहार के लिये प्रसिद्ध है. आजादी के दीवाने स्थानीय ग्रामीणों ने तारापुर थाना भवन पर तिरंगा फहाराने के संकल्प को पूरा करने के लिए सीने पर गोलियां खायी थीं और वीरगति को प्राप्त हुए थे.

1931 में गांधी-इरविन समझौते को रद्द किये जाने के विरोध में कांग्रेस ने देश में सभी सरकारी भवनों से यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराने का आह्वान किया था और यह जनांदोलन का रूप ले चुका था. मुंगेर जिले का तारापुर जो उस समय बस एक छोटा-सा बाजार था, भी इससे अछूता नहीं था. घटना के साक्षी एवं योजना के भागीदार रहे बुजुर्गों के अनुसार शंभुगंज थाना के सुपौर जमुआ के श्री भवन में तारापुर थाना भवन पर तिरंगा फहराने की पूरी रूपरेखा तैयार की गई थी.

15 फरवरी 1932 को इसी सिलसिले में आसपास के गांवों के आजादी के हजारों दीवानों ने यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराने के संकल्प के साथ तारापुर में अंग्रेजों के थाने पर धावा बोला था. जोशीले सेनानी ‘भारत माता की जय’ और ‘बंदे मातरम’ का जयघोष कर रहे थे. तब उस वक्त के कलेक्टर ईओ ली व एसपी डब्लू फ्लैग ने निहत्थे स्वतंत्रता सेनानियों पर अंधाधुंध गोलियां चलवा दी थी. आजादी के दीवाने नौजवान वहां से हिले नहीं और सीने पर गोलियां खायीं. अंग्रेजी हुकूमत की इस बर्बर कार्रवाई में 44 स्वतंत्रता प्रेमी शहीद हो गये थे. इनमें से 13 की तो पहचान हुई बाकी 31 अज्ञात ही रह गये थे. आनन—फानन में अंग्रेजों ने कायरतापूर्वक वीरगति को प्राप्त कई सेनानियों के शवों को वाहन में लदवाकर सुल्तानगंज भिजवाकर गंगा में बहवा दिया था.

जिन 13 वीर सपूतों की पहचान हो पाई उनमें विश्वनाथ सिंह (छत्रहार), महिपाल सिंह (रामचुआ), शीतल (असरगंज), सुकुल सोनार (तारापुर), संता पासी (तारापुर), झोंटी झा (सतखरिया), सिंहेश्वर राजहंस (बिहमा), बदरी मंडल (धनपुरा), वसंत धानुक (लौढिया), रामेश्वर मंडल (पढवारा), गैबी सिंह (महेशपुर), अशर्फी मंडल (कष्टीकरी) तथा चंडी महतो (चोरगांव) शामिल थे. इस घटना ने अप्रैल 1919 को अमृतसर के जालियांवाला बाग गोलीकांड की बर्बरता की याद ताजा कर दी थी. वीर सेनानियों की कुर्बानियों को याद दिलाने के लिए तारापुर थाना के ठीक सामने स्थानीय नेता व समाजसेवी जयमंगल सिंह शास्त्री, जमुना पासवान, बासुकीनाथ राय, नंदकुमार सिंह, नंदकिशोर चौबे, डॉ. जीवानंद मिश्र, डॉ. दामोदर चौधरी, हितलाल राजहंस आदि के प्रयासों से शहीद स्मारक स्थल बना.’

1984 में बिहार के पूर्व मुख्यसमंत्री चंद्रशेखर सिंह ने शहीद स्तंभ को संगमरमर का बनवा दिया था. लेकिन इस स्थल को जितना भव्य होना चाहिए था, आज उसका शतांश भी नहीं है. स्थानीय युवा एवं भारतीय जनयुवा मोर्चा के कार्यकर्ता जयराम विप्लव के प्रयासों से तारापुर गोलीकांड के बारे में लोग थोड़ा बहुत जान भी पाए हैं वरना वीरसपूतों की कुर्बानियां गुमनामी के अंधेरे में ही खोई रहतीं. जयराम विप्लव उस थाना भवन को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मुहिम छेड़े हुए हैं जिस भवन पर तिरंगा फहराने के प्रयास में भारत मां के वीर सपूतों ने शहादत दी.

स्थानीय सोनडीहा (स्वर्णडीह) निवासी एवं आरएस कॉलेज के उस समय इतिहास विभाग के  प्रवक्ता तदुपरांत प्राचार्य बने डॉ. देवेंद्र प्रसाद सिंह ने तारापुर के वीर शहीदों पर शोध प्रबंध लिख इस ऐतिहासिक घटना को प्रकाशित किया. इतिहासकार डीसी डिन्कर ने अपनी पुस्तक ‘स्वतंत्रता संग्राम में अछूतों का योगदान’ में तारापुर के वीर शहीद संता पासी और शीतल चमार का उल्लेख किया है. प्रत्येक वर्ष 15 फरवरी को तारापुर शहीद दिवस का आयोजन होता है.

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