तिनकठिया बंद हो गयी मगर कम नहीं हुआ अत्याचार #चंपारण-गांधी के बाद-2

चंपारण सत्याग्रह के बाद जब तिनकठिया प्रथा को खत्म करने का एक कानून बन गया और महात्मा गांधी को अहमदाबाद मिल मजदूरों के आंदोलन की वजह से यहां से जाना पड़ा तो शायद वे मन में एक संतुष्टि का भाव लेकर गये होंगे कि अब कम से कम नील किसानों को शोषण की उस संवेदनहीन प्रक्रिया से गुजरना नहीं पड़ेगा. मगर जब आप गांधी के चंपारण से जाने के बाद के दिनों पर गौर करेंगे तो पायेंगे कि यह खुशी बहुत अधिक दिनों तक बरकरार नहीं रही. इस बात के प्रमाण प्रताप अखबार के उन आलेखों में मिलते हैं, जो लेखक-पत्रकार पीर मोहम्मद मूनिस ने लिखे थे. उन लेखों से गुजरने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि प्रताप अखबार की चंपारण सत्याग्रह को अंजाम तक पहुंचाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका थी. कानपुर से गणेश शंकर विद्यार्थी के संपादकत्व में प्रकाशित होने वाले इस क्रांतिकारी अखबार में लगातार चंपारण के किसानों की व्यथा छपती रही. गांधी के चंपारण पहुंचने से काफी पहले से.

इस अखबार ने न सिर्फ इस मसले पर खबरें लिखीं, आलेख लिखे बल्कि परचा छपवाकर लोगों के बीच बांटा और आम लोगों से इस मसले पर सूचनाएं देने की अपील भी की. यह परचा काफी विवादित हुआ. इसके आधार पर कई लोगों की गिरफ्तारी भी हुई और पत्रकार पीर मोहम्मद मूनिस जो एक सरकारी स्कूल में शिक्षक थे, उन्हें इस परचे का लेखक मानते हुए बरखास्त भी कर दिया गया. यह सब गांधी के चंपारण आने से पहले की बात है. जब गांधी चंपारण में थे, तब भी प्रताप में इस आंदोलन की खबरें छपीं और इसके लिए एक बार प्रताप के संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी की मैजिस्ट्रेट की अदालत में पेशी भी हुई.

गांधी के चंपारण से लौटने के बाद भी पीर मोहम्मद मूनिस चंपारण के किसानों के सवाल पर लिखते रहे. उनकी रिपोर्टों में से तीन काफी महत्वपूर्ण हैं. पहली रिपोर्ट का शीर्षक है, पीर मोहम्मद मूनिस जेल में (सनसनी फैलाने वाला मुकदमा) प्रकाशन तिथि 30 सितंबर, 1918. दूसरी रिपोर्ट का शीर्षक है, चंपारण में फिर अत्याचार! प्रकाशन तिथि 4 अगस्त, 1919. और तीसरी रिपोर्ट है, चंपारण में फिर नादिरशाही, प्रकाशन तिथि 30 अगस्त, 1920.

इन तीनों रिपोर्ट से गुजरते हुए मालूम होता है कि चंपारण सत्याग्रह के बाद जब गांधी चले गये तो ब्रिटिश सरकार और नीलहे अंगरेजों ने चंपारण के किसानों और सत्याग्रह से जुड़े लोगों को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. पीर मोहम्मद मूनिस को एक झूठे आरोप में गिरफ्तार किया गया. राजकुमार शुक्ल जिन्हें गांधी को चंपारण लाने का श्रेय जाता है के रिश्तेदारों को भी परेशान किया जाने लगा. तिनकठिया के बाद नीलहे अंगरेजों ने किसानों को परेशान करने के लिए दूसरे तरीके गढ़ लिये.

चंपारण में फिर अत्याचार! शीर्षक आलेख में एक दुखी आत्मा के नाम से मूनिस लिखते हैं,

“चंपारण में तीन प्रधान शक्तियां हैं- पुलिस, बेतिया राज और नीलहे गोरे. नीलहों से अब कुछ होता ही नहीं, मगर अब उन्होंने एक अच्छा उपाय सोचा है, वह यह है कि पहले तो वे रैयत से प्रति बीघा एक रुपये नजराना मांगते हैं. जब रैयत देने से इनकार करती है, तब वे पुलिसवालों को खबर देते हैं और उनसे रैयत को धमकी दिलवाते हैं. अगर रैयत के मवेशी परती जमीन में चरने जाते हैं तो सब मवेशियों को कांजी हाउस में दाखिल कर देते हैं. अगर रैयतों ने कोई चूं-चरा किया तो उस पर बलवा करने का मुकदमा चलाया जाता है. पंडित राजकुमार शुक्ल पर शिकारपुर की पुलिस ने कई रिपोर्ट की है, श्री युत पीर मोहम्मद मूनिस पर भी रिपोर्टें हैं. मूनिसजी का कहना है कि मुझ पर रिपोर्ट हुई कि मैं और राजकुमार शुक्ल चमुआ मोकामा में गये, वहां के रैयतों से बातचीत की और सभा करने का साहस किया. पुलिस वाले चाहते हैं कि महात्मा गांधी के जो आदमी वहां हैं, उन पर मुकदमा चला कर किसी प्रकार उन्हें तंग किया जाये, क्योंकि महात्मा गांधी के आदमियों के कारण उनकी मनमानी दाल नहीं गलती.”

उसी तरह चंपारण में फिर नादिरशाही (पिस्तौल के बदले रुपये ऐंठना) नामक आलेख में 25 जुलाई, 1920 की उस सभा की रिपोर्ट है, जब मौलाना मजहरूल हक के सभापतित्व में बेतिया रैयत सभा की स्थापना की गयी. रिपोर्ट में राजकुमार शुक्ल के भाषण के अंश उद्धृत किये गये हैं. ये काफी महत्वपूर्ण हैं. ये अंश हैं-

“महात्मा गांधी के चले जाने से यहां के नीलहों ने फिर पूर्ववत अत्याचार करना शुरू कर दिया है. कोर्ट ऑफ वार्ड्स ने नीलहों को 10 बरस का ठीका फिर से दे दिया है और 10 रुपये कमीशन के बदले 20 रुपये कमीशन कर दिया है. खास-गांव में राज्य को रुपये वसूल करने में 711 के करीब खर्च होता है, ऐसी अवस्था में 20 रुपये खर्च करने की जरूरत? जब ब्लाई कमेटी ने साबित कर दिया है कि खास गांवों में रैयतों को अधिक दुख है, बनिस्पत ठीका गांव के, तब ऐसी अवस्था में, राज्य के मैनेजर स्वयं रैयतों पर होने वाले अत्याचारों में मदद करते हैं. जिसका फल आज मुझे चंपारण की सभी कोठियों में नजर आ रहा है.

लौरिया कोठी में कुक साहब एक फौजी आदमी हैं, वे मैनेजर बनाये गये हैं. वे एकदम नये आदमी हैं. वे यहां के रैयतों के हाल से कुछ वाकिफ नहीं. कोठी के तहसीलदार और जमादार रैयतों को लूट रहे हैं. मुरली और ढेकहवां गांव में सैकड़ों रैयतों से अबवाव वसूल हुआ है. नहीं देने वाले रैयतों पर मुकदमे लगाए गये हैं. मि. कुक के यहां लड़का पैदा हुआ है. हजारों रैयतों से मुंह-दिखाई एक-एक रुपये फी आदमी वसूल की गई.

साठी कोठी में एक हिंदुस्तानी कायस्थ मैनेजर हैं. इनका हाल मत पूछिये. चंपारण रैयत सभा के सभापति बाबू गोरख प्रसाद वकील ने साठी-सेमरी की सभा में कहा था कि उपर्युक्त मैनेजर साहब ने नरकटियागंज के एक बनिया को मुरगीखाने में बंद करके मनमाने रुपये वसूल किये हैं. एक ब्राह्मण के गले में जूते का जनेऊ डाल कर इधर-उधर घुमाया गया है.

मलहिया और लोही अरिया कोठियों की रैयतें बेहतर आतुर हो गयी हैं, मलहिया में नील का पट्टा लिखाया जा रहा है. जो लोग पट्टा लिखने से इनकार करते है, उनके गाय-बैल फाटक में दे दिये जाते हैं. चारागाह के लिए जमीन नहीं है. पहले जो चारागाह की जमीन थी उसे कोठी वालों ने अपने कब्जे में कर रखा है.

मझौआ कोठी में अत्याचार की हद हो गयी है. कोठी के साहब बहादुर ने मोटरकार खरीदने के लिए गांव के रैयतों पर हूबली टैक्स लगाया. सामने पिस्तौल रखकर रैयतों को दिखलाया गया और कहा गया कि यदि तुम लोग रुपये नहीं दोगे तो इसी पिस्तौल का शिकार बनोगे. इस प्रकार रैयतों से जबरन, डरा कर 302811 रुपये वसूल किये गये.

… इन्हीं कोठी वालों के देखा-देखी चंपारण के हिंदुस्तानी जमींदारों और बेतिया राज के ठेकेदारों ने भी अत्याचार करना शुरू कर दिया है. अभी थोड़े दिन हुए कि बेतिया के सब डिवीजनल कोर्ट में एक गांव के एक रैयत ने इस आशय की नालिश की थी कि मेरे गांव के एक ठेकेदार ने मुझसे 100 रुपये जबरन हाथी के पांव में बांधकर वसूल किये. मैंने जब इनकार किया तो मुझे हाथी से घिसटवाया गया. मेरे एक रिश्तेदार ने सौ रुपये दिये तो मेरी जान बची.

इन दोनों उद्धरणों से साफ जाहिर है कि गांधी के जाते हीं चंपारण के रैयतों पर फिर से हमला शुरू हो गया. ब्रिटिश सरकार, नीलहे अंगरेज और बेतिया राज के मैनेजर तीनों ने मिलकर रैयतों से बदला लेना शुरू कर दिया. जुल्म बढ़ गया. नीलहे अंगरेज भी नुकसान की भरपाई करने की कोशिश में जुट गये थे. इन घटनाओं का जब आप विश्लेषण करेंगे तो पायेंगे कि मूल मसला आर्थिक शोषण करना नहीं था, बल्कि प्रतिरोध की भावना को कुचलना था. महात्मा गांधी की मौजदूगी ने नील प्लांटरों, ब्रिटिश अधिकारियों और बेतिया राज तीनों को कसूरवार साबित कर दिया था. वे सभी निस्तेज हो गये थे और दुनिया उनके साथ अपराधियों की तरह व्यवहार कर रही थी. आखिरकार ब्रिटिश सरकार को भी कड़े कदम उठाने पड़े. ऐसे में जब गांधी चंपारण से चले गये तो यह तिकड़ी रैयतों और गांधी के सहयोगियों से इस बात का बदला लेना चाह रही थी. इसी वजह से नील की खेती खत्म होने के बावजूद यूरोपियन प्लांटरों ने फिर से अगले दस सालों के लिए बेतिया राज से जमीन के ठेके ले लिये और कोठी उजड़ी नहीं.

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