तीन-तीन नाकाम मुहब्बतों की तड़प ने बना दिया महेंदर मिसिर को बटोही

नदियों के प्रेम में देश भर में भटकने वाले निलय उपाध्याय अब भोजपुरी गीतों के उस्ताद महेंदर मिसिर की कहानी लिखने की तैयारी कर रहे हैं. इससे पहले वे दशरथ मांझी के जीवन पर पहाड़ उपन्यास लिख चुके हैं. कल उन्होंने महेंदर मिसिर की जयंती पर यह लंबा पोस्ट लिखा था, जिसमें उनके जीवन की नाकाम मुहब्बतों की कहानी थी. उनकी इजाजत से यह पोस्ट जो उनके अगले उपन्यास बटोहिया की आधारभूमि होगी, यहां पेश है….

निलय उपाध्याय

भोजपुरी के इस महान नायक महेन्दर मिसिर को अपने गीतों के कारण चाहे जितना गौरव मिला हो, मगर उनका जीवन बहुत दुखमय और बहुत संघर्षो से भरा रहा. जीवन में कभी चैन की एक सांस नसीब नहीं हुई. प्रेम के लिये वे जीवन भर तड़पते रहे. यही विरह उनके गीतों की जान बन गया. महेन्दर मिसिर के जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर तीन औरतें आईं. तीनों का उन्होने भरपूर सहयोग किया और तीनों का सहयोग कर उन बुलन्दियो पर पहुंचाया. जिसकी कल्पना उन्होंने नही की थी. जीवन की इस यात्रा मे तीनों से उन्होंने टूट कर प्यार भी किया था मगर तीनों ने अलग-अलग कारणों से उनसे किनारा कर लिया. इसी दौर में उनकी मुलाकात सुभाष चन्द्र बोस से भी हुई. उनके कहने पर महेन्दर मिसिर स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़े और उनका प्रेम देश प्रेम में तबदील हो गया.

पहली प्रेमिका- हीरा बाई

महेंदर मिसिर

युवावस्था मे महेन्दर मिसिर घर का कोई काम नही करते थे. पिताजी की मौत बचपन में ही हो गयी थी. महेन्दर मिसिर गीत लिखते गाते और उसी तरह की संगत मे रहना पसन्द करते. उनके गुरु थे राम नारायन मिसिर. मां महेन्दर मिसिर के जीवन को लेकर बहुत परेशान रहती थी कि इस लड़के का क्या होगा.

दूर के एक रिश्तेदार जो कल्कता में काम करते थे, से उन्होंने महेन्दर की कही नौकरी लगाने के लिये कहा. रिश्तेदार तैयार था मगर महेन्दर मिसिर तैयार नही हुए. रिश्तेदार जब अपनी बेटी की शादी मे गांव आए तो खबर भेजा. महेन्दर को ही न्योता पर भेज दो हम समझा देंगे और मां के कहने पर महेन्दर मिसिर रिश्तेदार की बेटी की शादी मे शामिल होने उनके गांव आ गये.

वहां हीरा बाई का नाच आया था. हीरा बाई को पता चला कि महेन्दर मिसिर आए हैं तो मिलने आई और उनका ही लिखा गीत सुनाया. महेन्दर मिसिर अपना ही गीत सुनकर झूम उठे. हीरा बाई का गीत खतम भी नही हुआ था कि एक हादसा हो गया. कुछ लोग आए और हीरा बाई को उठा कर चल दिए. सारे लोग मूक दर्शक बने उसे जाते देखते रहे. रोती-कलपती हीरा बाई की आवाज उनके सीने मे चुभ गयी.

कई दिनों तक वे हीरा बाई की तलाश मे भटकते रहे मगर कोई सुराग नही मिला. एक दिन अचानक उनको पता चला कि हीरा बाई को छ्परा के हरेराम सिह ने उठवाया था. महेन्दर मिसिर को याद आया कि उनके गुरु राम नारायन मिसिर छ्परा के हरेराम सिह की चर्चा अक्सर करते थे. वे गुरु जी को लेकर हरेराम सिह के घर छ्परा पहुंच गये.

हरेराम सिंह के घर रात मे संगीत की बैठकी हुई. बैठकी मे हीरा बाई से जब गुरुजी ने कुछ सुनाने को कहा तो हीरा बाई की आंख भर आई और उसने कहा कि इस गले मे जो स्वर था सूख गया है बाबा. महेन्दर मिसिर ने सुना तो उनको झटका सा लगा. उन्हें लगा कि ये गलती उनकी है. अगर वे कुछ दिन पहले आ गये होते तो हीरा बाई का ये हाल नही होता. गुरुजी ने महेन्दर मिसिर का परिचय दिया ओर गाने कए लिए कहा.

जे हम जनिती आइहे रामजी पहुनवा
सवेरे घरवा अईती हो राम

महेंदर मिसिर ने अपना गीत सुनाया तो हीरा बाई के साथ सभी रो पड़े.

रात मे महेन्दर मिसिर अपने कमरे मे बैठे थे. उनके कानो मे हीरा बाई की आवाज गूंज रही थी. इस गले में जो स्वर था सूख गया है बाबा. तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. दरवाजा खोला तो सामने हीरा बाई खडी थी.

मिसिर जी आपका गीत सुनने के बाद कुछ दिन और जिन्दा रहने की ताकत मिल गई. इस घर मे आपको देने के लिये मेरे पास कुछ नही है सिवा इसके. कहकर हीरा बाई ने कागज की एक पुड़िया महेंदर मिसिर को दिया और चली गयी. हीरा बाई के जाने के बाद महेन्दर मिसिर ने कागज की पुड़िया को खोला तो उसमे हीरा बाई की नथिया थी. महेन्दर मिसिर के शरीर मे सनसनी दौड़ गई. ऐसा लगा जैसे नथिया मे आग लगी हो और उसमें महेन्दर मिसिर जल रहे हों. वहां से लौटते हुए महेंदर मिसिर ने गुरुजी से पूछा…

हीरा बाई का क्या हुआ गुरुजी

गुरुजी ने कोइ जबाब नही दिया तो महेन्दर मिसिर बेचैन हो उठे.

इस घटना के बाद उन्हें रातों मे नीद नही आती. हीरा बाई की नथिया को एक टक निहारते और समझ नही पाते क्या करें? तभी एक दिन हीरा बाई का नौकर आया और कहा कि हीरा बाई ने आपको बुलाया है.
क्यों.

मालिक घर छोड कर चले गए हैं. जाते समय एक पत्र लिख कर गये हैं, जिसमे लिखा है कि हमको खोजना मत. अपना आधा धन हीरा बाई को और आधा धन अपने छोटे भाई कुन्दन सिंह को लिख कर गए हैं.

महेन्दर मिसिर हीरा बाई के पास आए तो वहां हरेराम सिंह के दोस्त दीवान राय थे और बता रहे थे कि हरेराम सिंह के भाई कुन्दन सिह मुकदमा करने की तैयारी कर रहे हैं.

दीवान राय के विरोध के वावजूद महेन्दर मिसिर की सलाह पर हीरा बाई ने कुंदन राय के घर जाकर उनका सारा धन दे देना स्वीकार कर लिया मगर होनी तो कुछ और थी. महेन्दर मिसिर हीरा बाई के साथ जब कुंदन राय के घर पहुंचे तो कुन्दन राय के देह मे जैसे आग लग गयी.

इस रंडी की हिम्मत कैसे हुई दरवाजे पर चढ्ने की.

महेन्दर मिसिर ने बीच-बचाव करना चाहा तो कुन्दन राय ने उनको धक्का दे दिया. महेंदर मिसिर के सिर से खून निकलने लगा. हीरा बाई को गुस्सा आ गया और कह कर वापस आ गयी कि अब हम कचहरी से लड़कर इस घर मे भी हिस्सा लेंगे. दीवान राय ने सुना तो बहुत खुश हुए और मुकदमा आरम्भ हो गया.

दीवान राय की नीयत पर महेंदर मिसिर को शक था. उन्होंने पता किया तो मालूम हुआ कि दीवान राय दोनो तरफ़ से बोल रहे हैं और हीरा बाई के साथ धन पर भी उनकी निगाह गड़ी है.

महेन्दर मिसिर ने हीरा बाई को बताया मगर उलटा हुआ.

गुस्से की आग में जलती हीरा बाई ने महेन्दर मिसिर से कहा कि मुझे तो आपकी नीयत पर शक हो रहा है. आप इतने गिरे हुए आदमी निकलेंगे हम तो सोच भी नही सक्ते थे. महेन्दर मिसिर के पांव तले की जमीन खिसक गई और रात मे बिना किसी के बताए हीरा बाई की नथिया उसके सिरहाने रखकर वहां से हमेशा के निकल गये.

दूसरी प्रेमिका- केशर बाई

महेंदर मिसिर की दूसरी प्रेमिका बनारस की केशर बाई थी.

केसर बाई अपनी मां के साथ बनारस के अन्न्पूर्णा मन्दिर मे भिखारियो को खाना दे रही थी कि उसकी नजर कटोरा हाथ मे लिये भिखारियों के बीच बैठे महेंदर मिसिर पर पड़ गई. वह महेन्दर मिसिर को अपने साथ ले आई. महेन्दर मिसिर के जख्मों को केशर बाई के प्यार का मरहम मिला और सब कुछ सही रस्ते पर आने लगा.

बसंतोत्सव पर राजा के दरबार में हर साल नाच का आयोजन होता था. जीतने वाली वेश्या गणिका प्रमुख कहलाती थी. केशर बाई की मां एक बार हार चुकी थी और चाहती थी कि उनकी बेटी यह प्रतियोगिता जीते. महेंदर मिसिर को पता लगा तो वे केशर बाई को उसकी तैयारी करवाने लगे. दिन को दिन और रात को रात न समझ महेन्दर मिसिर तैयारी करवाते रहे और केशर बाई ने ये प्रतियोगिता जीत ली. केशर की बनारस मे तूती बोलने लगी. महेन्दर मिसिर भी बहुत खुश थे, तभी एक नया हादसा हो गया.

एक दिन गंगा तट से टहल कर महेन्दर मिसिर आए और केशर बाई के कमरे का दरवाजा खोला तो दंग रह गए. केशर बाई बनारस के राजा की बाहों में थी. महेंदर मिसिर तुरत बाहर निकलने लगे तो केशर ने उन्हे रोका और असमय आने के लिये बुरी तरह डांटा. महेन्दर मिसिर के पांव तले की जमीन दूसरी बार खिसक गईं. उन्हे अपनी मां याद आई कलकता में रहने वाले रिश्तेदार याद आए और रात मे बिना किसी के बताए कलकता के लिये निकल गये.

तीसरी प्रेमिका- सुमन

महेन्दर मिसिर के कलकता में रहने वाले रिश्तेदार ने उनकी नौकरी किसी प्रेस मे लगवा दी जहां छ्पाई का काम होता था. महेंदर मिसिर का दिन तो कट जाता रात नही कटती. हीरा बाई और केशर बाई की यादें हूक बनकर उनके कलेजे मे समा गई थी. रात को अपना दुख गीत मे गाते.

के मोरा हरिहे रामा हिया के दरदिया
के मोरा हरिहे जहरिया रे ननदी
दियरा जरा दे

सुमन नाम की एक वेश्या जो देह का धन्धा करती थी, रोज रात को गुजरते महेंदर मिसिर का गीत सुनती और उसे लगता कि इस आदमी के भीतर कोई गहरा दर्द है. एक रात उससे सहा नही गया और उसने महेंदर मिसिर के दरवाजे पर दस्तक दिया. जब उसे पता चला कि वे महेंदर मिसिर हैं तो चौक गयी. उसके आस-पास की कई वेश्याए उनके गीत गाती थी. वह महेंदर मिसिर को अपने घर ले आई और प्रेमिका के बजाय हमदर्द दोस्त बन कर साथ रहने लगी. उसी दौरान कलकता मे उनकी मुलाकात हरेराम सिह से हुई जो चंद्र्शेखर आजाद और क्रान्तिकारियों के साथ आजादी की लडाई लड़ रहे थे और आना-जाना बढ गया.

आखिरी प्रेम – देश प्रेम

हीरा बाई और केशर बाई की यादें हूक बनकर अब भी रह रह उनके भीतर समा जाती. प्रेस में काम चल रहा था. पैसा मिल रहा था. गांव पर मां खुश थी कि महेंदर काम कर रहे हैं. वे एक बार मां से जाकर मिलना चाहते थे तभी मां की मौत की खबर मिल गई. मां की मौत की खबर ने उन्हे भीतर से तोड़ दिया. वे बहुत दुखी रहने लगे, हरेराम सिंह से चंद्रशेखर आजाद और क्रान्तिकारियो ने महेन्दर मिसिर का दुख देखकर कहा.

चलिये आपको आपकी मां से मिलाते हैं…

चन्द्रशेखर आजाद ने महेन्दर मिसिर को ले जाकर भारत माता की तस्वीर के सामने खड़ा कर दिया और कहा – आज से ये आपकी मां है…
महेन्दर मिसिर को भारत मां के चेहरे मे अपनी रोती हुई मां का चेहरा दिखाई दिया और उन्होने आजादी की लड़ाई मे अपने आप को पूरी तरह न्योछावर कर दिया.

आजादी की लड़ाई में महेन्दर मिसिर सीधे कभी शामिल नही हुए. उनके अस्त्र उनके गीत थे जो लोगों में चेतना जगाते. जब महेन्दर मिसिर गाते तो लोग पागलों की तरह जाकर आजादी की लडाई में शामिल हो जाते. एक बार कलकता प्रवास के दौरान चंद्रशेखर आजाद को रुपयों की कमी होने लगी तो महेन्दर मिसिर जाली रुपया छापने लगे और क्रान्तिकारियों तक पहुंचाने लगे. इसी बीच हीरा बाई ने उन्हें बुलाया कि वो अब भी उनका इन्तजार कर रही हैं. मगर उनका प्रेम अब देश प्रेम की शक्ल ले चुका था. उन्होने ये कह कर आए आदमी को वापस कर दिया कि एक बार उससे मिलने जरूर आएंगे और अपने काम मे लग गये.

कुछ दिनों तक सब कुछ ठीक ठाक चला और जब सिपाहियों को उन पर शक होने लगा तो वे अपने गांव आ गये. मां मर चुकी थी. घर की माली हालत बहुत खराब थी. उन्होंने अपने पुश्तैनी घर में ही रहने का फैसला ले लिया. अब वे अपने घर रहते. पूजा पाठ करते. रात में जब पूरा गांव सो जाता तहखाने में उतर रुपया छापते और कलकता भेज देते. घर की माली हालत सुधर गई. तभी पता चला कि केशर बाई को कोढ़ हो गया है और बहुत दुख भरा जीवन जी रही है. उन्होंने बनारस जाकर उसकी बहुत सेवा की मगर वो बच नहीं सकी. बनारस में उसका अंतिम संस्कार कर के वे वापस अपने गांव लौट आए.

जेल यात्रा

केशर बाई की मौत के बाद महेन्दर मिसिर जैसे राग विराग से मुक्त हो चुके थे. देश को आजाद कराना था. आकर पहले की तरह अपने काम में लग गये. कुछ दिनों तक यहां भी सब कुछ ठीक-ठाक चला मगर पता नहीं कैसे अंग्रेज सिपाहियो को पता चल गया कि महेन्दर मिसिर ने अपने घर के नीचे तहखाना बनवाया है और उसी में रूपया छापकर क्रान्तिकारियों को भेजते हैं. मगर उनके पास कोई प्रमाण नहीं था. लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता का आलम ये था कि बिना प्रमाण के हाथ डालने पर लोगों का विरोध झेलना पड़ सकता था. इसलिए अंग्रेजों ने सोच समझ कर एक चाल चली. लालचंद नाम के एक डीएसपी को जांच और प्रमाण जुटाने का जिंम्मा सौंप दिया गया.

लाल चंद एक गरीब आदमी बनकर महेन्दर मिसिर से मिला और नौकर बन कर रहने लगा. लाल चंद रोज महेन्दर मिसिर के लिये पान ले आता और इस तरह जी जान से उनकी सेवा करता कि कुछ ही दिनों में उनका दिल जीत लिया. धीरे-धीरे वह अपने मकसद में कामयाब हो गया और रुपया छापने का राज हासिल कर लिया. एक दिन महेन्दर मिसिर जब रात को रूपया छाप रहे थे. उनके घर छापा पड़ा और महेन्दर मिसिर गिरफ़्तार हो गए.

महेन्दर मिसिर की गिरफ़्तारी के बाद जैसे हलचल मच गयी. उनके जीवन के अलग-अलग पड़ाव पर जो तीन औरतें आई थीं और जिन तीनों का उन्होने भरपूर सहयोग कर बुलन्दियों पर पहुंचाया था सामने आ गयीं. वेश्याओं ने अपने गहने उतारने आरम्भ कर दिये और छोड़ने पर महेन्दर मिसिर के वजन के बराबर सोना देने का प्रस्ताव दे दिया. ऐसा लगता था कि महेन्दर मिसिर बच जाएंगे मगर उस समय सबको निरशा हाथ लगी जब कोर्ट में जज के सामने उन्होने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

लालचन को देख कर महेन्दर मिसिर ने कहा-का बात है रे ललचनवा

लालचन की आंख भर आई, मिसिर जी… इस जीवन में आपके जैसा महान आदमी नहीं देखा.

अपराधी महेन्दर मिसिर आगे जाकर उसने पान का बींडा बढ़ाया और सिर झुका दिया. महेन्दर मिसिर मुस्कराए और बोल पड़े

हंसी-हंसी पानवा खियवले ललचनवा, पिरितिया लगा के भेजवले जेहल खानवा

और महेन्दर मिसिर जेल चले गये.

बटोही

देश आजाद हो गया तो उनके जेल की सजा खत्म हो गई. जब वे जेल से बाहर निकले एक लड्का उन्के इन्तजार मे खडा था. पता चला कि उनकी पहली प्रेमिका बीमार है और मौत के बिस्तर पर पडी है, ने उसे भेजा है. उन्हे याद आया कि उन्होने ये कह कर उसके आदमी को वापस कर दिया था कि एक बार उससे मिलने जरूर आएगे वे आए और उनके हाथ से तुलसी गंगा जल लेने के बाद उनकी पहली प्रेमिका भी चल बसी.

पहली प्रेमिका की मौत के बाद महेंदर मिसिर को अपनी तीसरी प्रेमिका याद आई और वे उससे मिलने कलकत्ता पहुंच गए. वहां जाने के बाद उन्हे पता चला कि उनके जाने के बाद पुलिस आइ थी. उसे पकड कर ले गई और महेन्दर मिसिर के बारे मे पूछ्ती रही. उसने जान देना मंजूर किया मगर महेन्दर मिसिर के बारे मे कुछ नही बताया. महेन्दर मिसिर की आंख भर आई.

मैं तो रहनी जल के मछरिया.. जोगिनिया बनवल हो माधो
माधो छोडि देनी कुल परिवारवा त जोगिन बनवल हो माधो

और महेन्दर मिसिर बटोही बन गए.

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