इस ‘मचान’ ने एक झटके में बदल दी मैथिली की किताबों की दुनिया

पुष्यमित्र

इन दिनों नई दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय पुस्तकमेला में जहां बड़े-बड़े प्रकाशन अपने स्टॉल पर लोगों को जुटाने के लिए तरह-तरह के आजमाइशों का सहारा ले रहे हैं. लेखक अपने किताबों का प्रचार करने में जुटे हैं, कुछ संस्थानों ने तो कौड़ियों के दाम अपनी किताबों को बेचने के लिए फेरी वालों तक को हायर कर लिया है. एक छोटे से बुक स्टॉल पर अनायास ही भीड़ उमड़ रही है. इतनी भीड़ के पास-पड़ोस के बुक स्टॉल वाले बार-बार परेशान होकर इसकी शिकायत कर आते हैं. स्टॉल वाले को चेतावनी भी मिल चुकी है. मगर फिर भी इस स्टॉल पर किसी भी वक्त दस से अधिक लेखक और 50 के अधिक पाठक नजर आ जाते हैं. इसी साल लगे इस छोटे से स्टॉल से अमूमन रोज 35 से 40 हजार रुपये की किताबें बिक रही हैं. इस स्टॉल का नाम मैथिली मचान है.

यह दिलचस्प है कि कभी पटना पुस्तक मेला में भी बिक्री के लिए उपलब्ध नहीं हुई मैथिली की किताबें देश की राजधानी में लगे अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला में इस तरह के बिक रही है. और यही इस बुक स्टॉल की सफलता है, यहां रोज लगने वाली भीड़ का राज है. यह किसी प्रकाशक का स्टॉल नहीं है. यह दो मैथिली प्रेमियों के विचार और उसकी योजना की सफलता है, जिन्होंने ठान लिया था कि दिल्ली के इस अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला में वे मैथिली की किताबें भी बेच कर दिखायेंगे. इसके लिए उन्होंने पहले लड़कर एनबीटी से स्टॉल अलॉट कराया. देश भर के और नेपाल तक के प्रकाशकों से मैथिली की किताबें मंगवायी. कई स्वतंत्र लेखकों से भी उनकी व्यक्तिगत किताबें मंगवायी. बिहार की मैथिली अकादमी की किताबें खरीदकर इस स्टॉल पर रखवाया और आज इस स्टॉल पर इतनी किताबें हैं कि खड़े रहने की जगह नहीं मिलती.

स्टॉल में रखी किताबों का ढेर

इस आयोजन को अंजाम तक पहुंचाने वाली सविता झा खान बताती हैं कि इस स्टॉल पर भारत और नेपाल के मैथिली की किताबें छापने वाले 40-45 प्रकाशकों की किताबें हैं, इसके अलावा 150 लेखकों के व्यक्तिगत टाइटल हैं. कुछ 350 से अधिक टाइटल वे इस छोटे से स्टॉल से बेच रही हैं. किताबों को सजाने की भी गुंजाइश नहीं है. इसके बावजूद औसतन रोजाना 35 से 40 हजार की किताबें बिक रही हैं. लेखक और प्रकाशक खुद अपनी किताबों को प्रमोट कर रहे हैं. स्टॉल का क्रेज देखकर कई गैर-मैथिली भाषी भी यहां आकर मैथिली के बारे में पूछ-ताछ करते हैं. लीलाधर मांडलोई जैसे लेखकों ने आकर जानकारी ली. और तो और साहित्य अकादमी के अध्यक्ष भी खुद पहुंच गये और उन्होंने अपनी मैथिली की किताबें बड़ी संख्या में इस स्टॉल पर भेज दीं कि आप बेचिये.

वे बताती हैं कि इस स्टॉल पर उमड़ रही भीड़ की वजह यह भी है कि दिल्ली में बड़ी संख्या में मैथिली भाषी रहते हैं. उन्होंने अपने कल्चर को, साहित्य को कभी इस तरह प्रोमोट होते नहीं देखा. वे लोगों को पकड़-पकड़ कर यहां लाते हैं. इसके अलावा बड़ी संख्या में यूपीएससी की तैयारी करने वाले छात्र भी हैं, जिन्हें यहां मैथिली का टेक्स्टबुक मिल जा रहा है. बड़े-बडे लेखकों जैसे वैद्यनाथ मिश्र यात्री, राजकमल चौधरी, हरिमोहन झा, लिलि रे, उषा किरण खान, शेफालिका वर्मा, उदय नारायण चौधरी नचिकेता, प्रदीप बिहारी आदि की किताबें तो उनके नाम से ही बिक जा रही हैं.

मगर यह सब करना इतना आसान नहीं था. इस प्रयोग की कहानी बताते हुए सविता झा खान कहती हैं कि पिछले साल इस पुस्तक मेले का थीम मानुषी था. तब हमने मैथिली की कुछ महिला लेखिकाओं की किताबें प्रदर्शन के लिए यहां लगवाई थी. उस वक्त कई पुरुष लेखकों ने शिकायत की थी कि हमारी किताबें क्यों नहीं. फिर जब इस बार पुस्तकमेला की तैयारी होने लगी तो हमने दिल्ली की मैथिली-भोजपुरी अकादमी से संपर्क किया और कहा कि आप क्यों नहीं स्टॉल लगाते. इस पर उन लोगों ने कहा कि हमारा अपना कोई पब्लिकेशन नहीं है, और हम दूसरों की किताबें बेच नहीं सकते.

फिर मैंने और मेरे साथी अमित आनंद ने तय किया कि हम अपना ही स्टॉल लगायेंगे और सभी लेखकों, प्रकाशकों की किताबें इस पर रखेंगे. हमने एनबीटी में स्टॉल के लिए संपर्क किया तो पता चला कि आवेदन की तारीख गुजर चुकी है. फिर हमने कहा कि चाहे आप लेट फी ले लीजिये, मगर मैथिली का एक स्टॉल पर तो हक बनता ही है. हमने मजबूती से अपनी बात रखी और एनबीटी आखिरकार तैयार हो गया.

फिर हमने किताबें मंगवानी शुरू की. और प्रकाशकों ने तो काफी उत्साह दिखाया. मगर मैथिली के सबसे बड़े प्रकाशक बिहार मैथिली अकादमी ने कोई रेस्पांस नहीं दिया. फिर हमने उनकी जरूरी किताबें ही खरीद लीं. अमित जी ने नेपाल के प्रकाशकों से भी संपर्क किया और वहां से भी खूब किताबें आयीं. हमने मैथिली मचान नाम रखे. कई इवेंट तय किये. ऑनलाइन पेमेंट के लिए पॉश मशीन लिया.

राम नाईक और एनबीटी के संपादक बलदेव भाई शर्मा स्टॉल पर

हालांकि फिर भी यह कोई आसान काम नहीं था. हमारी टीम बहुत छोटी है. दो नवयुवक अमित औऱ उत्पल और मैं महिला. इसके अलावा रिपुंजय हमारी मदद करते रहे हैं. हमारे पास किताबें खूब हो गयी थीं. कई लेखकों ने तो अपनी एक ही किताब की 150 प्रतियां भेज दी थीं, हमें भी अंदाजा नहीं था. उन किताबों को पुस्तक मेला गेट से स्टॉल तक ढोकर लाना-फिर ले जाना. गेट से स्टॉल की दूरी अमूमन डेढ़ किमी है. फिर रोज स्टॉल में सफाई करना किताबों को सजाना. उनकी इंडेक्सिंग करना. बिल के लिए रसीद तैयार करना. फिर लेखकों का स्वागत करना. उन्हें रोज गेट से लाना और फिर वहां पहुंचाना. फिर कई इवेंट्स का संचालन. सब इतना हेक्टिक है कि रोज घर पहुंचते-पहुंचते हम बेहोश हो जाते हैं. फिर सुबह उठकर यही सब. मैंने जीवन में कभी इतनी मेहनत नहीं की है.

इसके बावजूद खुशी है कि इस मेहनत का नतीजा सामने आ रहा है. खबर मिली है कि हिंदी के की बड़े प्रकाशक अब मैथिली में किताबें छापने की योजना बना रहे हैं. यह देखकर अच्छा लगता है कि एक दिन एक बूढ़ी औरत पांच किताबें लेकर आयीं और कहने लगीं कि मेरी बहन की किताबें हैं, क्या आप यहां रख सकती हैं. लोग कहते हैं कि मैथिली की किताबें कभी इस तरह से नहीं बेची गयी. एक बाजार बन रहा है. क्रेज है. बज क्रियेट हो रहा है.

हमारा अगला लक्ष्य पटना में मैथिली मचान का स्टॉल लगाना है. वहां एनबीटी का मेला शायद फरवरी में लगेगा. देश की राजधानी में तो यह सब हो गया, अब राज्य की राजधानी में भी यह काम करना है.

 

Spread the love

Related posts

One Thought to “इस ‘मचान’ ने एक झटके में बदल दी मैथिली की किताबों की दुनिया”

  1. प्रवीण नारायण चौधरी

    वाकई बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य इन्होंने किया है।