इस बिहारी राजनेता ने दी थी नेताजी के साइबेरिया में कैद होने की कांस्पिरेसी को हवा

नोट- इस आलेख का मकसद कहीं से इस बहस में नहीं पड़ना है कि 1945 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु हुई थी या नहीं. क्योंकि उनकी जांच के लिए गठित तीन आयोगों में से दो मान चुकी है कि नेताजी की मौत विमान हादसे में हुई थी और सरकार भी इस बात को स्वीकार कर चुकी है. हम उस राजनेता की भूली-बिसरी कहानी सामने लाना चाहते हैं, जिसने नेताजी के जिंदा होने के दावे के पक्ष में सबसे सनसनीखेज तथ्य पेश किये थे.

पुष्यमित्र

यह कहानी दरभंगा के पूर्व सांसद और राजनयिक सत्य नारायण सिंहा की है, जिन्होंने 1965 में नेताजी मिस्ट्री के नाम से एक सनसनीखेज किताब लिखी थी और उस किताब में उन्होंने दावा किया था कि सुभाष चंद्र बोस जिंदा हैं और साइबेरिया की याकुत्सक जेल में बंद हैं. उन्होंने दावा किया था कि उनकी 1954 में मॉस्को में एक विद्रोही कोजोलोव से मुलाकात हुई थी, जिसने उन्हें बताया था कि नेताजी को सेल नंबर 45 में रखा गया है. इस दावे के मुताबिक भारतीय विद्रोही अबनी मुखर्जी को भी उसी जेल में सेल नंबर 53 में रखा गया था. बाद में सत्य नारायण सिंहा ने यही बात 1970 में खोसला कमीशन के आगे भी दुहराई, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मृत्यु का रहस्य पता लगाने के लिए गठित की गयी थी.

नेताजी की रहस्य मृत्यु को लेकर तीन जांच आयोग गठित हुए. पहला 1956 में शाहनवाज कमेटी जिसने माना कि नेताजी की मृत्यु विमान हादसे में ही हुई थी. क्योंकि उसने उस विमान हादसे में सुरक्षित बचे आधा दर्जन से अधिक लोगों का बयान लिया था. दूसरे खोसला कमीशन ने भी शाहनवाज कमेटी की रिपोर्ट को सच माना और तीसरे मुखर्जी आयोग ने नेताजी की मौत को संदेहास्पद बताया.

बहरहाल एक वक्त में सत्यनारायण सिंहा ने कहा था
” आज जो स्थिति है, उसके हिसाब से नेताजी के रूस में होने के बारे में पता न लगाना बहुत बड़ी भूल होगी. आने वाला वक्त हमें इस भूल के लिए कभी माफ नहीं करेगा.”

खोसला कमीशन के सामने सत्यनारायण सिंहा ने कहा था कि वे इस मामले की जांच करने के लिए 1964 में ताइपे में उस जगह भी गये थे, जहां के बारे में कहा जाता है कि विमान हादसा हुआ था. वहां उन्होंने जांच की और कई तसवीरें ली. अपनी किताब में उन्होंने लिखा है कि अगस्त, 1945 में उस जगह पर कोई विमान हादसा नहीं हुआ था. जो हादसा हुआ था वह अक्तूबर, 1945 में हुआ था. उन्होंने कहा कि ताइपे की यात्रा के लिए पैसे उन्हें उनके लंदन वाले पब्लिशर ने दिये थे. हालांकि इस यात्रा के बारे में कई विरोधाभाषी बातें सामने आयी. और कमेटी ने माना कि यह यात्रा एक भारतीय डेलिगेशन के साथ किसी और मकसद से हुई थी और उन्होंने वहां के राजनेताओं से मुलाकात भी की थी.

उन्होंने खोसला कमीशन के सामने सभी तथ्य रखे और यह भी कहा कि नेहरू जी को भी उन्होंने दो दफा इस बात की व्यक्तिगत तौर पर जानकारी दी थी. मगर उन्होंने इस बात में रुचि नहीं ली. उन्होंने इस आयोग को यह भी बताया था कि 1954 में नेहरू जी के मना करने की वजह से ही वह नेताजी की मौत की जांच करने वाली शाहनवाज कमेटी के सामने उपस्थित नहीं हुए थे. बाद में उन्होंने नेहरू जी को कहा था कि यह रिपोर्ट तो बिल्कुल बचकानी है.

कमीशन ने उनसे कई सवाल पूछे. उन्होंने चीन के जासूसों का भी हवाला दिया, जो भारत में थे और उनसे संपर्क करके उन्होंने यह जानकारी दी थी. कमीशन ने जब उनसे यह पूछा कि क्या वे उस अस्पताल में गये थे, जहां कहा जाता है कि नेताजी ने आखिरी सांस ली थी, उन्होंने इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि मैं सिर्फ यह जांच करने गया था कि हवाई दुर्घटना हुई थी या नहीं.

हालांकि कमीशन ने उनकी बातों को विरोधाभाषी और अतिरंजना पूर्ण माना और अंततः शाहनवाज कमेटी की रिपोर्ट से ही सहमति जतायी कि नेताजी की मौत विमान हादसे में ही हुई थी. कमीशन ने राय दी कि वे झूठ गढ़ने में माहिर व्यक्ति थे. उन्होंने कमीशन के सामने यह भी दावा किया था कि वे भगत सिंह को फंड देने के लिए 13-14 साल की उम्र से ही डकैती करने लगे थे.

उन्होंने खोसला कमीशन के सामने यह भी कहा था कि उन्हें रफी अहमद किदवई द्वारा नेहरू जी के स्पेशल फंड से पैसे मिलते थे, जिससे वे विदेश में भ्रमण करते हुए भारतीय मसलों पर निगाह रखते थे. उन्होंने नेताजी के मसले पर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भी जानकारी दी थी. मगर राधाकृष्णन ने उन्हें मौन रहने की हिदायत दी थी.

सत्य नारायण सिन्हा का जन्म 9 जुलाई, 1900 को दरभंगा ज़िले में ‘शम्भूपट्टी’ में हुआ था. 1920 में वे स्वतंत्रता आंदोलन में सम्मिलित हुए. 1926-1930 तक इन्हें बिहार लेजिस्लेटिव कौंसिल का सदस्य बनाया गया. 1934 और 1945 में सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के सदस्य निर्वाचित हुए थे. वे 1948-1952 के बीच संसदीय कार्य के राज्य मंत्री रहे. उन्होंने पहली से चौथी लोकसभा तक में दरभंगा और समस्तीपुर का प्रतिनिधित्व किया. उ्नहोंने केंद्र सरकार में संसदीय कार्य, सूचना तथा प्रसारण मंत्री, स्वास्थ्य परिवार नियोजन तथा नगरीय विकास मंत्री का पद संभाला. 9 मार्च, 1971 से 12 अक्टूबर, 1977 तक वे मध्य प्रदेश के राज्यपाल भी रहे.

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