इस भागलपुरवासी को भी मिला है साहित्य अकादमी पुरस्कार

बिहार कवरेज

साहित्य अकादमी पुरस्कार देश के 24 भाषाओं की रचनाओं के लिए दिया जाता है, मगर चर्चा में हर बार सिर्फ हिंदी का साहित्य अकादमी पुरस्कार रहता है. जैसे इस बार तीन बिहारी लेखकों को साहित्य अकादमी पुरस्कार देने की घोषणा की गयी है. मैथिली के लेखक उदय नारायण सिंह नचिकेता को साहित्य अकादमी मिलने की चर्चा कहीं-कहीं जरूर हुई, बांकी दो लेखकों की कहीं चर्चा नहीं हुई. उनमें से एक डॉ. निरंजन मिश्र हैं, तो दूसरे इंद्रकांत झा हैं. इंद्रकांत झा को तो गुजराती से मैथिली में अनुवाद के लिए यह पुरस्कार मिला है. मगर डॉ. निरंजन मिश्र को संस्कृत भाषा की उनकी रचना के लिए यह सम्मान देने की घोषणा हुई है.

भागलपुर के भ्रमरपुर गांव के रहने वाले डॉ. निरंजन मिश्र को यह सम्मान उनके महाकाव्य ‘गंगापुत्रावदानम’ के लिए दिया गया है. यह महाकाव्य उन्होंने संत संत निगमानंद के जीवन पर लिखा है. संत निगमानंद वही हैं जिन्होंने गंगा की अविरलता, स्वच्छता के लिए आमरण अनशन किया था और इस अनशन के दौरान ही उनकी मृत्यु हो गई. इस महाकाव्य में उनके जीवन का वर्णन है, साथ ही यह भी कि उन्होंने गंगा की अविरलता के लिए क्या-क्या किया, कैसी-कैसी यातनाएं झेलीं और गंगा की अविरलता क्यों आवश्यक है. 23 अध्याय और 350 पृष्ठों का यह महाकाव्य 2013 में प्रकाशित हुआ था.

इस वक्त हरिद्वार के भगवानदास आदर्श संस्कृत महाविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत डा. निरंजन मिश्र ने भ्रमरपुर गांव स्थित दुर्गा संस्कृत उच्च विद्यालय से 1981 में मध्यमा, राजकीय संस्कृत महाविद्यालय भागलपुर से 1983 में उपशास्त्री की पढ़ाई की है. दरभंगा के लगमा स्थित आदर्श संस्कृत महाविद्यालय से 1986 में शास्त्री और कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय से 1988 में आचार्य और 1990 में पीएचडी की उपाधि हासिल की. उन्होंने ललित नारायण मिथिला विवि से 1992 में एमए की डिग्री हासिल की.

उन्होंने अब तक करीब 20 महाकाव्य और उपन्यास लिखे हैं. इसमें ‘ग्रंथिबंदनम’ और ‘केदारघाटी विधवा बभुब’ आदि प्रमुख हैं. उनकी इस कृति ‘गंगापुत्रावदानम’ को कालिदास अकादमी उज्जैन से कालिदास पुरस्कार भी मिल चुका है.

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