1930 के दशक का एवरेस्ट मिशन, पूर्णिया और एक ऑस्कर अवार्ड विनिंग फिल्म की पूरी कहानी

सुशांत भास्कर

हम यह जानते हैं कि 29 मई 1953 को पहली बार माउंट एवरेस्ट पर न्यूजीलैंड के एडमंड हिलेरी और नेपाली मूल के भारतीय नागरिक तेनसिंह नोर्गे शेरपा चढ़े थे. किन्तु आज की पीढ़ी को यह जानकारी नहीं है कि पूर्णिया जिला से 1930 के दशक में माउन्ट एवरेस्ट पर एक हवाई जहाज ने उड़ान भरा था और उसके ऊपर एक फ़िल्म भी बनी थीं जिसे ऑस्कर अवार्ड मिला था. इस उड़ान से एवरेस्ट के शिखर का न केवल पहली बार तस्वीर लिया गया बल्कि दुनिया को एवरेस्ट पर चढ़ने का सुगम रास्ता भी बताया गया. इस अभियान से पहले अधिकतर प्रयास चीन के रास्ते से हो रहा था किन्तु इस अभियान ने नेपाल के रास्ते से एवरेस्ट पर फतह की संभावना जताई. यह खुशी की बात है कि मिथिला के युवा फ़िल्मकार दीपेश ने एवरेस्ट मिशन के मुख्य ऑब्ज़र्वर स्टीवर्ट ब्लैकर के जीवन से संबंधित  पुस्तक के संपादक Barnaby Blacker से सम्पर्क स्थापित किया और तिरहुत में हवाई जहाज के कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को लेकर सामने आए हैं.

1930 के दशक में पूर्णिया के लाल बालू  मैदान से संसार की सबसे ऊंची चोटी माउन्ट एवरेस्ट को फतह करने के लिये हवाई जहाज़ को भेजा गया था. इस मिशन पर 1933 में एक फ़िल्म बनी जो 1934 में रिलीज़ हुई और 1936 में ऑस्कर पुरस्कार मिला.

सतरहवीं शताब्दी में अंग्रेज भारत आये, अठारहवीं शताब्दी में शासन शुरू किया और उन्नीसवीं शताब्दी में शोषण दोहन के साथ कुछ कार्य भी किये. 1808 में भारत के तमाम पर्वतों के लिये सर्वेक्षण का काम करना शुरू किया गया. 1830 के बाद हिमालय के करीब सर्वे का काम शुरू हुआ और 1830 से 1843 तक भारत के सर्वेयर जनरल रहे जॉर्ज एवेरस्ट ने अपने कार्यकाल में ऐसे कई उपकरण बनाये, जिनका सटीक सर्वे करने में इस्तेमाल किया जा सकता है. जॉर्ज एवेरस्ट 1862 में रॉयल जिओग्राफिक सोसाइटी के वाईस प्रेसिडेंट भी रहे. उनीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में यह तय हो गया था कि नेपाल में ही संसार की सबसे ऊंची चोटी है और नामकरण इन्हीं सर्वेयर जनरल जॉर्ज एवरेस्ट के नाम पर पड़ा, माउन्ट एवरेस्ट.

जहाँ एक ओर उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक माउन्ट एवरेस्ट की जानकारी मिल गयी थीं वही दूसरी ओर बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दौर में दो अमरीकन राइट बंधु (ऑरविल और विलबर) ने आधुनिक हवाई जहाज का निर्माण किया. इन्होंने ही 17 दिसंबर 1903 को संसार की सबसे पहली सफल मानवीय हवाई उड़ान भरी जिसमें हवा से भारी विमान को नियंत्रित रूप से निर्धारित समय तक संचालित किया गया. कई तरह के प्रयोगों के बाद मशीन और बाइसिकल के साथ काम करते करते इन्हें यह विश्वास हो गया कि वायुयान जैसे असंतुलित वाहन को भी अभ्यास के साथ संतुलित और नियंत्रित किया जा सकता है. इनके बाइसिकल की दुकान के कर्मचारी चार्ली टेलर ने भी इनके साथ बहुत काम किया और इनके पहले यान का इंजन बनाया.

इस प्रकार की तत्कालीन दोनों बड़ी उपलब्धि के बाद ब्रिटिश भारत में बंगाल प्रेसिडेंसी के पहले जिला पूर्णिया का चयन एयर बेस कैम्प के रूप में इसकी भौगोलिक स्थिति के कारण  किया गया और यहीं से हेलीकॉप्टर के द्वारा माउन्ट एवरेस्ट पर फतह की शुरुआत के लिये तमाम प्रकार के प्रयास शुरू किये गये और इन्हीं प्रयासों का गवाह बना पूर्णिया.

फिल्मकार दीपेश बताते हैं कि कुछ माह पूर्व उन्होंने Facebook पर एक तस्वीर में दरभंगा महाराज को एक ग्लैडर के साथ देखा था और तभी उनके अंदर यह जिज्ञासा जगी कि आखिर यह ग्लैडर भारत में दरभंगा महाराज के पास कहां से और किस प्रयोजन के लिए आया. एक सवाल के जवाब में दीपेश जी ने मुझसे पूछा भी था कि दरभंगा महाराज के पास जहाज के बारे में कोई जानकारी है तो मैंने कहा था- “नहीं”. जहाज के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता किन्तु बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में इनके महल के परिसर में रेलवे लाइन थी और रेलवे टर्मिनल था. दीपेश ने अपने स्तर से इसे ढूंढना शुरू किया. पेन एंड स्वार्ड पब्लिशर्स यूनाइटेड किंगडम के द्वारा 28.11. 2006 को प्रकाशित “The Adventures and inventions of Stewart Blacker Soldier Aviator weapons inventor”  पुस्तक में इनको कुछ जानकारी मिली तो इन्होंने इस पुस्तक के सम्पादक से संपर्क किया औऱ सम्पादक Barnaby Blacker ने दीपेश को बताया कि Stewart Blacker 1930 के दशक वाले दिनों में भारतीय सेना में मेजर के पद पर थे और उनकी काबिलियत पर उन्हें विंग्स ओवर एवरेस्ट मिशन का मुख्य ऑब्जर्वर बनाया गया था. स्टीवर्ट मुख्यतः भारतीय सेना में 1907 से 1942 तक कार्यरत थे.

इस विषय पर इसमाद ने भी इस पर एक आलेख छापा था. इसके अनुसार इस मिशन के लिये लंदन से कराची, जोधपुर, दिल्ली, इलाहाबाद के रास्ते 20 मार्च 1933 को दो विमान पूर्णिया के लाल बालू मैदान में उतरा था. यह बिहार के विमानन इतिहास का पहला मौका था जब कोई विमान इस जमीन पर उतरा था.

27 मार्च,1933 के लीड्स मरकरी नामक समाचार पत्र के अनुसार मिशन रुक गया था. मिशन 3 अप्रैल 1933 को भारत में पूर्णिया से दो विमानों के इस्तेमाल से शुरू हुआ था, क्लाई डेस डेल और लेफ्टिनेंट डेविड मैकेंटियर ने उड़ान भरा था. 13 अप्रैल,1933 लीड्स मरकरी नामक समाचार पत्र के अनुसार मिशन कामयाब होने की जानकारी प्रकाशित हुई.

इस संबंध में यह भी जानकारी मिली है कि विमान पर दबाव नहीं था लेकिन उन्होंने बोतल ऑक्सीजन का इस्तेमाल किया था. कुछ लोग विमान में शायद बिना ऑक्सीजन के ही चले गए थे,  इस कारण पूर्णिया से उड़ान भरने के मात्र आधे घण्टे बाद 40 मील की दूरी पर फारबिसगंज में इमरजेंसी लैंडिंग की गयी थी जबकि विमान 19000 फीट की ऊँचाई पर था और एवरेस्ट दिखाई दे दिया था. यह इमरजेंसी लैंडिंग की घटना 26 मार्च की है.

मिशन एवरेस्ट इवेन्ट को कैमरे की नज़र में कैद किया गया था और फिर इसी से फ़िल्मकार ने wings over Mt Everest नामक एक वृतचित्र बनाया.

यह वृतचित्र ज्योफ्री बार्कास और इवोर मोंटेगु द्वारा निर्देशित है जो 1934 में रिलीज़ हुई थी. इसे ब्रिटिश लघु वृत्तचित्र फिल्म के रूप में ऑस्कर पुरस्कार के लिए भेजा गया था और इसने 1936 में सर्वश्रेष्ठ डॉक्युमेंट्री के लिए एक अकादमी पुरस्कार जीता. यह वृतचित्र वस्तुतः 1933 ह्यूस्टन-वेस्टलैंड अभियान का वर्णन करता है, जिसमें डगलस डगलस-हैमिल्टन, 14 वें ड्यूक ऑफ हैमिल्टन, क्लाइडडेसडेल के रूप में जाना जाता है,  ने तीन अप्रैल 1933 को एक एकल-इंजन वाली जहाज में उड़ान भरा था. एवरेस्ट की दक्षिणी शिखर दिखाई दी थी. फ़िल्म में एवरेस्ट के वास्तविक दृश्यों को रिकॉर्ड किया गया था. इसके अलावे ब्रेकिंग फ्लाइट और थियेटर से निर्मित दृश्यों को भी फिल्माया गया था. इस फ़िल्म की विशेषता यह बन गयी थी कि इसमें अभिनेता की बजाय वास्तविक लोगों का ही उपयोग किया गया था.

फ़िल्म निर्देशक – जेफरी बरकास और इवर मॉन्टग्यू

छायांकन – एस आर बोनेट, अल फिशर और जे रोसेन्थल

रिलीज़ की तारीख -जून 1934

समय – 22 मिनट

देश – यूनाइटेड किंगडम

भाषा – अंग्रेज़ी

पूरी फिल्म देखें

निश्चित रूप से यह फ़िल्म 1936 में संयुक्त राज्य में ऑस्कर तो जीता ही था,  इस फ़िल्म की हवाई तस्वीरें पर्वतारोहियों के लिये सहायक साबित हुई और टेनेजिंग और हिलेरी के अभियान में यह उपयोगी रही. आगे भी यह फ़िल्म पर्वतारोहियों द्वारा उपयोग में लाई गयी.

इस सम्पूर्ण मिशन के संबंध में कहा जाता है कि दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह ने भी प्रायोजित किया था जबकि गढ़ बनैली स्टेट, हरिपुर और मुरहों के जमींदारों ने हॉस्पिटैलिटी मुहैया कराते हुए इस प्रकिया में बढ़ चढ़ कर भाग लिया था. इस मिशन और वृतचित्र को लेडी हडसन ने आर्थिक मदद प्रदान किया था. वृतचित्र में कहीं भी दरभंगा या दरभंगा महाराज के संबंध में किसी भी जगह कोई चर्चा नहीं की गयी है, यह विचारणीय प्रश्न है.

1930 के दशक में हुई इस ऐतिहासिक घटना के संबंध में बिहार वासियों को भी विस्तार से कोई जानकारी नहीं है.

हाल के वर्षों में The Adventures and … नामक पुस्तक के सम्पादक Barnaby Blacker ने ही wings of Mount Everest नामक वृतचित्र को यूट्यूब वीडियो पर 07 जनवरी 2016 को डाला है.

Spread the love
  • 103
    Shares

Related posts