‘तेजस मैन’ जैसे सौ-पचास लोग होते तो प्रैक्टिकल परीक्षाओं में ऐसी जगहसाई नहीं होती

P.M.

आइएससी के बच्चे माइक्रोस्कोप नहीं पहचान पा रहे, बीकर और फ्लास्क में फर्क नहीं कर पा रहे. यह किसी एक बच्चे या किसी एक स्कूल की कहानी नहीं है. यह वह सच्चाई है जो इन दिनों प्रायोगिक परीक्षाओं के दौरान उजागर हो रही है. ऐसा लग रहा है कि बिहार में पहली दफा प्रैक्टिकल की परीक्षाएं हो रही हैं. जगह-जगह बच्चे लैब के उपकरणों से जूझ रहे हैं. लाचार होकर शिक्षकों को खाना-पूर्ति भी करनी पड़ रही है. सबसे प्रैक्टिकल करवाना भी आसान नहीं है. क्योंकि छोटे से लैब में तीन घंटे के अंदर कितने लोग प्रैक्टिकल कर पायेंगे? काश बिहार में तेजस मैन, मानस बिहारी वर्मा जैसे सौ-पचास लोग होते तो आज यह जगहसाई नहीं होती. उन्होंने दो मोबाइल वैन की मदद से तीन सौ स्कूलों में प्रैक्टिकल की वह सुविधा उपलब्ध करायी है, जो सरकारें भी नहीं कर पाती हैं.

पिछले साल प्रैक्टिकल परीक्षा के कारण भीषण शर्मिंदगी झेल चुकी बिहार सरकार ने इस बार तय कर लिया है कि प्रैक्टिकल परीक्षा कड़ाई से होगी. वरना अब तक छात्र-छात्राएं मानकर चलते हैं कि प्रैक्टिकल में तीस में तीस नहीं तो 28 पाना तो उनका जन्मसिद्ध अधिकार है. भले वे कुछ करना जाने न जाने, उनका काम प्रैक्टिकल कॉपी सजाकर जमा कर देना है. इसी व्यवस्था का नतीजा यह हुआ कि पिछले साल एक युवक संगीत की प्रैक्टिकल परीक्षा में सर्वोच्च अंक हासिल कर बिहार में टॉप कर गया और जब बाद में उससे पूछा गया तो उसे सुर-ताल का भी पता नहीं था.

लिहाजा इस साल यह नियम लागू किया गया कि प्रैक्टिकल परीक्षाएं होम सेंटर में नहीं होंगी. दूसरे सेंटरों में होंगी. जाहिर सी बात है, ऐसे में बच्चे बिना तैय़ारी के खुद को जंग में उतरा महसूस कर रहे हैं. क्योंकि साल भर किसी स्कूल में प्रैक्टिकल की कक्षाएं शायद ही हुई होंगी. अगर ये कक्षाएं नहीं हुईं तो इसमें दोष छात्र-छात्राओं का भी है, जो स्कूल और कॉलेज में जाने के बदले कोचिंग इंस्टीच्यूट में कक्षाएं करते हैं. सरकार ने तो लैब की काम चलाऊ व्यवस्था भी कर दी है.

दरअसल अपने यहां परीक्षाएं अब सिर्फ सर्टिफिकेट हासिल करने का जरिया बन गयी हैं. बच्चे स्कूल-कॉलेज से उतना ही रिश्ता रखते हैं, जितने से उनका काम चल जाये. ऐसे में विज्ञान शिक्षा का मतलब वैज्ञानिक हासिल करना नहीं है. मध्य प्रदेश के हौशंगाबाद में कई साल पहले बच्चों को विज्ञान शिक्षा से जोड़ने का प्रयास शुरू हुआ था, वह काफी हद तक कारगर भी हुआ. मगर बिहार में ऐसा कुछ हो नहीं पाया.

हालांकि हाल के दिनों में प्रसिद्ध वैज्ञानिक मानस बिहारी वर्मा ने अपने इलाके में ऐसा अनूठा काम किया है, जिससे बच्चों में वैज्ञानिक चेतना का विकास होने की उम्मीद जगी है. पूर्व राष्ट्रपति एपीजे कलाम के सहयोगी और तेजस विमान के निर्माण टीम के अगुआ मानस बिहारी वर्मा रिटायर होने के बाद इन दिनों दरभंगा में रहने लगे हैं. उन्होंने वहां विकसित भारत फाउंडेशन नामक संस्था का गठन किया है, जो दरभंगा, मधुबनी और सुपौल के तीन सौ से अधिक स्कूलों के बच्चों को प्रायोगिक शिक्षा उपलब्ध करा रही है.

दरअसल यह बड़ा काम दो मोबाइल प्रैक्टिकल वैन की मदद से किया जा रहा है. इनमें एक में कंप्यूटर और दो में बेसिक विज्ञान के विषयों से संबंधित बॉक्स हैं. मोबाइल लैब उन स्कूलों में पहुंच रहा है, जहां के छात्र विज्ञान प्रैक्टिकल के किसी उपकरण को पहचानते तक नहीं. एक मोबाइल लैब गाड़ी में 11 बॉक्स होते हैं, जिसमें तीन लाइफ साइंस, चार भौतिकी, तीन रसायन और एक गणित का बॉक्स होता है. इन बॉक्सों को एक स्कूल में दो सप्ताह के लिए छोड़ा जाता है. इन दो सप्ताह में फाउंडेशन के साइंस इंस्ट्रक्टर बच्चों से विज्ञान के प्रैक्टिकल करवाते हैं. वहीं 30 लैपटॉप से लैस कंप्यूटर मोबाइल लैब भी हैं. इनके इंस्ट्रक्टर बच्चों को एक साल का कंप्यूटर कोर्स तीन माह में कराते हैं.

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