हमारे लाखों बैंककर्मियों की दुनिया का भयावह दस्तावेज़

रवीश कुमार बैंक कर्मचारियों के सैंकड़ों मैसेज पढ़ गया. उनकी व्यथा तो वाक़ई भयानक है. क्या किसी को डर नहीं है कि दस लाख लोगों का यह जत्था उसे कितना राजनीतिक नुकसान पहुंचा सकता है? कई दिनों से हज़ारों मेसेज पढ़ते हुए यही लगा कि बैंक के कर्मचारी और अधिकारी भयंकर मानसिक तनाव से गुज़र रहे हैं. उनके भीतर घुटन सीमा पार कर गई है. आज जब बैंकों को बेचने की बात हो रही है तो याद आया है कि तब क्यों नहीं हो रही थी जब नोटबंदी हो रही…

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