उस फकीर उस्ताद की याद में

निराला बिदेसिया सवाल-‘‘कुछ गाते हो?’’ जवाब- नहीं उस्ताद. सवाल- कोई साज बजाने का सउर है? जवाब- ना उस्ताद. पहले थोड़ा मुंह बिचकाये. मेरे चेहरे पर निराशा के भाव छा गये. अगले ही पल वे बच्चों जैसा खिलखिलाते हुए मेरे पीठ पर हाथ फेरते हुए कहने लगे- एका मतलब ई हुआ कि एकदम बेसुरे हो तुम. तब फिर का बात करोगे संगीत पर मुझसे! फिर अगला सवाल—अच्छा ई बताओ कि गीत—संगीत पर कुछ जानते भी हो? मेरा जवाब होता है— रुचि है कला में, गीत—संगीत में, अनुरागी हूं कला का. ठहाका…

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