बिहार के इस गांव ने तय किया है, अब किसी की मौत पर नहीं होगा भोज

सांकेतिक तसवीर रूपेश कुमार मृत्यु भोज की प्रथा गरीबों को कैसे भीतर से तोड़ देती है यह किस्सा हम प्रेमचंद के गोदान के वक्त से पढ़ते आये हैं. हम सब जानते हैं कि कई बार इसके लिये ली गयी कर्ज को दूसरी पीढ़ी भी झेलती है. मगर हम इस क्रूर सामाजिक परंपरा को आज तक बदल नहीं पाये. पैसे वाले लोग श्राद्ध भोज को किसी जश्न की तरह करते हैं और दसियों लाख लुटाते हैं, जैसे इससे उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती हो, गरीबों के लिए यह परंपरा बोझ बन जाती है.…

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