मराठाओं ने अछूत मानकर सेना में जगह नहीं दी, महारों ने लड़कर अपनी ताकत दिखा दी

कोरेगांव शौर्य दिवस पर बड़ा कंफ्यूजन है, कुछ लोगों को लग रहा है कि दलित इस मुद्दे पर मराठाओं पर विदेशी ताकतों की जीत का जश्न मना रहे हैं, यह कैसा जश्न है. मगर भीमा कोरेगांव की कहानी बिल्कुल अलहदा है. यह अंगरेजों की जीत का जश्न नहीं, उन पांच सौ महार दलित सैनिकों की शौर्य की गाथा है, जिन्हें जातीय दर्प में मराठाओं ने अपनी सेना में जगह नहीं दी थी. संजय तिवारी जी ने विस्तार से लिखा है… संजय तिवारी पुणे महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी कही जाती है.…

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