नीलहे गये-मिलहे आये #चंपारण-गांधी के बाद -3

  हालांकि यह क्षणिक मामला था. सिर्फ बदला लेने के लिये नील प्लांटर सालों तक खेती नहीं कर सकते थे. तमाम कोशिशों के बावजूद नील प्लांटरों के घाटे की भरपाई नहीं हो सकी. 1920 के बाद धीरे-धीरे नील प्लांटरों ने अपनी कोठियों को बेचकर यहां से जाना शुरू कर दिया. चंपारण के किसानों की असली परेशानी इसके बाद शुरू हुई. इसका जिक्र 1950 की लोहिया आयोग रिपोर्ट में मिलता है. लोहिया आयोग रिपोर्ट एक स्वतंत्र जांच रिपोर्ट है, जिसे प्रख्यात समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया की अध्यक्षता में 1950 में…

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तिनकठिया बंद हो गयी मगर कम नहीं हुआ अत्याचार #चंपारण-गांधी के बाद-2

चंपारण सत्याग्रह के बाद जब तिनकठिया प्रथा को खत्म करने का एक कानून बन गया और महात्मा गांधी को अहमदाबाद मिल मजदूरों के आंदोलन की वजह से यहां से जाना पड़ा तो शायद वे मन में एक संतुष्टि का भाव लेकर गये होंगे कि अब कम से कम नील किसानों को शोषण की उस संवेदनहीन प्रक्रिया से गुजरना नहीं पड़ेगा. मगर जब आप गांधी के चंपारण से जाने के बाद के दिनों पर गौर करेंगे तो पायेंगे कि यह खुशी बहुत अधिक दिनों तक बरकरार नहीं रही. इस बात के…

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क्या चंपारण सत्याग्रह आधा-अधूरा किसान आंदोलन था? चंपारण-गांधी के बाद-1

बेतिया के किसान नेता राजकुमार शुक्ल की जिद पर नील किसानों की समस्या को समझने के लिए 10 अप्रैल, 1917 को गांधी पहली बार बिहार आये थे. उन्होंने शुक्लजी से कह रखा था कि वे महज तीन-चार रोज रुकेंगे और किसानों से बात कर उनकी समस्या को समझने की कोशिश करेंगे. मगर पहले तिरहुत के कमिश्नर मोरशेड की बेरुखी और फिर मोतिहारी कचहरी में पेशी के आदेश के बाद उन्हें समझ में आ गया कि वे समस्या को जितनी छोटी समझते हैं, उतनी छोटी है नहीं. उन्होंने तय कर लिया…

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