14 साल बाद भी न स्कूली किताबों में मैथिली, न सरकारी विज्ञापनों में

आज से ठीक 14 साल पहले मैथिली भाषा को संविधान की अष्टम सूची में शामिल किये जाने का विधेयक पारित हुआ था और इसकी संवैधानिक मान्यता पर मुहर लग गयी थी. मगर इन चौदह सालों में इस मान्यता का मैथिली को कोई लाभ नहीं मिला. मैथिली न स्कूली किताबों में पहुंची, न सरकारी विज्ञापनों में. मैथिली भाषा के साथ बिहार सरकार के इसी उपेक्षापूर्ण व्यवहार को लेकर पत्रकार रोशन कुमार मैथिल ने यह तीखा आलेख लिखा है… रोशन कुमार मैथिल राम का वनवास तो 14 साल में खत्म हो गया…

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