SUNDAY DEBATE- ‘झट से झूठ’ गढ़ने की यह कैसी हड़बड़ी है कॉमरेड!

व्यालोक भाई को हम सब जानते हैं. वे पत्रकार हैं, सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव हैं, उनकी भाषा में चाकू सी धार है और वे वामपंथ की विडंबनाओं को उजागर करते रहते हैं. इस बार वे एक नये सवाल के साथ आये हैं, कि वामपंथी अपने हिसाब से घटनाओं का फैसला फटा-फट कर डालते हैं. बस पोलिटिकल माइलेज मिलना चाहिए. इसके लिए वे झट से झूठ गढ़ते हैं और इस कला में गोयेबल्स को भी मात कर देते हैं, जिसे वे दिन-दोपहर याद करते रहते हैं. आप इसे पढ़ें, ठीक लगे तो शेयर करें, गलत लगे तो व्यालोक भाई को जवाब दें, उनसे तर्क करें…

व्यालोक पाठक

अभी, दो दिन पहले एक ख़बर आयी. पुलिस ने गौरी लंकेश की हत्या के षडयंत्र में शामिल दो लोगों को गिरफ्तार कर लिया है. जैसा कि होना था, वामपंथी खेमे ने उस पर पूरी तरह चुप्पी साध ली है, क्योंकि वे दोनों ही समुदाय-विशेष के हैं. पाठकों को याद होगा कि जब गौरी लंकेश की हत्या हुई थी, तो इन्हीं चिंतकों-विचारकों ने तनिक भी देर नहीं लगायी थी भारत को ‘लिंचिस्तान’ घोषित करने में, हिंदू-तालिबान जैसी हास्यास्पद शब्दावली का इस्तेमाल करने में और कोर्ट लगाकर यह फैसला देने में कि गौरी लंकेश की हत्या के पीछे हिंदू-उग्रपंथियों का हाथ है. यह घटना न तो पहली थी, न ही आखिरी है.

दरअसल, वामपंथ के साथ इसकी शुरुआत से ही दो मुसीबतें रही हैं. पहली, तो यह उस भाषा में बात करता रहा है, जो इस देश की आम जनता की समझ में ही नहीं आती, इसीलिए यह जनता से भी कटा रहा है. दूसरे, वामपंथ अपनी दुकान के हिसाब से सत्य और तथ्य को तय करता है. बिल्कुल, अब्राहमिक धर्मों की तर्ज पर ही वामपंथ के लिए तथ्य पवित्र तो होते हैं, लेकिन वही, जो उनकी राजनीतिक समझ और प्रतिबद्धता पर खरे उतरें. उसके अलावा, सब कुछ अपवित्र है, जिसे पवित्र करने की जरूरत होती है.
इसी तरह उनकी राजनीतिक समझ (या निष्ठा) या प्रतिबद्धता भी उस हद तक दल-विशेष या राजनीति-विशेष के विरोध में है कि कई दफा वे हास्यास्पद हो जाते हैं.

खैर, वह विषय अभी नहीं है. यह लेखक बस आपको याद दिलाना चाहता है कि यह शहरी सुविधाभोगी अभिजात्‍य वामपंथी कुटुम्‍ब किस कदर अपने हिसाब से इतिहास की व्याख्या करता है, व्यक्तियों को प्रमाणपत्र देता है, लोगों का चरित्रहनन करता है और सेकुलर-कम्युनल के गणित में अपनी दुकान साधता है.

क्‍या दिसंबर 2013 की एक घटना किसी को याद है? पूर्वोत्तर की एक बाला के बलात्कार का आरोप स्वनामधन्य खुर्शीद अनवर पर लगा था, जिसके मीडिया और प्रकाश में आने के बाद एनजीओ चलाने वाले खुर्शीद ने आत्महत्या कर ली थी. उसके बाद तो वाम-बिरादरी का रोना-धोना सब को याद ही होगा. किस तरह खुर्शीद को शहीद बनाया गया, उनकी आत्महत्या को हत्या बता दिया और जावेद नकवी से लेकर ओम थानवी तक के बड़े लिक्खाड़ उस घटना की लीपापोती में जुट गए.

इस लेखक ने उस वक्त भी वामियों-कौमियों के ‘सेलेक्टिव एमनेजिया’ पर सवाल उठाए थे और पूछा था कि आखिर ये मूर्द्धन्य पत्रकार ठीक उन्हीं तर्कों का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं, जिनके सतत विरोध में इन्होंने अपनी राजनीति की है. ठीक उन्हीं बिंदुओं का इस्तेमाल कर उन्होंने खुर्शीद को क्लीन-चिट दे डाली, जिसके सतत विरोध का दावा ये करते रहे हैं. अभी दो दिन पहले जेएनयू में इन्होंने शहीद (?) खुर्शीद की याद में व्याख्यानमाला का आयोजन भी किया है. उस वक्त, इनको भारतीय अदालतें भी भूल गयीं, कानून-व्यवस्था भी याद नहीं रही और प्रजातंत्र में तो खैर, वे यकीन करते ही नहीं हैं.

वामपंथी खाप ने यह तय कर लिया है कि अपने किसी सदस्य के लिए किस सीमा तक झूठ की सफेदी पोतनी है? विडंबना यह है कि हमारे समय के कुछ बचे-खुचे विश्वसनीय चेहरे भी इस खाप मानसिकता में नग्न होकर विजय के उन्माद में एक ऐसी प्रतिगामी भाषा बोले जा रहे हैं, जो इनकी प्रासंगिकता पर ही सवाल उठाता है. समय का पूरा पहिया घूम चुका है और विधाता इस प्रहसन पर अब ढंग से हंस भी नहीं पा रहा है.

जिस आलेख की लेखक चर्चा कर रहा है, उसी में जावेद, सोनी सोरी और तहलका के मामले का भी वर्णन करते हैं. तो, क्या यह मान लिया जाए कि चूंकि तहलका ने सोनी सोरी के मामले को उजागर किया, इसीलिए तरुण तेजपाल को यौन हिंसा का अधिकार मिल जाता है? उन्होंने लिखा है- “Tehelka editor Tarun Tejpal has been put on trial for apparently molesting a junior colleague…”

राजनीति में निष्पक्ष प्रेक्षक की भूमिका से कैसे आप पार्टी में बदल जाते हैं, यह पता भी नहीं चलता. नतीजा, जिंदगी भर का सारा लिखा-पढ़ा ऐन उसी वक्त कूड़ा हो जाता है जब इसका सबसे कड़ा इम्तिहान आता है. विनोद मेहता, तरुण तेजपाल, जावेद नकवी, ओम थानवी, रवीश कुमार, अभय कुमार दुबे, बरखा दत्त, वीर सांघवी… और यह सूची अंतहीन है. ये सारे बड़े नाम ऐन परीक्षा के वक्त असफल हो गए.

दिल्ली के डॉक्टर नारंग की हत्या याद होगी? उस वक्त इसे सामान्य मारपीट साबित करने की वामपंथी बिरादरी को इस कदर चूल मची थी कि उन्होंने एक छुट्टी पर गयी पुलिस अधिकारी का झूठा ट्वीट भी ताबड़तोड़ शेयर कर दिया. हालांकि, जब उस ट्वीट की कहानी पता चली, तो फिर से वही गहन चुप्पी.

ज्योति बसु जब प्रधानमंत्री नहीं बन पाए थे, तो कई साल बाद उन्होंने इस ‘ऐतिहासिक गलती’ पर अफसोस जताया था. हालांकि, वामपंथियों ने अपने कंगारू कोर्ट लगाने और जल्दबाज़ी में फैसला सुनाने पर कभी भी अफसोस नहीं जताया. पाठकों को याद होगा कि 2014 के चुनाव के पहले अचानक ही दिल्ली में चर्च में तोड़फोड़ और उसी बहाने असहिष्णुता पर काफी चर्चा हुई. हालांकि, दो दिनों बाद पता चला कि शराब के नशे में एक ईसाई (जी हां, ईसाई) ने ही चर्च की दो-चार ईंटें इधर-उधर कर दी थीं. टाइम्स ऑफ इंडिया ने तो अगले दिनों एक भूल-सुधार का छोटा सा अनुच्छेद छापा भी, लेकिन रवीश कुमार से लेकर और मूर्द्धन्य पत्रकारों में से किसी ने भी इस पर माफी आज तक मांगने की जहमत नहीं उठाई है.

दाभोलकर हों या कलबुर्गी, पनसरे हों या गौरी लंकेश- वामपंथी बिरादरी ने हत्या के तुरंत बाद ही इसे हिंदू-तालिबान का काम बताने में तनिक भी परहेज नहीं किया, जबकि पुलिस की जांच चल रही है, कोर्ट में अभी तक सुनवाई नहीं हुई है. वहीं, किसी मामले में अगर तथ्य वामपंथियों के स्थापित ‘सिद्धांत’ से अलग निकलते ही घनघोर चुप्पी या फिर पुलिस के बिकाऊ होने का आरोप तो है ही. यह आखिर कौन सा दोहरापन है कि अफजल-याकूब के मामले में तो ‘इंडियन स्टेट’ अत्याचारी हो जाता है, न्यायालय तक के फैसले पर ऊंगली उठ जाती है, लेकिन जब कुछ मुस्लिम युवकों को न्यायालय रिहा करता है (जिन्हें बिना किसी चार्जशीट के जेल में रखा गया था) तो वही नजीर बार-बार पेश की जाती है.

इशरत जहां के मामले में आपको न्यायालय पर विश्वास नहीं, समझौता ब्लास्ट के मामले में जब तक कुछ हिंदू नाम सलाखों के पीछे थे, तो कोर्ट ठीक था, लेकिन जैसे ही कुछ को जमानत मिली, आपका कोर्ट पर से भी भरोसा उठने लगता है.
मिसालें दर्जनों हैं, उदाहरण सैकड़ों हैं. एक मुफ्त की सलाह है कॉमरेड्स. अपनी जल्दबाजी और दोहरेपन पर लगाम डालो ताकि अपनी खोई हुई ज़मीन पाने की कोशिश तो कर सको.

 

Spread the love

Related posts