कहानी राजा, महाराजा, महाराजाधिराज के उपाधियों की, भाया राज दरभंगा

सुशांत भास्कर

कहा जाता है कि मुगलों के शासनकाल में  तिरहुत का राज्य संस्थापक महेश ठाकुर को मिला जिन्होंने मुगल बादशाह को समय समय पर नजराना देना शुरू किया … कालान्तर में नरपति ठाकुर के पुत्र विष्णु ठाकुर को मुगल शासक ने लगातार लड़ाई करने के कारण सिंह की उपाधि दी थी. 1860 में महाराजा महेश्वर सिंह के मरने के बाद लक्ष्मीश्वर सिंह के नाबालिग होने के कारण दरभंगा कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अधीन चला गया था और यहाँ ब्रिटिश शासन की ओर से मुजफ्फरपुर के डिप्टी कलक्टर मिस्टर सीपी कैस्पर्ज़ के निर्देशन में मिस्टर जेम्स फरलाँग मैंनेजर मुकर्रर हुए. कोर्ट ऑफ वार्ड्स के अधीन दरभंगा को एक से एक मैनेजर को मिलता रहा और दरभंगा तरक़्क़ी की ओर निकल गया.

25 सितम्बर,1879 बृहस्पतिवार के दिन 21 वर्ष की उम्र में अजिमाबाद के मोकाम कॉलेज (कॉलेजिएट) स्कूल में हुजूर नवाब लेफ्टिनेंट गवर्नर मिस्टर सीएस बेली बहादुर से ख़िलअत राजगी का पहनाया गया. लक्ष्मीश्वर सिंह की पढ़ाई अंग्रेजों ने अपने दिशानिर्देश में उच्च स्तरीय माहौल में करवाया था और यही कारण था कि दरभंगा लक्ष्मीश्वर सिंह के समय में अपने समकालीन अन्य स्थलों से आगे निकल रहा था. अपने शासनकाल में अंग्रेजों ने विभिन्न प्रकार के जमींदार और रूलिंग किंग बनाया. इसके लिये अंग्रेजों ने कई प्रकार के खिताब दिये, जो पूर्ववर्ती काल में पद के लिए दिया जाता था. जैसे चौधरी, ठाकुर, राय, राजा, महाराजा, महाराजाधिराज आदि. इसके इतर अंग्रेजों के शासन काल में किसी को ‘राय बहादुर’ की उपाधि मिलती थी तो किसी को ‘खान बहादुर’ की.

अंग्रेजों ने लैंड सेटलमेंट नीति के तहत माधव सिंह को महाराजा का खिताब दिया जो महेश्वर सिंह और लक्ष्मीश्वर सिंह तक चलता रहा. महाराज के खिताब के बाद सर की उपाधि रमेश्वर सिंह के बाद कामेश्वर सिंह को भी मिला. इसके इतर कहा जाता है कि महाराज रामेश्वर सिंह को सैनिक ओहदा के रूप में कमाण्डर और महाराज कामेश्वर सिंह को सैनिक ओहदा के रूप में कर्नल का सम्मान भी मिला था.

उत्तरी बिहार में तिरहुत के क्षेत्र में 19 वीं शताब्दी के दौरान कई राजा, बहादुर आदि उपाधिधारी/खिताबधारी लोग विद्यमान थे, जैसे – राजा टेकनारायन सिंह (मौजा बरुआरी) आमदनी लगभग लाख रुपये सलाना, राजा हरबल्लभ नारायण सिंह बहादुर (मौजा सोनवर्षा) आमदनी लगभग 80 लाख रुपये सालाना, राय नंदीपतमहथा बहादुर (बंगाल सरकार ने जिला तिरहुत में (सबसे) पहले इन्हीं को “राय बहादुर” की उपाधि भेंट किया था) राय बनवारी लाल साहु बहादुर अग्रवाल (दरभंगा, वंशीघाट पर पुल बनाने पर 1875 में खिलअत (सम्मान में दिया गया पोशाक) और राय बहादुर की उपाधि मिली). बाबू देवी प्रसाद (दरभंगा, बेनीवाद के निकट लखनदेई नदी पर एक लोहे का पुल बनाने के कारण ईनाम में “राय बहादुर” की उपाधि मिली थी. किन्तु मर जाने के कारण जीवनकाल में खिलअत नहीं मिल पाया). राय गोवरधनलाल (दरभंगा, खिलअत और “राय बहादुर” की उपाधि 1875 में पटना में मिली) आदि.

स्वतंत्रता के बाद संविधान बनाने के क्रम में संविधान सभा में चर्चा के दौरान सेठ गोविंद दास ने कहा था कि ‘फ्रांस की क्रांति और रूस की क्रांति के बाद वहां पर जितनी उपाधियां थीं, वे तमाम वापस ले ली गईं. क्या गुलामी के उन तमगों से हम लोगों का उद्धार करना नहीं चाहते? मैं चाहता हूं कि इस समय के उपाधिधारी भी स्वतंत्र भारत में उसी प्रकार के व्यक्तियों की तरह रह सकेंगे जिस तरह अन्य व्यक्ति रहेंगे ‘.

विभिन्न तरह की विस्तृत चर्चा के उपरांत भारतीय कुलीन उपाधियों और अंग्रेजों द्वारा प्रदान की गई अभिजात्य उपाधियों को समाप्त कर दिया गया. दरअसल संविधान निर्मातागण आजाद भारत में ऐसे नागरिक चाहते थे, जो किसी उपाधि के दबाव में आकर निर्णय नहीं कर सकें. इस प्रकार, संविधान निर्माताओं ने अंग्रेजों के जमाने की उपाधियों पर रोक लगा दी और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 18 में स्प्ष्ट रूप से लिखा कि “राज्य को सैन्य या शैक्षणिक विशिष्टता को छोड़कर किसी को भी कोई पदवी देने से रोकता है तथा कोई भी भारतीय नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई पदवी स्वीकार नहीं कर सकता “.

इसको आधार बनाकर ही आजादी के बाद की भारत सरकार ने भारतरत्न और पद्म पुरस्कार जैसे अलंकरण प्रदान करने शुरू कर दिए. अंग्रेजों के उपाधि का स्वरूप स्वतंत्र भारत में बदल गया है. ब्रिटिश भारत में उपाधि के बाद नाम लेकर संबोधित किया जाता था, स्वतंत्र भारत में ब्रिटिश नागरिक की तरह भारतीय नागरिक अपने नाम के पूर्व अपनी उपाधि नहीं लगा सकते हैं.

अर्थात भारत के नये गणतंत्र में अब किसी रूलिंग किंग के बेटे/बेटी न तो कोई राजकुमार रहा न कोई राजकुमारी. महाराज सर कामेश्वर सिंह ने किले का निर्माण शुरु किया किन्तु  दरभंगा को रूलिंग किंग का दर्जा अंततः प्राप्त नहीं हो सका. चूंकि अंग्रेजों के द्वारा दरभंगा के कामेश्वर सिंह को “महाराज” की उपाधि दी गई थी इसलिए संविधान सभा में भी इन्हें उपाधि के साथ महाराज कामेश्वर सिंह ही कहा गया. जैसे किसी अन्य व्यक्ति के नाम के पूर्व “रायबहादुर” या “खानबहादुर” लगाकर सम्बोधित किया जाता हैं. संविधान सभा के एक सदस्य के रूप में कामेश्वर सिंह का नाम महाराज कामेश्वर सिंह के रूप में ही दर्ज है.

वस्तुतः दरभंगा के महाराज कामेश्वर सिंह सम्पूर्ण ब्रिटिश भारत के सबसे बड़े जमींदार में से एक थे … वस्तुतः इनका ओहदा जमींदारों का रहा और उपाधि महाराधिराज की …

 

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One Thought to “कहानी राजा, महाराजा, महाराजाधिराज के उपाधियों की, भाया राज दरभंगा”

  1. सोनवर्षा के महाराजा सर हरिबल्ललभ नारायण सिंह के बारे में कोई और अन्यअ जानकारी हो तो साझा करें । वैसे उनको महाराजा का भी खि‍ताब मिला है ।