‘परसादी दास’ की कहानी से समझिये योजनाओं के मकड़जाल के बीच फड़फड़ाती गरीबी को

श्याम आनंद झा

श्याम आनंद झा. आप एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और दरभंगा के अपने गांव में रह कर सामाजिक बदलाव के लिए प्रयासरत हैं.

आसान कुछ भी नहीं होता. मुल्ला नसीरुद्दीन की तरह बड़े मुद्दों के बारे में सोचते रहना भी नहीं. लेकिन बड़े मुद्दों के बारे में सोचते रहने से ज्यादा मुश्किल काम है, हाहाकार करती जिंदगी को करीब से देखना और उसके बारे में कुछ न कर पाने की बेबसी को लेकर छटपटाना. पिछले दो सालों में ज़िन्दगी के जो हालत मैंने बिहार के गांवों में रहते हुए देखे हैं उसके बारे में लगातार आप लोगों से साझा करता रहा हूँ. एक बार फिर पुरानी बातों को दोहराता हूँ.

ये प्रसादी दास हैं. उम्र 80 से ऊपर है. दास भूमिहीन हैं. एक बेटा पशुपालक है, जिसके पास दूध देने वाली एक भैंस है. बेटे के तीन बच्चे हैं. दास की दो बेटियां भी हैं. उनके बच्चे भी दास के यहाँ रहते हैं. कुलमिलाकर परिवार में दस लोग हैं.

दास कबीर पंथी हैं. और अब मजूरी करने लायक नहीं हैं. सरकारी राशन की दुकान से मिलने वाले अन्न से परिवार चला लेते हैं. वो भी किसी तरह क्योंकि हर महीने हिस्से का पूरा अन्न उन्हें स्थानीय डीलर नहीं देता. परन्तु उस कमीने की कमीनीगिरी की बात यहाँ नहीं.

जब से मैं आया हूँ, दास हमारे यहाँ आते जाते हैं. हम कबीर के दोहे और साखी पर बात करते हैं. धर्म, नीति, आचार, आदि के बारे में दास और मेरे विचार एक जैसे हैं. जब जिस किसी कार्यक्रम में दास को बुलाया दास आए. मेरे साथ उठने-बैठने के लिए उन्हें शुरू में सामाजिक ताना भी सहना पड़ा लेकिन दास ने उसकी परवाह नहीं की.

एक भैंस से निकलने वाले दूध और आधे अधूरे राशन से परिवार चलाने वाले प्रसादी दास की मुझ से कोई उम्मीद, कोई आकांक्षा न होगी, ऐसा नहीं है. दास के लिए मैं, निस्सहाय जनता के हक की लड़ाई लड़ने के लिए भगवान का भेजा कोई दूत हूँ. उन्हें लगता है, मैं उनके जैसे लोगों को इंदिरा आवास, पूर्ण राशन, उनके नाती पोतों के लिए स्कूल में मिलने वाली सरकारी छात्रवृति व सरकार से मिलने वाली दूसरी ज़रूरी अनुदानों को दिलवा सकता हूँ.

ये कोई नाजायज़ उम्मीदें नहीं हैं. आवास के लिए सरकार द्वारा दी जा रही सहायता राशि बिना किसी भेदभाव और रिश्वत के ज़रुरतमंदों को मिले, यह कौन सी बड़ी बात है?

लेकिन चंद चोर उचक्कों ने इसे कितना बड़ा काम बना दिया है, वह यहाँ रहने वाले लोग ही समझ सकते हैं. मुल्ला नसीरुद्दीन की तरह बड़े मुद्दों, जैसे सामाजिक न्याय, हिन्दू राष्ट्र, धर्म निरपेक्षता, कश्मीरी आतंकवाद, डोकलम, सीरिया, इजराइल आदि के बारे में सोचते रहने वालों के लिए इतना ही बता दूं कि इस लिबरल डेमोकेटिक शासन पद्धति में गरीबों के लिए आवंटित रोटी, कपड़ा और मकान का उन वंचितों तक बिना दाव-पेंच के पहुँचना क्रांति होने से कम नहीं है.

दास कभी सुबह कभी शाम आते हैं. अदम्य जिजीविषा के बीच थर्रा देने वाली रोजमर्रे की अपनी कठिनाइयों की कहानियां लेकर. मैं काँप जाता हूँ. वर्ग संघर्ष के ज़रिये क्रांति होने तक का इंतजार करने की ठोस और स्थाई बात उनसे नहीं कह पाता.

दास चौपाल हैं, यानी खतबे. सामाजिक न्याय मिलने वाली जाति में शामिल हैं. मगर सामाजिक न्याय के नाम पर उन्हें क्या मिला इसके बारे में मेरा कुछ भी कहना जातीय पूर्वग्रह माना जा सकता है. लेकिन उन्हें मिल क्या सकता है, इसके बारे में आप जो कोई भी हैं इस बात से अंदाज़ा लगा सकते हैं कि दास के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं. जहाँ के बच्चे अपने नाम के सिवाय, वो भी गलत, शायद ही कुछ लिख सके. तो सामाजिक न्याय के दौर में दास का बेटा टुनटुन और उसके बच्चे लगभग निरक्षर रह गए.

किसी साजिश तहत यह सिर्फ दास या उनके परिवार के साथ हुआ ऐसा नहीं है. गांव के गांव घूम आइये. सामाजिक न्याय के असली हकदार वहीँ मिलेंगे जहाँ उन्हें जगन्नाथ मिश्र ने छोड़ा था – भैंस की पीठ पर! पिछले 25 साल में एक नई जमात खड़ी हुई है, जो ब्राह्मणवाद का काट नहीं ब्राह्मणवाद का बाप है.

गांव-गांव टोल-टोल वोट बैंक बनकर खंड विखंड हो चुके हैं. सामाजिक न्याय का जो लोकल ट्रांसलेशन हमें रोज देखने को मिलता है उसके रास्ते दास का उद्धार हो पाएगा इसके बारे में गंभीरता से सोचने की ज़रुरत है.

जिन पढ़े लिखे चंद परिवारों को इसका लाभ मिल रहा है, वे हुआ-हुआ करेंगे. भला इतनी शानदार सुविधा कौन छोड़ना चाहेगा!

आइये, अफगानिस्तान से लेकर कन्याकुमारी तक, भूटान से लेकर भरूच तक हिन्दू राष्ट्र बनाइये, पर इस बीच दास जैसे असंख्य ईमानदार, और जन्मों जन्मों से वंचित लोगों, जिसमें लाखों की संख्या में भूमिहीन प्रभु-जातियां भी शामिल हैं, के लिए एक बीच का रास्ता निकाले कि इन्हें मानवीय सम्मान पूर्वक जीने के लिए सर्वहारा की क्रांति होने तक का इंतजार न करना पड़े.

उत्तर बिहार के समाज के बारे में जोर देकर कहूँगा कि यह सामाजिक न्याय के बाद सामाजिक एकता के लिए छटपटा रहा समाज है. फिलवक्त इसी सामाजिक एकता में ही इसकी मुक्ति है.

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