आजाद भारत में सबसे लंबे समय तक चले दंगे की कहानी

निराला

 

बीते 24 अक्तूबर को भागलपुर में अजीब किस्म का माहौल था. शहर की चहल-पहल वैसी ही थी. नयी पीढ़ी उसी तरह भागदौड़ में व्यस्त. भागलपुर से ही सटे नाथनगर और चंपानगर में हैंडलूम और पावरलूम के करघे भी उसी तरह हर रोज की तरह अहलेसुबह से ही खट-खट कर शुरू हो गये थे. मंदिरों की घंटियां भी सुबह से बज रही थी, मस्जिदों में अजान भी हुआ. लेकिन बड़ी आबादी वाले शहर के कुछ कोने ऐसे थे, जहां एक अजीब किस्म की उदासी का माहौल था. कुछ नये मोहल्ले ऐसे थे, जहां सुबह से ही मातमी सन्नाटे का माहौल था. कुछ लोग ऐसे थे, जिनके चेहरे पर गहरे निराशा और उदासी का भाव था. 24 अक्तूबर को ऐसे मिश्रित माहौल की वजह थी. उस दिन कुछ अखबारों में खबर आयी थी कि आज भागलपुर दंगे के 25 साल पूरे हो रहे हैं, जिसके मौके पर फलां-फलां जगह, फलां-फलां आयोजन होंगे. नयी पीढ़ी की एक बड़ी जमात के लिए ये आयोजन महज एक आयोजन का रूप लेकर आये थे लेकिन भागलपुर शहर के परवती, तातरपुर, असानंदपुर से लेकर नाथनगर जैसे कई मोहल्ले ऐसे थे, जहां के पुराने रहनिहार उस दिन सुबह से ही 25 साल पुराने दिनों को याद कर रहे थे. उनकी आंखों में आंसू छलछला रहे थे.

भागलपुर में हम सबसे पहले नाथनगर और चंपानगर को देखने पहुंचे थे. वह इसलिए कि यह दो ऐसे मोहल्ले हैं भागलपुर के आसपास, जो भागलपुर को ना जाने कितने वर्षों से सिल्क नगरी के रूप में स्थापित किये हुए हैं. सिर्फ बिहार में नहीं, देश और दुनिया के कोने-कोने में. नाथनगर और चंपानगर में बिना किसी से बातचीत किये, सिर्फ मोहल्ले को घूमते हुए ही यह साफ अहसास होता है कि यह इलाका कभी भागलपुर की पहचान वाला इलाका रहा होगा. घरों के चौखट-दरवाजे को देखकर लगता है कि यह कितना नफीस इलाका रहा होगा, गलियों को देखकर लगता है कि यह कितना गुलजार रहता होगा. वहां मोहम्मद इरशाद मिलते हैं. वे कहते हैं कि पुराने दिनों की याद ना दिलाये, अब बस हमारी पहचान इतनी है कि हम एक मजदूर हैं, जिन्हें आसामियों से काम मिलता है तो दिन रात एक कर पूरा करते हैं और हम मजदूरों के भरोसे ही यह भागलपुर सिल्क नगरी कहलाता है. इरशाद यह बताते-बताते रोने लगते हैं. वह कहते हैं- यहां हर घर में अपने लूम चलते थे. हर कोई यहां हूनरमंद बुनकर था और मालिक भी. इरशाद बहुत सारी बाते बाते हैं. उनसे बातें होते रहती हैं तो वह आंकड़ा आंखों के सामने तैरते रहता है, जिसमें यह बताया गया है कि 25 साल पहले एक दंगे ने सिल्क नगरी भागलपुर के 600 पावरलूम, 1700 हैंडलूम को आग के हवाले कर राख बना दिया था. बुनकरों की नगरी में बुनकरों के मोहल्ले में हर किसी के पास अथाह पीड़ा होती है. सभी घरों के अपने स्वर्णीम इतिहास और अंधेरे भविष्य के पन्ने. बुनकरों का मोहल्ला छोड़ हसनपुर, डुमरागांव जैसी बस्तियों में जाते हैं. सलमपुर में भी, जहां नूरजहां, इदरिस जैसे लोग मिलते हैं, जो अपनी पीड़ा के साथ अपने अनुभव तक को साझा नहीं कर पा रहे थे. सलमपुर के इदरिस, जो अब एक पैरों के सहारे जिंदगी गुजार रहे हैं, कहते हैं कि मुझे छर्रा लगा था. एक साल तक छर्रे के घाव वाला पैर लेकर घूमता रहा. बाद में मेरा एक पैर काट देना पड़ा. मैंने कई बार सरकार से कहा कि दंगे ने मुझे जिंदगी भर के लिए नाकाम इंसान बना दिया, मैं कमा सकता था, अपनी जिंदगी गुजारने लायक खुद कमाई कर सकता था लेकिन सरकार मुझे दंगापीड़ित नहीं मानती इसलिए मैं मुआवजे तक का हकदार नहीं बन सका. नूरजहां के आदमी इजराइल भी इस दंगे में मारे गये थे. नूरजहां कहती हैं, मैं साबित नहीं कर पायी कि मेरे पति को भी दंगे में मारा गया है, इसलिए मैं भी सरकार से कुछ लेने की हकदार नहीं.

इदरिस, नूरजहां की तरह कई लोग मिलते हैं. सबके पास अंतहीन पीड़ा की अपनी कहानियां हैं. अंदर तक हिला देनेवाली 25 साल पहले की स्मृतियां भी. मुआवजे का अपना खेल होता है, उसकी अपनी राजनीति होती है. मुआवजे को छोड़ दूसरी बात करते हैं. भागलपुर घूमते हुए, वहां के लोगों से बात करते हुए साफ महसूस होता है कि 25 साल पहले हुए उस दंगे ने शहर को इस कदर, इतने रूपों में तोड़ा कि शहर आज तक संभल नहीं पाया है. न ही अपनी पुरानी रवायत और रवानगी में लौट सका है.

25 साल पहले हुआ एक दंगा यूंही इतना पीड़ादायी नहीं है, भागलपुरवालों के लिए. कहा जाता है कि आजाद भारत में यानी 1947 के बाद यह दंगा अब तक बिहार में सबसे लंबे समय तक चलकर सबसे ज्यादा लोगों की जान लेनेवाले दंगे के तौर पर तो इतिहास के पन्ने में दर्ज है ही, आजाद भारत में भी भागलपुर की तरह दंगे शायद कहीं नहीं हुए. सरकारी आकड़ें कहते हैं कि इस दंगे में 1000 से ज्यादा लोग मारे गये थे. सामाजिक कार्यकर्ताओं, गैर सरकारी संस्थाओं व स्थानीय लोगों का मानना है, इस दंगे में दो हजार से अधिक लोग मारे गये थे. वह भी ऐसे नहीं कि सिर्फ मार दिये गये. कहीं मारे गये, कहीं काटे गये, कहीं मारकर कुएं में फेंक दिये गये, कहीं तालाबों में, कहीं मारकर खेत में गाड़ दिये गये और फिर उपर लाशों के उपर खेती भी कर दी गयी. और यह दंगा इसलिए भी एक काले अध्याय की तरह जुड़ा क्योंकि यह भी अनोखे तरीके का मामला था, जब सांप्रदायिक उन्माद के समानांतर ही अपराधियों, गिरोहबाजों, राजनेताओं और अधिकारियों के गंठजोड़ ने दंगे को भड़काकर इस तरह सरेआम लोगों का कत्लेआम होने दिया था.

भागलपुर में 1989 वाले दंगे का इतिहास बहुत साफ है. 1989 के पहले 1924, 1936, 1946 और 1966 में भी दंगे हुए थे लेकिन वे दंगे वैसे थे, जिसे स्थानीय प्रशासन ने कुछ ही घंटे में संभाल लिया था. लेकिन 1989 वाला दंगा ऐसा दंगा साबित हुआ, जिसे प्रशासन ने परवान चढाया. एक माह तक तो परवान पर चढ़ा रहा और उसके बाद छह माह तक छिटपुट मार दिये जाने का दौर चलता रहा. दो हजार के करीब लोग मारे गये. भागलपुर जिले के 21 में से 15 ब्लॉक में इसकी लपटें फैली, 195 गांवों में पीढ़ियों से चली आ रही साझी संस्कृति का तानाबाना पल भर में बिखरा और वहां कत्लेआम हुए. 48 हजार लोग अपने गांव-घर-मकान-कारोबार सब छोड़कर दूसरी जगह विस्थापित हुए, 600 पावरलूम जलाये गये, 1700 हथकरघे आग की भेंट चढ़े.

1989 वाले दंगे के इतिहास के बारे में जानने की कोशिश करते हैं तो अजीब से पन्ने खुलकर सामने आते हैं. 1989 का साल अयोध्या में मंदिर बनाने के नाम पर राजनीति चमकाने का साल था. पूरे देश में, विशेषकर उत्तर व पूर्वी भारत में रामशिला पूजन का आयोजन गांव-गांव में हो रहा था. हर जगह की तरह भागलपुर में भी आयोजन चल रहा था. इस आयोजन को लेकर जिस तरह का तनाव अलग-अलग रूपों में देश के अलग-अलग हिस्से में था, वैसा ही भागलपुर में भी था. अक्तूबर में शिलापूजन का जुलूस निकलना था उसके पहले अगस्त में इसकी पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी कि इस बार भागलपुर में उत्साह उन्माद में बदलेगा. इसके संकेत 1989 में अगस्त में ही मिल गये थे, जब कुछ ही दिनों के अंतराल पर मुहर्रम और स्थानीय स्तर पर मशहूर विषहरी पूजा का आयोजन आया था. विषहरी पूजा को उस साल धूमधाम से मनाकर जुलूस वगैरह बड़े पैमाने पर निकले थे. तरह-तरह के नारे भी लगे थे. पहली बार ऐसा हुआ था कि पीढ़ियों से परंपरागत तौर पर मनाया जानेवाले विषहरी पूजा का स्वरूप बदल गया था और अचानक से दायरा भी. हिंदुओं और मुसलमानों में तब भी टकराव की स्थिति बनी लेकिन मामला संभल गया. विषहरी पूजा से जो अनुभव हुए, उसके विरोध में मुसलमानों ने उस साल मुहर्रम का जुलूस नहीं निकाला. बात आयी गयी नहीं हुई बल्कि अंदर ही अंदर चिंगारी भड़कती रही और तब तक दो माह बाद शिलापूजन वाला आयोजन आ गया. पहले से ही माहौल बना कि शिलापूजन का जुलूस बड़े स्तर पर निकलेगा. तब बिहार के मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा हुआ करते थे. सूचना मुख्यमंत्री तक भी पहुंची कि भागलपुर में कुछ दिन पहले ही तनाव का माहौल बना था, इसलिए वहां मामले को देखा जाना चाहिए. शांति समिति की बैठक हुई और तय हुआ कि शिलापूजन का जुलूस तो निकलेगा और कुछ मुस्लिम इलाके से भी गुजरेगा लेकिन ना तो कोई बैनर-तख्ती होंगे और न ही नारेबाजी होगी, लेकिन ऐसा हो न सका.

24 अक्तूबर को भागलपुर के परबत्ती इलाके की ओर से रामशिला पूजन शिलापूजन का एक जुलूस तातरपुर मोहल्ले की ओर बढ़ा. यह ठीक-ठाक से किसी तरह गुजर गया लेकिन तभी एक विशाल जुलूस नाथनगर की ओर से आ गया. जुलूस मुस्लिम मोहल्ले के चैक पर था, नाथनगर की ओर से आये लोगों ने नारेबाजी शुरू की- हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान- मुल्ला भागो पाकिस्तान…! जब यह सब हो रहा था, तब भागलपुर के एसपी केएस द्विवेदी और जिलाधिकारी यानि डीएम अरूण झा वहीं थे. जुलूस के नारे बढ़ते गये, आवाज भी तेज होती गयी. दूसरी ओर से पत्थरबाजी शुरू हुई. अभी डीएम कुछ समझने या संभालने की कोशिश करते कि तभी वहां बम ब्लास्ट हुआ. हालांकि बम ने किसी की जान नहीं ली लेकिन पुलिस ने फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस फायरिंग में दो लोग मारे गये. दोनों मुसलमान. जुलूस ने उन्मादी भीड़ का रूप अख्तियार किया. जंगल में आग की तरह अफवाह फैली कि संस्कृत विद्यालय में 40 हिंदू छात्रों को काट दिया गया है, दूसरी जगह भी 100 हिंदू मार दिये गये हैं और यह भी कि महिला कॉलेज में हिंदू लड़कियों के साथ रेप हुए हैं. यह अफवाह फैलायी गयी और उसके बाद जो हुआ, उसने इतिहास का एक नया पन्ना तैयार किया. वह पन्ना आजाद भारत में सबसे लंबे समय तक चलनेवाले दंगे के रूप में दर्ज हुआ.

केएस द्विवेदी

दुकानों की लूट शुरू हुई. मारकाट की शुरुआत हुई. परबत्ती में 40 मुस्लिम मार दिये गये. आसानंदपुर में बवाल हुआ. मदनीनगर से लूट की खबर आयी. नया बाजार में 11 बच्चे समेत 18 मुस्लिमों के मारे दिये जाने की खबर आयी. कई जगहों पर पुलिस की मौजूदगी में यह सब होते रहा. गांवों से भी ऐसी ही सूचनाएं आती रही. कुछ हिंदुओं ने मुस्लिमों को मदद करने की कोशिश की. 40 मुस्लिमों को जमुना कोठी में एक हिंदू ने शरण दिया लेकिन दर्जनों की संख्या में उन्मादी भीड़ ले वहां से निकालकर 18 को मार डाला. दोनों ओर से ऐसे ही मारकाट चलते रहे और देखते ही देखते कर्फ्यूग्रस्त शहर वीरानगी के आलम में डूबने लगा. बिना किसी चीज की परवाह किये लोग इधर से उधर भागते रहे. मरनेवालों के आंकड़े बढ़ते रहे. दंगे की लपट भागलपुर शहर को पार कर रजौन धोरैया जैसे उस इलाके में भी पहुंचा, जहां वामपंथी राजनीति का गढ़ था और यह माना जाता था कि यहां तो प्रगतिशील लोग रहते हैं. पास के जिले साहेबगंज, गोडडा तक इसकी लपटें पहुंची. उन दिनों को याद करते हुए भागलपुर के सामाजिक कार्यकर्ता उदय कहते हैं कि कुछ अंदाजा नहीं मिल रहा था उस वक्त किसी को. ऐसी-ऐसी खबरें आ रही थी उस वक्त कि बता नहीं सकते. उदय बताते हैं कि लौगांय से उस वक्त खबर आयी थी कि 125 लोगों को मारकर तालाब में डाल दिया गया. रजौना चंदेरी से खबर मिली कि तालाब में 50 लोग मार दिये गये. कहीं खेतों में लाशों को गाड़कर रातों रात खेती कर देने की बात भी सामने आयी. उदय कई घटनाओं का जिक्र करते हैं. एक से बढ़कर एक दिल दहलादेनेवाली घटनाओं की बात बताते हैं. भागलपुर के एक दूसरे सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि यह सब जानते हैं कि किस तरह कामेश्वर यादव, महादेव सिंह, सल्लन मियां और अंसारी जैसे कुछ माफिया-ठेकेदार-अपराधी किस्म के लोग इस दंगे के जरिये अपनी गुटबाजी का खेल खेल रहे थे.

भागलपुर दंगे में घटनाओं को नृशंस तरीके से अंजाम देने की कई कहानियां तो है हीं और अपराधियों-राजनेताओं के गंठजोड़ द्वारा इसे परवान चढ़ाने की बात भी है ही लेकिन उस समय सबसे शर्मसार करनेवाली दूसरी बात थी. वह यह कि तब जिले के पुलिस के कप्तान केएस द्विवेदी एक ऐसे पुलिस अधिकारी के तौर पर उभरे थे जो खुद तो खुलेआम इस कत्लेआम को करने-करवाने में रुचि ले ही रहे थे, उनके इशारे पर पुलिसवाले भी इस खेल में शामिल हो गये थे.

पुलिस कप्तान द्विवेदी का सीधे क्या सरोकार था इस दंगे में, इसे दूसरे तरीके से साफ समझा जा सकता है. घटना के बाद द्विवेदी को उनके पद से हटाया गया. उनकी जगह दत्त नामक एक एसपी जिले में नियुक्त हुए. घटना की तपीश ज्यादा थी तो दिल्ली से प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी भागलपुर पहुंचे लेकिन एयरपोर्ट पर ही पुलिसवालों के विरोध का सामना करना पड़ा. एसपी को हटाये जाने के विरोध में नारे लगते रहे और यह विरोध इतना तगड़ा था या इस कदर उन्मादी स्वरूप लिये हुए था कि देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी इसके सामने विवश नजर आ रहे थे और वे भागलपुर पहुंचकर भी प्रभावित इलाके में नहीं जा सके, सिर्फ अस्पतालों में जाकर लौट गये. उस समय बिहार में कांग्रेसी सत्ता थी और कांग्रेसी आपस में ही दंगे के बहाने अपनी राजनीति साधने में लगे हुए थे. तब मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा थे और उनके पहले मुख्यमंत्री रहे भागवत झा आजाद से उनके राजनीतिक रिश्ते 36 के थे. सत्येंद्र नारायण सिन्हा दंगे को रोकने में एक नाकाम मुख्यमंत्री की तरह साबित हुए और उन्हें अपने पद से जाना पड़ा और उनकी जगह जगन्नाथ मिश्र को सीएम की कुरसी मिली. बाद में सत्येंद्र नारायण सिन्हा ने अपनी आत्मकथा ‘ मेरी यादें-मेरी भूलें’ में लिखा कि मेरे कांग्रेस के लोगों ने मेरे साथ खेल किया. उन्होंने सीधे तौर पर आजाद के खेल की ओर इशारा किया. सत्येंद्र नारायण सिन्हा ने यह भी लिखा कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी अनावश्यक रूप से राज्य की सत्ता में हस्तक्षेप कर मामले को गलत दिशा में जाने दिया. एसपी द्विवेदी को हटाने के पहले एक बार राज्य सरकार से बात करनी चाहिए थी, जो प्रधानमंत्री ने नहीं किया था.

खैर! भागलपुर दंगे में ऐसे कई आरोप प्रत्यारोप आपस में ही लगते हैं. कांग्रेसी आपस में ही उस दंगे पर सालों तक झगड़ते रहे. कांग्रेसियों में कौन सही था, कौन गलत, यह कांग्रेसी ही बेहतर जानते हैं लेकिन उसके बाद कांग्रेस के साथ बिहार में जो हुआ, वह दंश आज तक उसे झेलना पड़ रहा है. आजादी के बाद एक दो मौके को छोड़ लगातार मनमानेपन से सत्ता पर काबिज रहनेवाली कांग्रेस पार्टी भागलपुर दंगे के बाद से पूरे बिहार से उखड़ गयी. भागलपुर में तो इतिहास बना कि उसके बाद कांग्रेस संसदीय चुनाव में कभी वहां जीत हासिल नहीं कर सकी. पूरे बिहार में मुस्लिम कांग्रेस से नाराज होते चले गये. 1989 में दंगा हुआ था, 1990 में लालू प्रसाद यादव बिहार की सत्ता में आ गये थे. लालू प्रसाद जान गये थे कि यही वक्त है जब दुखी मुस्लिमों को लेकर सियासत में नये समीकरण बन सकते हैं. लालू प्रसाद यादव ने माई समीकरण को साधना शुरू किया. माई यानि मुस्लिम यादव और इस दो समूहों के समीकरण से वे बिहार के बड़े नेता बन गये. यानि भागलपुर दंगे ने कांग्रेस को सदा के लिए बिहार से दूर कर दिया, लालू प्रसाद यादव जैसे अनाम नेता को बड़ा नेता बन जाने का मौका दे दिया और भाजपा ने भी उसकी बुनियाद पर अपने पांव पसारने शुरू कर दिये.

भागलपुर दंगे में कांग्रेस अपनी सियासी चाल चल चुकी थी. भाजपा के लिए विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन अपना खतरनाक खेल दिखा चुके बाद में मरहमी राजनीति की शुरुआत लालू प्रसाद यादव ने भी की. लालू प्रसाद यादव ने भागलपुर दंगे की जांच के लिए न्यायिक समिति बनायी. समिति ने रिपोर्ट तैयार की. 1995 में रिपोर्ट आयी कि उस दंगे में 142 एफआईआर दर्ज हुए थे. 1283 लोग दोषी पाये गये थे. 864 केसों में 535 को बंद कर देना पड़ा था. वगैरह-वगैरह. भागलपुर दंगे पर न्यायिक जांच समिति बनाने के बाद भी लालू यादव इसमें न्याय नहीं कर पायेंगे, यह सबको पहले से पता था, क्योंकि इस दंगे में जांच वगैरह कराकर वे मुस्लिमों को साधना चाहते थे लेकिन दूसरे छोर पर इस दंगे के लिए कामेश्वर यादव समेत कई यादव भी सीधे सीधे इसमें इनवॉल्व थे. लालू प्रसाद के लिए एक तरफ कुआं, दूसरी तरफ खाई का मामला था. मामला गोल-मटोल होकर रुक गया. कुछ को मुआवजा वगैरह देकर इस अध्याय को बंद करने की कोशिश हुई लेकिन सरकारी फाइलों में बंद कर देने से यह अध्याय बंद होनेवाला नहीं था. इसमें राजनीतिक संभावनाएं शेष बची हुई थी इसलिए नीतीश कुमार जब बिहार में 2005 में सत्ता में आये तो उन्होंने फिर से इस अध्याय को खुलवाया. 2006 से फिर से कुछ पन्ने खोले. कामेश्वर यादव जैसे लोगों का ट्रायल फिर से शुरू करवाने की बात हुई. दंगे के नाम पर फिर से आयोग 2006 से नये तरीके से, नये सिरे से जांच की प्रक्रिया में लग गया. वही ट्रायल और भी न जाने क्या-क्या कर रहा है. भागलपुर दंगे में पीड़ित मुसलमानों का एक वर्ग मानता है कि उन्हें सही न्याय कभी नहीं मिलनेवाला, क्योंकि तब लालू प्रसाद थे तो एक हद के बाद यादवों का मामला आने के बाद गोलमटोल रास्ता अपना लिये. जब तक नीतीश कुमार भाजपा के साथ रहे, भाजपा का एक दबाव रहा, सो जांच की गति और दिशा सही नहीं चल सकी.

भागलपुर दंगे में जिन्हें मुआवजा मिलना था उन्हें प्रधानमंत्री राहत कोष से दस हजार रुपये, बिहार सरकार की ओर से एक लाख रुपये और सिख दंगे की तर्ज पर साढ़े तीन लाख रुपये दिये गये हैं. यह उन्हें मिला है, जो साबित कर पाये हैं कि वे दंगा पीड़ित हैं. अभी ऐसे बहुतेरे लोग हैं, जो साक्ष्य के साथ साबित नहीं कर पा रहे कि वे पीड़ित हैं जबकि उनके बारे में हर कोई जानता है कि उनकी जीवन में तबाही का रंग दंगे ने ही भरा था. पिछले तीन सालों में नई दिल्ली की संस्था सेंटर फॉर सोशल इक्विटी ने 50 गांवों का दौरा कर और करीब दो हजार लोगों से मिलकर एक रिपोर्ट दंगे के बाद की स्थिति पर तैयार की है. सीएसई की रिपोर्ट बताती है कि 50 परिवार तो ऐसे मिले, जिन्हें आज तक एक पाई भी मुआवजे के तौर पर नहीं मिल सका है जबकि वे दंगे की चपेट में आकर ही अपना सबकुछ गंवाये हैं. जानेमाने सामाजिक कार्यकर्ता अरशद अजमल कहते हैं- नीतीश कुमार ने भी सियासत की. उन्होंने सबको उचित मुआवजा, सहयोग देने का वादा किया था. पेंशन देने का भी वादा किया था लेकिन 1100 में 700 लोगों को ही अब तक मुआवजा भी मिल सका है. अजमल कहते हैं- भागलपुर दंगा भले ही 25 साल पहले का हो लेकिन उसका असर अब तक है. उसकी स्मृतियां सबको कचोटती है. उससे सिर्फ भागलपुर का वास्ता नहीं, उससे पूरे बिहार का वास्ता है और पूरे देश का भी.

भागलपुर से लौटते हुए एक बार फिर हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि 25 साल होने पर दंगे को याद करना तो ठीक, मुआवजा नहीं मिलने वाली बात भी समझ में आ रही है लेकिन सीधे-सीधे यहां अब भी उसका असर कैसा है. सामाजिक कार्यकर्ता उदय बताते हैं- जो नयी बस्तियां दंगे के बाद या दंगे की वजह से बसी है, वहां जाकर यह महसूस सकते हैं. 50 के करीब अलग-अलग टोले-मोहल्ले दंगे के बाद बसे. दंगे की वजह से बसी बस्तियों में सबको याद रहता है कि वे यहां के वासी नहीं है बल्कि उन्हें यहां मजबूरी में आकर रहना पड़ा है. एक दंगे की वजह से. उदय कहते हैं कि साझी संस्कृति के इस गढ़ शहर में आज भी कई जगह देख सकते हैं कि कैसे सामाजिक-सांस्कृतिक ताना-बाना फिर से उस तरह का नहीं बन सका है, जिसमें एक स्वाभाविक लय हो. भागलपुर से चलते-चलते दंगे की कई खौफनाक यादें आंखों के सामने से गुजरती हैं. बस एक खूबसूरत यादव ताड़र-मकरपुर के इलाके में मालूम होता है. बताया जाता है कि दंगे के वक्त जब पूरे भागलपुर में करीब 20 मजार ध्वस्त कर दिये गये तो भी यहां के एक मजार को हिंदुओं ने बचाया. सिर्फ बचाया ही नहीं, मुसलमानों के चले जाने के बाद ही वहां की रवायत को भी जिंदा रखा. अब तक.

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