किस्सा मुजफ्फरपुर इंडस्ट्रियल एरिया में सात साल से चल रही एक बीफ फैक्टरी का

बिहार कवरेज

एक सरकारी इंडस्ट्रियल एरिया. एक अरबों की एक बीफ फैक्टरी. दो पार्टनर, एक हिंदू-एक मुसलमान. सात साल पुरानी कंपनी और किसी को कोई खबर नहीं. यह किस्सा मुजफ्फरपुर का है. चार रोज पहले जब इस फैक्टरी पर छापा पड़ा और यहां के राज सामने आने लगे तो शहर के लोगों की भी आंखें हैरत से फटी रह गयीं. ताज्जुब तो इस बात का था कि इस बात की जानकारी होने से इंडस्ट्रियल एरिया के अधिकारियों और वहां की स्थानीय पुलिस भी इनकार कर रहे थे.

29 जनवरी को छापेमारी के लिए जब अधिकारी उस परिसर में घुसे तो पहले उन्हें यह कह कर रोका गया कि यह फैक्टरी तो बंद है. जब अधिकारी दरवाजा तोड़ कर अंदर घुस ही गये तो तीन सौ मीटर के दायरे में हर जगह बीफ ही बीफ बिखरा था. वहां अलहबाब और अलजजीरा समेत कई ब्रांड के नाम से पैकेटों में बीफ भरा था, जिन्हें यूरोप और अरब मुल्कों में सप्लाई किया जाता था. दिलचस्प है कि यह फैक्टरी फूड प्रोसेसिंग यूनिट के नाम से चल रही थी और इसे हर तरह के सर्टिफिकेट भी मिले थे. एक डायरी भी मिली जिसमें लिखा था कि स्थानीय प्रशासन को 1.65 लाख दिये गये हैं.

फैक्टरी बाहर से ऐसी दिखती है

इस खुलासे के बाद लोगों को समझ आने लगा, मंदिर-मसजिद बैर कराते, मेल कराती मधुशाला. जहां आज देश में मजहब और संप्रदाय के नाम पर हिंदू-मुसलमान एक दूसरे के खून के प्यासे हो रहे हैं. वहीं एक गैरकानूनी कारोबार के लिए एक हिंदू और एक मुसलिम कैसे पार्टनर बन गये और पैसे के जोर पर कैसे पूरे प्रशासन को मैनेज कर लिया गया, यह एक हैरत में डालने वाला किस्सा है.

इस फैक्टरी के दो पार्टनर अंकित कपूर और परवेज नाम के दो युवक हैं. अंकित कपूर दिल्ली के पहाड़गंज का निवासी है और वह महाराष्ट्र से बीफ सप्लाई करता रहा है. उस पर बीफ के कारोबार को लेकर पहले भी मुकदमे होते रहे हैं. दूसरा पार्टनर स्थानीय व्यक्ति परवेज है. जिसके नाम पर यह फैक्टरी भवन बियाडा में अलॉट है. पहले यहां लेदर फैक्टरी थी, बाद में फूड प्रोसेसिंग फैक्टरी के नाम पर इस जगह का उपयोग किया जाने लगा.

इस फैक्टरी में करोड़ों के यंत्र लगे हैं. माइनस 40 डिग्री तक तापमान रखने वाले चार फ्रीजर हैं. बताया जाता है कि यहां से रोज 25 से 30 ट्रक बीफ बाहर जाता था और ट्रक चालकों तक को खबर नहीं थी कि अंदर माल क्या है, उन्हें बताया जाता था कि अंदर लीची के जूस की बोतलें हैं. यहां बीफ भी कटा आता था. उसे प्रोसेस करके यहां पैकेजिंग किया जाता था.

कुछ महीने पहले यहां के किसी व्यक्ति ने एनिमल वेलफेयर बोर्ड को एक गुमनाम खत लिख कर इस फैक्टरी के बारे में सूचना दी थी. बोर्ड के कुछ सदस्य पिछले कुछ दिनों से इस कारोबार का पता लगाने में जुटे थे. उन्हीं के हस्तक्षेप पर यह छापेमारी हुई है.

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