कहानी दीपेश चांडक की, जिसने लालू को 55-60 करोड़, मिश्रा को 50 लाख दिये!

कल लालू के खिलाफ आये फैसले में सरकारी गवाह बने सप्लायर दीपेश चांडक की गवाही की महत्वपूर्ण भूमिका है. उसने ही अदालत को यह बताया था कि उसने श्याम बिहारी सिंहा के जरिये लालू को 55-60 करोड़ औऱ जगन्नाथ मिश्रा को 50 लाख दिये हैं. आज के प्रभात खबर में चांडक का पूरा बयान छपा है. घोटालों को प्रक्रिया को समझने के लिहाज से यह पूरा बयान काफी दिलचस्प है. आप भी पढ़ें.

बिहार कवरेज

सरकारी गवाह (एप्रूवर) बने दीपेश चांडक ने कोर्ट में दिये गये अपने बयान में लालू प्रसाद को कुल 50-60 करोड़ और जगन्नाथ मिश्र को 50 लाख रुपये दिये जाने की बात कही है. इसके लिए उसने श्याम बिहारी सिन्हा द्वारा उसे दी गयी जानकारी को आधार बताया है. उसने अपने बयान में खुद किंगपिन श्याम बिहारी सिन्हा सहित पशुपालन विभाग के अधिकारियों को करोड़ रुपये देने और श्याम बिहारी सिन्हा का पैसा रखने की बात कही है.

चांडक खुद चारा घोटाले में सबसे बड़े सप्लायर के रूप में चिह्नित है. इसे एप्रूवर बनाने के मुद्दे पर छिड़ी कानूनी जंग में जीत के बाद सीबीआइ ने उसे सरकारी गवाह बनाया. चांडक भी चारा घोटाले के 11 मामलों में अभियुक्त है.

अपने बयान में चांडक ने कहा है कि आटा मिल, लोहा और स्टील का उसका पारिवारिक व्यापार है. उसने पशुपालन विभाग में चोकर आदि का सप्लाइ शुरू किया था. उसके द्वारा किये गये सही सप्लाइ के बिल रुकने के बाद उसे एसबी सिन्हा से मिलने का निर्देश दिया गया. उनसे मिलने के बाद उसके बकाये का भुगतान हो गया. फिर व्यापार बढ़ाने के उद्देश्य से दूसरी बार इनसे मिला और पांच हजार रुपये दिया.

इसके बाद से उसे चोकर के अलावा पीली मकई सहित अन्य सामग्रियों की आपूर्ति का आदेश मिलने लगा. पशुपालन विभाग में सप्लाइ के लिए उसने बद्री नारायण एंड कंपनी, मेसर्स क्वालिटी केमिकल्स, माहेश्वरी फीड सहित कई फर्म बनाये. इन प्रतिष्ठानों के माध्यम से उसने पशुपालन विभाग में विभिन्न सामग्रियों की आपूर्ति की. इस दौरान वह एसबी सिन्हा के करीब आ गया.

उसके द्वारा की गयी आपूर्ति का सबसे बड़ा हिस्सा फर्जी था. फर्जी आपूर्ति के लिए सिर्फ बिल बनाया जाता था और उस पर निकासी की जाती थी. पशुपालन विभाग में की गयी आपूर्ति के बदले उसे करीब 95 करोड़ रुपये मिले थे. फर्जी बिल पर की गयी निकासी का 80 प्रतिशत सिन्हा या उनके द्वारा बताये गये अधिकारियों को दे दिया जाता था.

उसने एसबी सिन्हा, केएम प्रसाद सहित अन्य अधिकारियों को करोड़ों रुपये दिये. इससे वह श्याम बिहारी सिन्हा का विश्वासपात्र बन गया.
वर्ष 1992 में आयकर विभाग की अनुसंधान शाखा द्वारा सप्लायरों और अधिकारियों के ठिकानों पर छापा मारे जाने के दौरान सिन्हा ने उसे शशि कुमार सिंह के घर पर बुलाया. एसबी सिन्हा के निर्देश पर डॉक्टर सिंह के घर सूटकेस में रखे गये छह करोड़ रुपये अपने साथ कोलकाता ले गया और अपने कारखाने के गोदाम में रख दिया. इसके बाद सिन्हा का विश्वास और बढ़ गया और वह ज्यादा से ज्यादा पैसा उसके पास रखने लगे. एसबी सिन्हा अपना पैसा विजय मलिक, एमएस बेदी, त्रिपुरारी मोहन प्रसाद और मोहम्मद सईद के पास भी रखते थे.

एसबी सिन्हा के जो पैसे उसके पास रखे गये थे उसमें से सिन्हा के निर्देश पर उनके पारिवारिक सदस्यों के नाम 1.40 करोड़ रुपये का गोल्ड बांड खरीदा. तीन शेल कंपनियों के जरिये 8.5 करोड़ रुपये ब्लैक से व्हाइट किया. आयकर छापे के बाद पैदा हुई परेशानी से निबटने के लिए 15 लाख खर्च कर रांची में आयकर अधिकारी एसी चौधरी की पोस्टिंग करायी गयी.

इसके बाद असेसमेंट में राहत मिली. दिसंबर 1992 में सिन्हा के पोते की छठी थी. उनके निर्देश पर वह कोलकाता से 1.5 करोड़ रुपये लेकर रांची आया. इसे उसने कांके रोड स्थित घर में रखा. घर में डकैती हो गयी. डकैत यह रकम ले गये. डकैती के सिलसिले में दर्ज प्राथमिकी में इतनी बड़ी राशि का उल्लेख नहीं किया गया.

एसबी सिन्हा के करीब होने से वह उसे सब बात बताया करते थे. सिन्हा ने बताया था कि फर्जी निकासी की राशि में से 30 प्रतिशत पशुपालन विभाग के डीडीओ के बीच बांटी जाती थी. ट्रेजरी में पांच प्रतिशत, पटना बजट शाखा में पांच प्रतिशत, क्षेत्रीय निदेशक के कार्यालय में पांच प्रतिशत खर्च किया जाता था. नेताओं व अधिकारियों की सेवा के लिए पांच प्रतिशत रखा जाता था.

30 प्रतिशत राशि में से सिन्हा और केएम प्रसाद आपस में बराबर बांटते थे. जरूरत पड़ने पर दोनों अपने हिस्से की राशि में से भी संरक्षण देनेवाले नेताओं और अधिकारियों पर खर्च करते थे. चांडक ने बयान में कहा कि सिन्हा उसे बताते थे कि लालू से उनका बढ़िया संबंध है.

वह राणा के माध्यम से समय-समय पर उन्हें पैसा देते थे. विधानमंडल के नेता के चुनाव के समय सिन्हा पटना के एसके पुरी स्थित किराये के मकान में ठहरे थे. चुनाव के लिए विधायकों को मैनेज करने के लिए पांच लाख दिया गया था. जून 1992 में सिन्हा ने उसे एक करोड़ रुपये लाने का निर्देश दिया. वह एक करोड़ रुपये कोलकाता से लेकर पटना पहुंचा.

वहां से सिन्हा और केएम प्रसाद के साथ दिल्ली गया. होटल हयात रिजेंसी में ठहरे. वहां आरके राणा ने रुपयों से भरा सूटकेस ले लिया. रात में नौ बजे बिहार भवन से फोन आया. सिन्हा ने बताया कि लालू का फोन है.

इसके बाद वह बिहार भवन जाने कि बात कह कर चले गये और रात 11 बजे होटल लौटे. जनवरी 1996 में सिन्हा को सूचना दी गयी कि लालू पशुपालन विभाग की अनियमितताओं के सिलसिले में जांच का आदेश देने जा रहे हैं. इस सूचना के बाद सिन्हा पटना पहुंचे. राणा के आवास पर बैठक हुई. तय हुआ कि जांच का आदेश वर्ष 1995-96 के लिए दिया जायेगा. इसके लिए 10 करोड़ में सौदा हुआ. इस फैसले से सिन्हा खुश हुए. उन्हें लगा कि वह 1994 में रिटायर हो गये हैं. इसलिए उन्हें कुछ नहीं होगा. पर वह भी इस घोटाले में अभियुक्त बनाये गये. एसबी सिन्हा ने बताया था कि जगन्नाथ मिश्र को भी 50 लाख दिये गये हैं. लालू प्रसाद को कुल करीब 55-60 करोड़ रुपये दिये गये हैं.

(प्रभात खबर से साभार)

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