आज क्यों नहीं मनाते गुरु गोबिंद सिंह की जयंती? #शुकरानासमारोह

पुष्यमित्र

वैसे तो गुरु गोबिन्द सिंह का 351वां जन्मदिन आज ही है, रोमन कैलंडर के मुताबिक उनका जन्म 22 दिसंबर 1666 को पटना साहिब में हुआ था. आप विकिपीडिया की शरण में जायेंगे तो वह भी यही बतायेगा. मगर 351 साल पहले अपने देश में रोमन कैलंडर को मानता ही कौन था. सो गुरु गोविन्द सिंह का जन्म पहले हिन्दू तिथि के मुताबिक पौष सप्तमी शुक्ल पक्ष को मनाया जाता रहा है, जो इस साल के 25 दिसंबर को पड़ता है.

हालांकि नानकशाही कैलंडर के मुताबिक सिखों ने गुरु गोबिंद सिंह का जन्मदिन 5-6 जनवरी की दरम्यानी रात को 2 बजे फिक्स कर दिया है. इसके बावजूद पटना साहिब में आज भी हिन्दू कैलंडर के हिसाब से जन्मोत्सव मनाने का जोर रहता है, इसलिये कई दफा साल में गुरु का जन्मोत्सव दो दफा मन जाता है. तो इस बार 25 दिसंबर को भी गुरु गोबिंद जयंती है और 5-6 जनवरी को भी. बिहार सरकार अपना शुकराना समारोह 25 दिसंबर को ध्यान में रखते हुए मना रही है. यह आज से शुरू होकर 25 तक चलेगा.

नानकशाही कैलंडर की कथा भी दिलचस्प है, हिन्दू कैलंडर की तिथियों के कंफ्यूजन से आजिज आकर सिखों ने 1998 में इस कैलंडर को अपनाया है. हालाँकि उनकी तिथियाँ हिन्दू तिथियों के नाम पर ही है, मगर उन्होंने सौर कैलंडर को अपनाते हुए 14 मार्च को चैत की पहली तिथि मान लिया है. अगर हिन्दू भी 14 जनवरी के हिसाब से अपना सौर कैलंडर तय कर लें तो उन्हें भी अपने पंडितों के पोथी पतरा वाले झंझट से मुक्ति मिल सकती है.

पटना साहिब स्थित गुरुद्वारा हरमंदिर साहब, यहीं गुरु गोबिंद सिंह का जन्म हुआ था

बहरहाल, कैलेंडर वाली बात को छोड़ कर आगे बढ़ते हैं. गुरु गोविन्द सिंह का पटना में जन्म और यहां उनके जीवन के शुरुआती चार सालों के गुजरने की दास्तान बड़ी दिलचस्प है. सिख पंथ के नौवें गुरु गुरुतेग बहादुर जब बंगाल और असम की तरफ धर्म प्रचार के लिये निकले थे तो पटना में उन्हें कई श्रद्धालु मिल गये और उन्होंने अपनी गर्भवती पत्नी गुजरी को यहीं इन श्रद्धालुओं के पास छोड़ दिया और आगे की दुष्कर गंगा यात्रा के लिये निकल पड़े.

गौरतलब है कि इसी क्रम में वे कटिहार के काढ़ागोला के पास लंबे वक़्त के लिये ठहर गये थे. वहां उनके कई लोग अनुयायी बने. उनकी याद में बना एक गुरुद्वारा आज भी वहां है और उस गांव में जाने पर लगता है कि हम पंजाब के किसी गांव में पहुँच गये हैं. 2006 में मुझे उस गांव में जाने का मौका मिला था.

बहरहाल इस बीच पटना में गुरु गोविन्द सिंह का जन्म हुआ. अपने चार साल के प्रवास के दौरान जब तक उन्हें लेने उनके पिता गुरुतेग बहादुर असम से लौटे नहीं उन्होंने पटना में खूब बाल लीलाएं कीं. खाने पीने के शौक़ीन गुरु कभी गंगा घाट स्थित एक मंदिर से भगवान का भोग उठाकर खा लेते तो कभी एक रानी के पास पूरी घुघनी(छोला) खाने पहुँच जाते. यहां से लौटते वक़्त उन्होंने दानापुर में एक महिला के स्वादिष्ट खिचड़ी का लुत्फ़ उठाया.

गंगा घाट के पास वह मंदिर आज भी है, जहां भगवान का भोग वे खा लेते थे. शिकायत करने पर उन्होंने पंडित से कहा कि वही तो भगवान राम हैं, यह भोग तो उन्हीं के लिए लगता है. वहां एक दिन नहाते वक़्त उनका कंगन खो गया था, इसी याद में वहां कंगन घाट बना है और एक छोटा सा प्राचीन गुरुद्वारा भी. निस्संतान रानी ऋतम्भरा देवी जो उन्हें प्यार से घुघनी खिलाया करती थीं उनके स्थान पर आज भव्य गुरुद्वारा बाल लीला मैनी संगत बना है. दानापुर में जिस वृद्धा ने उन्हीं खिचड़ी खिलाया था उसके घर के पास गुरुद्वारा हांडी साहिब बना है.

गुरुतेग बहादुर असम से लौट कर जहां ठहरे थे वहां गुरुद्वारा गुरु का बाग बना. यह दीदारगंज में स्थित है. निहंगों का जत्था हमेशा वहीँ ठहरता है. गुरुद्वारा गाय घाट की कथा पहले ही सुना चुका हूँ. और जन्मस्थल पर बना तख़्त हरमंदिर साहिब मुख्य गुरुद्वारा है ही जो सिख धर्म के पांच तखतों में से एक है.

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