सिलेबस रटाने की दुकानों के बीच पटना के बच्चों के लिए उम्मीद की किरण है किलकारी

पुष्यमित्र

आज सुबह सवा नौ बजे जब तापमान सात या आठ डिग्री होगा, हमदोनों बाप-बेटी स्कूटी पर सिटसिटाये चले जा रहे थे. दस बजे तक तकरीबन 15 किमी की दूरी तय करके किलकारी भवन पहुंचना था. हमदोनों ने ढेर सारे कपड़े पहन रखे थे. हमदोनों को मालूम था कि मौसम की परेशानियों के बावजूद वहां पहुंचना है. आज तिया का वहां पहला क्लास था.

कल किलकारी में नये बैच का इंट्रोडक्शन हुआ था. उनका ऑडिटोरियम खचा-खच भरा था. सीढ़ियों तक पर लोग बैठे थे. वहां हर तबके के बच्चे थे, उनके माता-पिता थे और कई पुराने बच्चे भी थे जो सारा इंतजाम देख रहे थे. नये बच्चों का स्वागत कर रहे थे, उन्हें बिठाने की व्यवस्था कर रहे थे. लोगों के लिए जगह बना रहे थे. जूते-चप्पल रखने का इंतजाम कर रहे थे. कार्यक्रम की फोटोग्राफी कर रहे थे. पावर पाइंट प्रेजेंटेशन दिखा रहे थे. इन सबों के बीच वहां की निदेशक ज्योति परिहार बार-बार कह रही थी, किलकारी छोटी पड़ रही है, हमें अब अपना दिल बड़ा करना होगा. ठंड का मौसम है, सट-सटकर सिकुड़-सिकुड़ कर बैठिये.

इस वीडियो में देखिये, कैसी है किलकारी

तिया को किलकारी में हर हफ्ते कम से कम दो दिन जाना है. एक तो संडे हो जायेगा, दूसरे दिन के लिए मुझे हर हफ्ते एक दिन आधे दिन की छुट्टी लेनी होगी. कम से कम दो महीने तक. उसके बाद बस सेवा का लाभ तिया को मिलेगा. मैं यह तकलीफ उठाने के लिए तैयार हूं. क्योंकि मुझे मालूम है, बच्चों के लिए बेतरतीब इस पटना शहर में जो दो-तीन संस्थान उम्मीद की किरण हैं, उनमें एक किलकारी बाल भवन है. तिया का नाता अगर इस संस्था से जुड़ गया, उसका मन यहां लग गया तो वह जरूर कुछ न कुछ सीख लेगी. उसके जीवन को कोई दिशा मिल जायेगी.

नहीं तो पटना के स्कूलों में सिलेबस चाट कर रटा देने से अधिक कुछ नहीं होता. न खेल-कूद, न आर्ट-क्राफ्ट, न नाच-गाना, न कोई और स्किल. तीन चौथाई स्कूलों के पास तो खेल के मैदान तक नहीं हैं. हां, एनुअल फंक्शन और स्पोर्ट्स डे के नाम पर कुछ-कुछ रस्मी तौर पर जरूर हो जाता है, डेकोरेटिव किस्म का. मगर पिछले आठ-दस सालों में किलकारी नाम की जो यह संस्था उठ खड़ी हुई है, वह बच्चों के लिए वरदान है. यहां बच्चों के लिए 80-90 किस्म के स्किल सिखाने का इंतजाम है, वह भी लगभग मुफ्त. और सबसे शानदार यहां का माहौल है. यह एक अलग ही दुनिया है.

आज सुबह जब हम किलकारी पहुंचे तो देखा कि दो लड़के बैठकर गिटार बजा रहे थे, सामने आग जल रही थी. यह नजारा तो मैंने या तो फिल्मों में देखा था, या नेपाल के चतरा कस्बे में. दूसरी तरफ बच्चे स्केट कर रहे थे. कहीं कराटे की प्रैक्टिस चल रही थी तो कहीं मूर्तियां गढ़ी जा रही थी. कहीं नाच-गाने की आवाज आ रही थी, तो कहीं से बैडमिंटन के रैकट चलने की सांय-सांय. जो जहां था, वहीं रमा था. और सारा इंतजाम बच्चे खुद देख रहे थे.

कल तिया को साइंस ग्रुप में डाला गया. वहां उसे एक हफ्ते रहना है, सांइस ग्रुप में विज्ञान से जुड़ी चीजें एक सीनियर लड़की उसे और उसके साथियों को बतायेगी. उसके बाद फिर उसे क्राफ्ट, डांस, म्यूजिक, मूर्तिकला, नाटक, लेखन, चित्रकला आदि ग्रुपों में एक-एक हफ्ते के लिए डाला जायेगा. उसके बाद उससे पूछा जायेगा कि उसे क्या पसंद है, वह क्या सीखना चाहती है. वह अधिक से अधिक तीन चीजें अपने लिए सलेक्ट कर पायेगी. फिर उसकी ट्रेनिंग चलेगी. इसके अलावा खेल-कूद, कराटे वगैरह तो होगा है.

कल किलकारी के परिचय सत्र में खचाखच भर ऑडिटोरियम

वहां बच्चों का अपना बैंक भी है, जहां वह अपने पैसे जमा कर पायेगी. बच्चों की एडमिनिस्ट्रेटिव कमेटी भी है. अगर वह उसमें शामिल हुई तो किलकारी की व्यवस्था देख पायेगी. मुझे पूरी उम्मीद है कि एक अनगढ़ बच्चे के रूप में इस संस्थान में शामिल तिया को बहुत जल्द उसका रास्ता मिल जायेगा. इसके लिए मुझे जितनी मुश्किल उठानी पड़े, मैं उठाने की कोशिश करूंगा.

पिछले साल नवंबर में बाल दिवस के मौके पर मुझे किलकारी जाने का पहला मौका मिला था. तब से आज तक लगातार मैं इस संस्था का मुरीद बनता जा रहा हूं. यहां के बच्चों के आत्मविश्वास को देख कर दंग रह जाता हू. सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां हर तरह के बच्चे हैं, अमीर-गरीब, हिंदू-मुसलिम, ऊंच-नीच हर तरह के. कोई भेद-भाव नहीं. वरना आजकल के स्कूल तो अभिभावकों के स्टेटस के प्रतीक बन गये हैं. वहां बच्चे कपड़े, टिफिन और गाड़ियों के हिसाब से अपना स्टैंडर तय करने लगे हैं. किलकारी में एक फटे जूते पहनने वाला बच्चा भी आत्मविश्वास से लबरेज और दूसरों को गाइड करता नजर आता है.

वहां जाने से पहले मैं सोचता था कि तिया का क्या होगा. उसके अंदर छिपी प्रतिभा कैसे सामने आयेगी, उसे अपना रास्ता कैसे मिलेगा. अब निश्चिंत हूं.

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