अच्छा ही तो है कि शेषन ओल्ड एज होम में अपनी उम्र वालों के साथ ताश खेल रहे होंगे

बुढ़ापा ओल्ड एज होम में गुजारना पड़ा. अपने समाज में इसे आज तक दुखदायक स्थिति मानी जाती है. मगर जो हालात हैं उसमें किसी अनचाही स्थिति में बेटे-बहुओं के घर में पड़े रहने से बेहतर है ओल्ड एज होम में आजाद जिंदगी जीना और मजे करना. शेषन के ओल्ड एज होम में पाये जाने पर जो भावुक माहौल बना है, उसके बारे में एक नयी निगाह है, वास्तिवकता की धरातल पर लाते हुए, दुनिया भर के ओल्ड एज होम के अनुभव और अपने देश की तल्ख सच्चाई अपने ही अंदाज में बता रहे हैं प्रवीण झा. वही अजूबा नार्वे लिखने वाले जो एक अच्छे कथाकार भी हैं और डॉक्टर भी हैं और सोशल मीडिया पर तो पापुलर हैं ही…

प्रवीण झा

प्रवीण झा को सोशल मीडिया में ज्यादातर लोग जानते हैं. वे नार्वे में रहते हैं और दुनिया भर के बदलते ट्रेंड पर लगातार लिखते हैं. कहानीकारी भी हैं और पेशे से डॉक्टर हैं.

बैंगलूरू से आगे जैन फार्म इलाके में तमाम वृद्धों ने प्रकृति के बीच एक कॉलोनी बसा रखी है, जहाँ चिकित्सकीय और अन्य सुविधाएँ हैं. सब एक ही उम्र के हैं, आनंद में रहते हैं. यूरोप में लगभग सौ प्रतिशत वृद्ध अपने संतानों पर निर्भर नहीं. दो तरह की व्यवस्था है. एक- घर पर रोज कोई व्यक्ति आकर मदद कर जाता है. दूसरा- ओल्ड-एज़ होम. हालिया सुना कि टी. एन. शेषण भी ‘ओल्ड-एज़’ होम जाते रहते हैं.

पर प्रश्न ये है कि संतान ने जिम्मेदारी क्यों छोड़ी? इसका कारण बहुत ही आम और साधारण है.

पिछली पीढ़ियों में सात-आठ बच्चे होते, तो एक संतान अक्सर माता-पिता के साथ गांव में रह जाता. यह लगभग तय था. बाकी संतान धन वगैरा भेजते. अब अक्सर दो संतान होते हैं. अब उन दोनों में कृषि के लिए रूझान पिता भी नहीं डालते, चाहते हैं कि पढ़-लिख कर नौकरी करे. विवाह तीस वर्ष के बाद ही होती है. तो रिटायरमेंट की उम्र में संतान पच्चीस का होगा/होगी. कमाई क्या होगी या होगी भी नहीं, यह आप अंदाजा लगा लें. घरों की ईएमआई भी किसी से छुपी नहीं. तो ऐसा घर जहाँ पिता को एक नवविवाहित संघर्षरत युवा रख सके, और छुट्टियाँ लेकर हस्पताल में इलाज भी कराता रहे, कहाँ मिलेगा? और गर लंबी बीमारी हो तो? नौकरी त्याग दे? और त्याग कर कहाँ जाए? खेती तो आती नहीं.

और अगर पुत्र नहीं, पुत्रियाँ हो? तो क्या वह सास-ससुर और माता-पिता दोनों को संभाल पाएँगी?

और नि:संतान हो तो क्या अन्य परिजनों पर जिम्मेदारी आएगी? और वो परिजन तो शहरीकरण के बाद पलायित हैं? कहाँ दर-दर भटकते रहेंगें?

और दो संतानों में लायक और समर्थ संतान निकलने की संभावना कितनी है? गर न निकले तो इसमें उनका क्या दोष? हम किन अनिश्चितताओं के सहारे जी रहे हैं?

पेंशन या सामाजिक सुरक्षा की कोई नियमित व्यवस्था देश में है नहीं. ऐसा कोई बीमा नहीं जो यह गारंटी ले कि बीमार पड़ने पर अस्पताल ले जाएगा, एम्स में नंबर लगा देगा. मेडिक्लेम है, पर वो भी गांव से उठाकर एडमिट तो नहीं ही कराएगा. यह समस्या दिनानुदिन बढ़ती ही जाएगी, और अब की पीढ़ी ही इसका सबसे अधिक प्रभाव देखेगी. यह समाचार मिलने शुरू हो चुके हैं कि पुत्र माता-पिता को नहीं संभाल पाए. कभी दिल्ली में, तो कभी बंबई में.

पर इस समस्या का हल भी निकलना शुरू हो चुका है. दिल्ली और बैंगलूर में कम से कम ऐसी सुविधाएँ दी जा रही हैं कि आप मासिक फ़ीस भरें और नियमित एक पैरामेडिक आपको देख जाएँगें, घर के छिट-पुट काम भी कर जाएँगें. वहीं ‘ओल्ड-एज़’ होम भी चल पड़ा है, जहाँ तमाम क्रिया-कलाप और चिकित्सकीय व्यवस्थाएँ हैं. संतान जहाँ भी हैं, नियमित फ़ोन करते हैं, कभी अपने पास बुला लेते हैं, घुमाने ले जाते हैं. पर दोनों ही स्वतंत्र और प्रसन्न हैं.

पर यह व्यवस्था मंहगी है. और सरकारी व्यवस्था उपलब्ध नहीं है. सस्ती व्यवस्थाएँ धार्मिक स्थानों पर धर्मशाला रूप में हैं, पर उसका उपयोग यह पीढ़ी कितनी करेगी, पता नहीं. और उससे भी बड़ी समस्या है कि समाज में यह अच्छा नहीं माना जाता. ‘ओल्ड-एज़’ वाले दीन-हीन कहे जाते हैं. जिन देशों में यह व्यवस्था है, वहाँ की औसत आयु नब्बे वर्ष के करीब है. और भारत में वृद्ध चाहे करोड़पति ही क्यों न रहे हों, वृद्धावस्था में संतान-निर्भर हो जाते हैं. और करोड़पति हैं ही कितने? यह आवश्यक है कि ऐसी व्यवस्थाएँ अधिक से अधिक शहरों और ग्रामों में आए, और वृद्धों की आत्म-निर्भरता बढ़े. और इस ‘ओल्ड-एज़’ होम पर लगा दाग भी मिटे. यह एक आनंद-स्थली हो, जिसे देख हम निश्चिंत रहें. अपनी उस अवस्था के लिए हम यह न मनाएँ कि बेटा ही हो जो लायक निकले. बल्कि असल दीन-हीन तो वो है, जो संतान पर आश्रित है और संतान स्वयं संघर्षरत है.

इस कुचक्र से मुक्ति का उपाय गर भारत जैसे देश नहीं ढूँढते, तो वृद्धावस्था भी अभिशाप ही बन जाएगी. समस्या नयी है, तो इसे नए तरीके से ही सोचा जा सकता है. क्या पता टी.एन. शेषण साहब अपनी उम्र के लोगों के साथ ताश खेल रहे हों, और उनके उम्र के बाकी लोग अपने ही घर में अपनी उपयोगिता तलाश रहे हों?

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