100 वर्ष पुराने विश्व प्रसिद्ध पटना संग्रहालय को बचाने की अपातकालीन अपील

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों खुद को पुरातात्विक धरोहरों का संरक्षक साबित करने में जुटे हैं और उनका पीआर डिपार्टमेंट तो एक कदम आगे बढ़कर उन्हें पुराविद बताने लगा है. मगर राज्य के पुरातात्विक धरोहरों के प्रति उनका रवैया अजीब और संदेह उत्पन्न करने वाला है. वे लगातार पटना संग्रहालय की विलक्षण मूर्तियों, यहां बड़ी संख्या में मौजूद तिब्बती पांडुलिपियां जो राहुल सांकृत्यायन अपने साथ लाये थे और दूसरी अमूल्य धरोहरों को निजी हाथों में सौंपने की कोशिश कर रहे हैं. इसके लिए पहले उन्होंने बिहार संग्रहालय का निर्माण कराकर उसे निजी हाथों को सौंप दिया.

वहां इन तमाम चीजों को स्थानांतरित कराने की कोशिश की. मगर जब इतिहास और पुरातत्व से जुड़े देश भर के लोगों की आपत्ति की वजह से वे ऐसा नहीं कर पाये तो अब वे सौ साल पुराने पटना संग्रहालय के प्राइवेटाइजेशन की कोशिश कर रहे हैं. इस निजीकरण की साजिश को रोकने के लिए नंदीग्राम डायरी फेम पत्रकार पुष्पराज ने यह अपातकालीन अपील जारी की है. इस अपील में उन्होंने विस्तार से बताया है कि पटना संग्रहालय का महत्व क्या है और इसे क्यों इसी रूप में बचाये रखना जरूरी है. उन्होंने देश भर के लोगों से अपील की है कि वे हस्तक्षेप करें और इसे बचायें. हम इस अपील को ज्यों का त्यों यहां प्रकाशित कर रहे हैं. इस अपील को पढ़ना बिहार की पुरातात्विक विरासत को समझना भी है.

पुष्पराज

पुष्पराज
वरिष्ठ पत्रकार, नंदीग्राम की डायरी के लेखक के तौर पर देश भर में इनकी ख्याति है.

100 वर्ष पुराने विश्व प्रसिद्ध राजकीय संग्रहालय का स्वामित्व सोसायटी (ट्रस्ट) को सौंपना भारत की सांस्कृतिक संपदा पर बड़ा हमला है. यह हमला राज्य सृजित राष्ट्रीय आपदा है. हम इसकी मुखालफत करते हैं.

100 वर्ष पुराने विश्व प्रसिद्ध पटना संग्रहालय को बचाना क्योँ जरुरी है –

1. ब्रिटिश शासन काल में 1917 में स्थापित पटना संग्रहालय अविभाजित भारत के पुरातन संग्रहालयों में तीसरा पुरातन संग्रहालय है, जो अपनी स्थापना का 100 वर्ष पूरा कर रहा है. यह आश्चर्यजनक सत्य है कि इस प्रसिद्ध राष्ट्रीय संग्रहालय के शताब्दी वर्ष में राजकीय स्तर पर होनेवाले शताब्दी वर्ष के श्रृंखलाबद्ध आयोजनों पर विराम लगाकर इस संग्रहालय को विस्थापित किया जा रहा है.

2. सितम्बर – अक्टूबर 2017 में एक माह ले लिये संग्रहालय को बंद करने की सूचना को (संग्रहालयों की सुरक्षा के सन्दर्भ में अंतरराष्ट्रीय मानदंड के अनुसार) विज्ञापित किए बिना पटना संग्रहालय को एक माह के लिए बंद कर दिया गया. इस दौरान पटना संग्रहालय के अधिकारियों की शक्ति को अपने अंकुश में लेकर विश्व प्रसिद्ध कृति यक्षिणी सहित हजारों पुरावशेष और कला-कृतियों को पटना संग्रहालय से स्वायत्त संस्था बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरित किया गया.

3. बिहार संग्रहालय 1860 के सोसायटी एक्ट से निर्मित एक स्वायत्त संस्था “बिहार म्यूजियम सोसायटी” के द्वारा संचालित है, जिसके मुख्य प्रवर्तक बिहार के मुख्य सचिव अंजनी सिंह हैं. अंजनी सिंह इस ट्रस्ट के नॉडल ऑफिसर हैं. बिहार म्यूजियम सोसायटी के संचालन का सर्वाधिकार नॉडल ऑफिसर के पास केन्द्रित है. बिहार संग्रहालय के निर्माण को माननीय पटना उच्च न्यायालय ने “नोट इन पब्लिक इंटरेस्ट” कहा था. बिहार संग्रहालय के निर्माण स्थल पर छह हैरिटेज बंगले मौजूद थे, जिसे तोड़ने से बचाने के लिए मुख्यमंत्री से देश के इतिहासकारों ने गुहार की थी.

4. पटना के कुछ प्रमुख इतिहासकारों, संग्रहालय विषेशज्ञों, विशिष्ट बुद्धिजीवियों ने 2015 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र भेजकर पटना संग्रहालय के पुरावशेषों को ट्रस्ट के तहत संचालित, निर्मित बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरण की योजना को अवैधानिक बताते हुए पटना संग्रहालय को बचाने की अपील की थी. इस पत्र पर बिहार के प्रथम संग्रहालय निदेशक हरिकिशोर प्रसाद, प्रो.हेतुकर झा, प्रो.अरुण कुमार सिन्हा, प्रो. जयदेव मिश्र, प्रो. राजेन्द्र राम, प्रो. शत्रुघ्न शरण, पद्मश्री उषा किरण खान, पद्मश्री गजेन्द्र नारायण सिंह और नव-नालंदा संग्रहालय के पूर्व-निदेशक भूपेन्द्र नाथ सिंह ने हस्ताक्षर किए थे.

5. बंगाल से बिहार के अलग होने के बाद संविधान सभा के अध्यक्ष, “बिहार निर्माता” डॉ .सच्चिदानंद सिन्हा ने बिहार–उड़ीसा के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर के पटना निवास पर आयोजित बैठक में 15 जनवरी 1917 को पटना में संग्रहालय के निर्माण का प्रस्ताव दिया था. बिहार–उड़ीसा रिसर्च सोसायटी के निर्देशन में अप्रैल 1917 को पटना उच्च न्यायालय के भवन के एक हिस्से में “पटना संग्रहालय” की स्थापना की गयी. 1929 के जनवरी माह तक पटना संग्रहालय पटना उच्च न्यायालय के भवन में कार्यरत रहा. भारतीय स्थापत्य कला के बेहतरीन प्रतीक INDO-SARACENIC “इंडो-सारासेनिक शैली” से निर्मित खूबसूरत भवन में पहली फ़रवरी 1929 से पटना संग्रहालय को नया आयाम प्राप्त हुआ. कालांतर में उड़ीसा के अलग होने के बाद ‘बिहार–उड़ीसा रिसर्च सोसायटी’ बिहार रिसर्च सोसायटी में परिणत हो गया. पटना संग्रहालय के संचालन के लिए पटना म्यूजियम मैनेजिंग कमिटी गठित था, जिसके अध्यक्ष पटना उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश होते थे. 1961 तक पटना संग्रहालय मैनेजिंग कमिटी के द्वारा संचालित होता रहा. 1961 के 25 अप्रैल से बिहार सरकार ने बिहार के पुरातात्विक स्थलों और सभी संग्रहालयों को पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय के प्रशासकीय नियंत्रण में लिया तो पटना संग्रहालय की मैनेजिंग कमिटी का अधिकार समाप्त हो गया.

6. बिहार–उड़ीसा रिसर्च सोसायटी की स्थापना एशियाटिक सोसायटी की अवधारणा पर हुई थी. बिहार–उड़ीसा रिसर्च सोसायटी इतिहास–पुरातत्व के अंतराष्ट्रीय अध्ययन, शोध में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर कार्यरत महत्वपूर्ण संस्था थी. बिहार रिसर्च सोसायटी को पटना संग्रहालय के संस्थापक Mother-organization की तरह देखना चाहिए. भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल बिहार–उड़ीसा रिसर्च सोसायटी के संस्थापकों में थे, जिन्होंने बिहार रिसर्च सोसायटी को आगे बढाने के साथ–साथ 1926 से 1937(मृत्युकाल) तक पटना संग्रहालय की मैनेजिंग कमिटी के अध्यक्ष की जिम्मेवारी निभाई. पटना संग्रहालय के संस्थापकों में एडवर्ड गेट, वाल्स, प्रो.जेएन समादार, डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा, केपी जायसवाल, महापंडित राहुल सांकृत्यायन, एसए शेर, एएस अल्तेकर की भूमिका को शताब्दी वर्ष में स्मरण करना और उनकी भूमिका का दस्तावेजीकरण आनेवाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणादायी होता. दुःखद आश्चर्य यह है कि विगत दो दशक से ज्यादा समय से बिहार रिसर्च सोसायटी की सभी गतिविधिओं को पूर्णतः बंद कर दिया गया है. एक सरकार ने आर्थिक सहायता बंद कर बिहार रिसर्च सोसायटी में एक दशक से ज्यादा वक्त तक ताला लगा दिया था, तो दूसरी सरकार ने इस संस्थान को पटना संग्रहालय का अधिकृत हिस्सा बनाकर संस्थान को नौकरशाही व्यवस्था का अंग बना दिया. इन्डियन हिस्ट्री कांग्रेस ने 1997 में बिहार रिसर्च सोसायटी के अस्तित्व को बचाने के लिए प्रताव पारित किया था. बिहार रिसर्च सोसायटी का पटना संग्रहालय के साथ विलयन के बाद विलयन अधिनियम के प्रावधान के अनुसार “परामर्शदात्री समिति“ का गठन आवश्यक था, जो एक दशक बीते अब तक गठित नहीं हुआ.

महापंडित राहुल सांकृत्यायन के द्वारा तिब्बत से लाई गयी हजारों पाण्डुलिपियों की वजह से यह संस्थान बिहार के सभी शिक्षण संस्थानों और विश्व विद्यालयों से ज्यादा महत्व रखता है. लेकिन अफ़सोस कि बिहार में कभी बिहार रिसर्च सोसायटी के गरिमा की पुनर्वापसी को सांस्कृतिक-राजनीतिक सामाजिक मुद्दा नहीं बनाया गया. (गौरतलब है कि महापंडित के द्वारा रखी पाण्डुलिपियों में ऐसी जानकारी निहित है, जिससे बिहार और भारतीय इतिहास की दृष्टि बदल सकती है.)

7. भारतीय संस्कृति और मानवता की विकास यात्रा के महानतम अध्येता महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भारतीय अतीत के साथ जुड़े बौद्ध संस्कृति के विकास की खोज के लिए तिब्बत की कई कष्टपूर्ण एतिहासिक यात्राएं की और तिब्बत से दुर्गम रास्तों से 22 खच्चरों पर ढोकर साथ लाए बौद्ध साहित्य और कलाकृतिओं से(कुल 6000 से ज्यादा पाण्डुलिपियां और कला कृतियां) पटना संग्रहालय को समृद्धि प्रदान किया था. राहुल सांकृत्यायन के द्वारा तिब्बत और विश्व यात्रा से लाए गए अमूल्य धरोहर पटना संग्रहालय के एक्शेसन रजिस्टर में 1933 से 1956 तक महापंडित से दान स्वरूप प्राप्त होने का प्रमाण है. राहुल सांकृत्यायन के द्वारा लाए गए पाण्डुलिपियों को तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के लिए उपयोगी मानकर स्थानान्तरण चाहती थी, पर काशी प्रसाद जायसवाल जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के विद्वान के हस्तक्षेप से पाण्डुलिपि को बिहार रिसर्च सोसायटी में सुरक्षित बचाया गया. काशी प्रसाद जायसवाल ने उन पांडुलिपिओं का अपनी देखरेख में अनुवाद शुरू कराया था, जो काशी प्रसाद जी की असामयिक मौत की वजह से आगे नहीं बढ़ सका. रॉयल नीदरलैंड एकेडमी ऑफ़ आर्ट्स एंड साईंस ने ERNST STEINKELLNER के द्वारा बौद्ध संस्कृति और तिब्बत में राहुल सांकृत्यायन के द्वारा खोज किए गए ज्ञान भंडार पर किये गये शोध प्रबंध को 2003 में A Tale of Leaves on Sanskrit Manscripts in Tibet their Past and their Future प्रकाशित किया है. यूरोप के विश्व विद्यालयों में राहुल सांकृत्यायन की प्रतिष्ठा किसी भारतीय राजनेता से ज्यादा है. थंका कलाकृतिओं के बारे में राहुल जी ने अपनी जीवनयात्रा में खुद लिखा है कि जर्मनी, फ़्रांस, लन्दन और श्रीलंका में थंका को प्राप्त अप्रत्याशित प्रतिष्ठा के बावजूद उन्होंने पटना संग्रहालय को ही क्योँ प्राथमिकता दी. यूरोप के किसी देश में 4-5 थंका कला कृति के लिए मिले बहुत बड़े धन के प्रस्ताव के बाद राहुल जी को इनकी कीमत का अंदाजा लगा और उन्होंने तय किया कि इतनी कीमती कलाकृति को अपने राष्ट्र की धरोहर के रूप में संरक्षित करना ही आनेवाली पीढियो के लिए उपयोगी होगा. पटना संग्रहालय विकास के कालक्रम में अपने साथ चार संस्थानों को इकट्ठे जोड़ता है.
पुरातात्विक धरोहरों के अद्भुत संग्रहों वाला पटना संग्रहालय, राहुल सांकृत्यायन गैलरी और संग्रहालय की बुनियाद “बिहार रिसर्च सोसायटी“. काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान भी संग्रहालय परिसर में ही स्थित है. यह संस्थान बिहार सरकार के शिक्षा विभाग के द्वारा संचालित है. 67 वर्ष पूर्व स्थापित इस संस्थान को अब तक अपना भवन तक नसीब नहीं हुआ है. शोध और अध्ययन के प्रति बिहार सरकार की उदासीनता का यह बेहतरीन सबूत है.

8. पटना संग्रहालय की स्थापना अखंड भारत की ब्रिटिश सरकार के द्वारा की गयी थी इसलिए इस संग्रहालय को एक राज्य सरकार अगर “राज्य संपदा” की तरह कब्जे में लेती है तो यह नीतिसंगत नहीं है. तत्कालीन पुरातत्वप्रेमी ब्रिटिश प्रशासकों के सहयोग से पटना संग्रहालय के संस्थापकों ने हड़प्पा, मोहनजोदड़ो से लेकर अखंड भारत के पाकिस्तान, बांग्ला देश, रावलपिंडी, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा सहित अलग–अलग हिस्सों में बिखरे पुरातत्व के महत्व की सामग्री को इकट्ठा किया. पटना म्यूजियम की मैनेजिंग कमिटी के आग्रह पर प्राचीन भारतीय मुद्राओं के संकलन के लिए ब्रिटिश सरकार ने उच्च स्तरीय क्वायंस कमिटी गठित की थी, जिसके प्रयास से पटना संग्रहालय के पास प्राचीन दुर्लभ मुद्राओं का संग्रह प्राप्त हुआ. स्थापना काल के उत्तरार्ध में मौर्यकालीन पुरातत्व के लिए प्रसिद्ध हुए पटना संग्रहालय के लिए राहुल सांकृत्यायन ने दुनियां के देशों की यात्रा के दौरान “सांस्कृतिक-राजदूत” की भूमिका निभाई और पटना संग्रहालय को दुनियां के देशों में बौद्ध कालीन पुरातात्विक संग्रहों वाले “बौद्ध संग्रहालय” की पहचान प्राप्त हुई. बौद्ध कालीन पुरातत्वों में भगवान बुद्ध के अस्थि कलश, मौर्य कालीन दीदारगंज यक्षिणी और जैन तीर्थंकर से जुड़े पुरातत्वों ने इस संग्रहालय को भारत के अन्य संग्रहालयों के मध्य विशिष्टता प्रदान की.

9. महापंडित राहुल सांकृत्यायन की पुत्री जया सांकृत्यायन पटना संग्रहालय के शताब्दी वर्ष में विस्थापन की सूचना से विचलित हुईं और उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 12 सितम्बर 2017 को आपातकालीन पत्र भेजा. बिहार के मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में पटना संग्रहालय के धरोहरों के स्थानांतरण के विरुद्ध उन्होंने स्पष्ट लिखा- ”आज के स्वाधीन भारत में राहुल जी की प्रिय कर्मभूमि बिहार में उनकी देन, उनकी सोच का मान ना रखना, उनके प्रति निरादर है. इस विद्या मंदिर को निर्जीव और वीरान ना किया जाए.” इस पत्र के आलोक में मुख्यमंत्री ने सांकृत्यायन परिवार से कोई वार्ता तो नहीं की पर इस पत्र का सकारात्मक असर यह हुआ कि राहुल सांकृत्यायन गैलरी का स्थानान्तरण रुक गया.

10. स्मरणीय है कि भारत सरकार के लेखा महानियंत्रक (CAG) ने वर्ष 2014 में पटना संग्रहालय के सन्दर्भ में अपनी रिपोर्ट में इस बात पर गहरी आपत्ति जताई है कि महापंडित राहुल सांकृत्यायन के द्वारा लायी गयी 6 हजार तिब्बती पाण्डुलिपिओं का वैज्ञानिक तरीके से रखरखाव और प्रबंधन नहीं हो रहा है. सीएजी ने अब तक उन पाण्डुलिपिओं के अनुवाद और प्रकाशन नहीं होने के सवाल पर नौकरशाही की कार्यशैली पर सवाल उठाया है. सीएजी ने पटना संग्रहालय में पुरातत्वों के रख्ररखाव के प्रति लापरवाही को देखते हुए अमूल्य पुरातत्वों के साथ भविष्य में असुरक्षा और गायब होने के की संभावना प्रकट की है. भारत सरकार की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में एक सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर पटना संग्रहालय के पुरातत्वों की हिफाजत के लिए उच्च स्तरीय जाँच कमिटी के गठन करने की जरूरत थी. लेकिन बिहार सरकार ने सीएजी की रिपोर्ट की अनदेखी करते हुए गैर क़ानूनी तरीके से पटना संग्रहालय के सबसे महत्वपूर्ण पुरावशेषों और कला–कृतियों को स्थानान्तरित करने की भूमिका निभाई.

11. जिस पटना संग्रहालय को अखंड भारत में भारतीय संग्रहालय की तरह विकसित किया गया, उस संग्रहालय को मुख्यमंत्री ने राज्य की सम्पदा/अपनी निजी संपदा की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश क्योँ की? जाहिर है कि राष्ट्रीय धरोहर मानकर ही 80-90 के दशक में केंद्र सरकार ने पटना संग्रहालय को अपने अधीन में लेने की प्रक्रिया शुरू की थी पर तत्कालीन बिहार सरकार ने अंतिम समय में किसी तरह का राजनीतिक अड़चन लाकर केंद्र सरकार की कोशिश को रोक दिया था.

12. बिहार सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 23 अक्टूबर 2017 को पटना संग्रहालय की यात्रा की और पटना संग्रहालय के अस्तित्व को कायम रखने की घोषणा की. मुख्यमंत्री पटना संग्रहालय में मौजूद 1764 के पूर्व के पुरावशेष बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरित करने की बार–बार घोषणा कर रहे हैं. मुख्यमंत्री के द्वारा पटना संग्रहालय में तीन घंटे बिताने के बाद 24 अक्टूबर 2017 को टाईम्स ऑफ़ इण्डिया में प्रकाशित समाचार के अनुसार पटना संग्रहालय से 39 हजार पुरावशेषों को स्थानांतरित किया जाएगा. बिहार सरकार के संस्कृति सचिव ने गत वर्ष इसी अख़बार में 50 हजार पुरावशेषों के स्थानांतरण की बात की थी.
(https://m.timesofindia.com/city/patna/Patna-Museum-on-the-verge-of-losingsheen/articleshow/54769499.cms) मुख्यमंत्री ने बिहार संग्रहालय के लोकार्पण के अवसर पर पटना संग्रहालय से 1764 के पूर्व के पुरावशेष बिहार संग्रहालय में स्थानान्तरित होने के बाद पटना संग्रहालय को “मॉडर्न आर्ट गैलरी“ के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी. मौर्यकालीन, बौद्धकालीन विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय से उसकी पहचान बने प्रसिद्ध यक्षिणी सहित हजारों पुरावशेषों को हटाकर “मॉडर्न आर्ट गैलरी“ परिवर्तित करने से भारतीय इतिहास, भारतीय संस्कृति और भारतीय ज्ञान संपदा का जो नुकसान हो रहा है, उसकी भरपाई नामुमकिन है.

13. मुख्यमंत्री ने पटना संग्रहालय को पुनर्गठित करने को घोषणा की है. इस घोषणा के आलोक में पटना संग्रहालय को पूर्णतः वातानुकूलित करने और करोड़ों की लागत से जापान की कंस्ट्रक्सन कम्पनी माकी की मदद से भवन निर्माण कराने और पटना संग्रहालय को सोसायटी में बदलने की प्रक्रिया को अंतिम मंजूरी दिया जाना है. भारतीय स्थापत्य के बेहतरीन प्रतीक “इन्डियन सारासेनिक शैली“ से निर्मित हैरिटेज इमारत के साथ जापान की कंस्ट्रक्सन कपनी के द्वारा निर्माण की योजना अविवेकपूर्ण प्रतीत होता है. भारतीय स्थापत्य की विशेषज्ञता वाले आईआईटी रूडकी जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की उपेक्षा क्यों? 100 वर्ष प्राचीन राजकीय संग्रहालय को सोसायटी के द्वारा संचालित करने की योजना लोकतंत्र विरोधी कदम साबित होगा. यह फैसला सांस्कृतिक संपदा पर राज्य प्रदत्त आपदा है.

14. सीएजी ने पटना संग्रहालय के पुरातत्वों की असुरक्षा पर जो संदेह प्रकट किए थे, इस आधार पर पटना संग्रहालय से पुरावशेषों के स्थानान्तण के बाद क्या उन पुरातत्वों की तस्करी का रास्ता ज्यादा सुगम हो जाएगा? सोसायटी एक्ट से संचालित बिहार संग्रहालय में पुरातत्वों की सुरक्षा के लिए मौजूद भारतीय पुरातत्व संरक्षण कानूनों की सख्ती बेअसर होगी. सोसायटी एक्ट से संचालित ट्रस्ट को निजी स्वामित्व वाले कम्पनी की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. बिहार संग्रहालय का इस्तेमाल मुनाफे के व्यापार में बदल जाए तो आम लोगों के लिए बिहार संग्रहालय में प्रवेश मुश्किल हो जाएगा.

15. विश्व की यह संभवतः पहली घटना है, जब किसी प्राकृतिक-अप्राकृतिक आपदा के बिना एक मुख्यमंत्री और एक मुख्य सचिव के निर्णय से 100 वर्ष पुरातन विश्व प्रसिद्ध संग्रहालय को स्थानांतरित किया जा रहा हो. शोध, अध्ययन की प्रक्रिया से जुड़े अध्येताओं के समक्ष यह सवाल उपस्थित होता है कि पटना संग्रहालय के 100 वर्षों के कालक्रम में दुनिया की तमाम भाषाओँ में अब तक हुए शोध में जिन अभिलेखों, पुरावशेषों, कलाकृतियों को पटना संग्रहालय में दर्शाया गया था, उन हजारों पुस्तकों, जर्नल को पढ़ते हुए निराशा मिलेगी और नये अध्येताओं के समक्ष पुराने विद्वान झूठे साबित होंगे.

16. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटना संग्रहालय से पुरावशेषों के स्थानान्तरण को अपनी बड़ी उपलब्धिओं की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं. पटना संग्रहालय बचाओ समिति को देश के कई प्रतिष्ठित इतिहासकारों, पुरातत्ववेत्ताओं और संग्रहालय विशेषज्ञों का समर्थन प्राप्त है. हमलोग चाहते हैं कि मुख्यमंत्री पटना संग्रहालय को राष्ट्रीय धरोहर स्वीकार करते हुए इस संग्रहालय से स्थानान्तरित सभी पुरावशेषों, कला–कृतियों को अतिशीघ्र पटना संग्रहालय में वापस करने की व्यवस्था करें. बिहार के मुख्यमंत्री के समक्ष भारत के सभी विश्व विद्यालयों के इतिहास के प्राध्यापकों के द्वारा यह प्रश्न खड़ा करना चाहिए कि पटना संग्रहालय के पुरावशेषों के सन्दर्भ में 100 वर्षों में हुए हजारों शोध दस्तावेजों, पुस्तकों को असत्य साबित होने से बचाया जाय. एक विश्व प्रसिद्ध राष्ट्रीय संग्रहालय के स्थानान्तरण से भारतीय इतिहास –पुरातत्व के अध्ययन –शोध की प्रक्रिया किस तरह प्रभावित होगी, इस बात पर देश के तमाम इतिहास के अध्येताओं, शिक्षाविदों और छात्रों के बीच चर्चा होनी चाहिए.

17. इस घटनाक्रम से सबक लेते हुए पुरातत्वों की सुरक्षा के प्रति भारत सरकार को कड़े कानून बनाने चाहिए और देश के तमाम संग्रहालयों और पुरातात्विक स्थलों की सुरक्षा के लिए गृह मंत्रालय को खास तरह का सतर्कता सेल गठित करना चाहिए. पुरातत्व का व्यापार, तस्करी जब कभी होता है तो अधिकतम मुनाफा के लिए पुरातत्व को देश से बाहर पहुँचाया जाता है. भारतीय पुरातात्विक सामग्री यूरोपीय देशों में लाखों–करोड़ों डालर/पौंड में बिकते हैं. पुरातत्व को राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा प्राप्त है. जिसे सरकार राष्ट्रीय धरोहर स्वीकार कर रही है, उसकी सुरक्षा की गारंटी के लिए सख्त राष्ट्रीय सुरक्षा कानून अब आवश्यक हो गया है.

18. बिहार के मुख्यमंत्री अगर पटना संग्रहालय से पुरातत्वों के विस्थापन को जायज मानते हैं तो इस मसले पर पटना में इन्डियन हिस्ट्री कांग्रेस का विशेष अधिवेशन बुलाने की चुनौती स्वीकार करें. मुख्यमंत्री पटना संग्रहालय के विस्थापन की वजह से प्रभावित हो रही सरकार की छवि को सुधारने के लिए बिहार में स्थित सभी संग्रहालयों की यात्रा कर रहे हैं. इतिहास के अध्येताओं को बिहार के मुख्यमंत्री से यह सवाल पूछना चाहिए कि नीतीश कुमार स्वाभाविक रूप से अगर इतिहास, संस्कृति और संग्रहालयों के प्रेमी हैं तो इनके 12 वर्षों के कार्यकाल में पटना संग्रहालय की संस्थापक बिहार रिसर्च सोसायटी की शोध प्रक्रिया को क्योँ धनाभाव में बंद कर दिया गया? नीतीश कुमार के कार्यकाल में महापंडित के द्वारा लाई गयी तिब्बती पाण्डुलिपिओं के अनुवाद–प्रकाशन को क्योँ महत्त्व नहीं दिया गया?

19. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद को भारतीय संस्कृति का रक्षक घोषित करते हैं तो इस सवाल का जवाब भी मुख्यमंत्री को देना चाहिए कि पटना संग्रहालय के संस्थापकों में शामिल ब्रिटिश प्रशासकों की प्रतिमा पटना संग्रहालय में अगर स्थापित है तो पटना संग्रहालय के शताब्दी वर्ष में संस्थापकों में अग्रणी भारतीय प्रतीकों की उपेक्षा क्यों, बिहार निर्माता डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा, काशी प्रसाद जायसवाल और महापंडित सांकृत्यायन की इस शताब्दी वर्ष में पटना संग्रहालय परिसर में ऊँची प्रतिमा क्यों नहीं?

पटना संग्रहालय के अस्तित्व को बचाना भारतीय इतिहास, पुरातत्व के साथ–साथ भारतीय ज्ञान संपदा को बचाने की शिद्दत है. संपादकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, शिक्षकों, छात्रों, राजनेताओं से अपेक्षा है कि वे इस मुद्दे को गंभीरता के साथ समझने की कोशिश करें और पटना संग्रहालय को बचाने के सवाल को बिहार का सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश करें.

प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद, पूर्व राज्यपाल त्रिपुरा(संरक्षक, पटना संग्रहालय बचाओ समिति)
पुष्पराज, लेखक–पत्रकार(संयोजक,पटना संग्रहालय बचाओ समिति),संपर्क – 9431862080.

पटना संग्रहालय को बचाने के पक्ष में –

इरफ़ान हवीब (प्रसिद्ध इतिहासकार, अलीगढ़), रोमिला थापर(प्रसिद्ध इतिहासकार,दिल्ली), डॉ डीएन झा(प्रसिद्ध इतिहासकार, दिल्ली ), डॉ.इम्तयाज अहमद (अ .प्रा.निदेशक, खुदाबख्स लाईब्रेरी, पटना), प्रोफ़ेसर चमनलाल(जेएनयू), मेधा पाटकर(प्रसिद्ध समाज सेविका), एसएस विश्वास (अ.प्रा.महा.नेशनल म्यूजियम,दिल्ली ), हरिकिशोर प्रसाद (अ.प्रा .प्रथम निदेशक, संग्रहालय बिहार), मधु सरीन(वरिष्ठ पत्रकार, न्यूयार्क), जॉन ग्लेस्बी(शिक्षाविद बर्मिघम), जेम्स लोंग्चे वांग्लत( अरुणाचल प्रदेश के पूर्व गृह मंत्री), डॉ. मैनेजर पाण्डेय (प्रख्यात आलोचक, दिल्ली), डॉ. मुरली मनोहर प्रसाद सिन्हा (दिल्ली विश्व विद्यालय शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष), डॉ. रेखा अवस्थी(संपादक, नया पथ, दिल्ली), शेखर पाठक(इतिहासवेत्ता एवं संपादक, पहाड़, नैनीताल), राजीव लोचन साह (संपादक, नैनीताल समाचार), डॉ .विजय बहादुर सिंह (वरिष्ठ आलोचक, भोपाल), प्रोफ़ेसर एजाज हुसैन (इतिहासकार, शांति निकेतन), कृष्ण कल्पित (अ.प्रा.अपर महानिदेशक, प्रसार भारती, दिल्ली), डॉ.हितेंद्र पटेल(प्राध्यापक, रवीन्द्र भारती विश्व. प .बंगाल), डॉ .खगेन्द्र ठाकुर (बिहार सरकार का शिखर सम्मान प्राप्त आलोचक), मदन कश्यप (प्रसिद्ध कवि), दिनेश मिश्र (प्रख्यात नदी विशेषज्ञ एवं सदस्य नमामि गंगा परियोजना, भारत सरकार), डॉ .जगन्नाथ मिश्र (पूर्व मुख्यमंत्री ,बिहार), विकास नारायण राय (अ.प्रा.पुलिस महा. हरियाणा), जयप्रकाश धूमकेतु
(संपादक, अभिनव कदम एवं सचिव, राहुल सांकृत्यायन पीठ. मऊ,ऊ.प्र.), केके शर्मा (अ.प्रा.क्यूरेटर, पटना संग्रहालय), सुधांशु रंजन (वरिष्ठ पत्रकार, दिल्ली), सोनिया जब्बर (लेखिका, दिल्ली), गौरीनाथ (संपादक ,बया), अंशुल छत्रपति (सम्पादक, पूरा सच, सिरसा), लेखराज ढ़ोठ(वरिष्ठ अधिवक्ता, सिरसा), एके जैन (प्रसिद्ध व्हिसिल ब्लोवर, दिल्ली), आशुतोष मिश्र (अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली), आशा काचरू(अ.प्रा.प्रो.जर्मनी), तरसेन सिंह (कृषक नेता, जम्मू), जीत गुहा नियोगी(श्रमिक नेता, छत्तीसगढ़ मुक्तिमोर्चा, दल्ली राजहारा), कर्नल बीसी लाहिरी (प्रतिष्ठित कवि-लेखक, कोलकाता), विजय शर्मा (लेखक, कोलकाता), स्वदेश दास अधिकारी (कृषक नेता, नंदीग्राम), पलाश विश्वास (वरिष्ठ पत्रकार, कोलकाता), सरुर अहमद (वरिष्ठ पत्रकार, पटना), रणजीव(नदी विशेषज्ञ, पटना), कुणाल (राज्य सचिव, भाकपा(माले, बिहार), अवधेश कुमार (राज्य सचिव, माकपा, बिहार), सत्यनारायण सिंह (राज्य सचिव, भाकपा, बिहार), अरुण सिंह(राज्य सचिव, एसयूसीआई, बिहार) अशोक सिन्हा (केदार दास श्रम एवं शोध संस्थान, पटना), सुमंत (भारतीय सांस्कृतिक सहयोग मैत्री संघ, पटना), जया सांकृत्यायन, प्रो जेता सांकृत्यायन, अनिल जायसवाल(पटना उच्च न्यायालय में अधिवक्ता एवं प्रसिद्ध इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल के पौत्र), प्रो एसके गांगुली (अ.प्रा. केमेस्ट्री, पटना वि.).

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One Thought to “100 वर्ष पुराने विश्व प्रसिद्ध पटना संग्रहालय को बचाने की अपातकालीन अपील”

  1. पुष्पराज

    आभार पुष्यमित्र भाई।आपने मेरे द्वारा जारी आपातकालीन पत्र को राज्य की आपदा मानकर सार्वजनिक किया,यह आपकी बौद्धिक सक्रियता का परिणाम है।हमलोग जल्दी ही इस मसले पर मिलकर भावी योजना बनाते हैं।ज्ञान सम्पदा को सबसे बड़ी सम्पदा माननेवाले हम यायावर महापण्डित राहुल सांकृत्यायन को अपना अराध्य-गुरु मानते हैं।100 वर्ष प्राचीन विश्व में प्रतिष्ठित पटना संग्रहालय को उसके शताब्दी वर्ष में नष्ट करने की साजिश इस संग्रहालय के प्रस्तावक संस्थापक बिहार निर्माता डॉ.सच्चिदाननंद सिन्हा, महान इतिहासकार और काशी प्रसाद जायसवाल और महापण्डित का अपमान है।वह राज्यसत्ता पतनशील होकर धूल में मिल जाएगी ,जो पटना संग्रहालय के इन महान संस्थापकों का सम्मान करना नहीं जानती है।महापण्डित राहुल सांकृत्यायन की पुत्री जया सांकृत्यायन के अनुसार सांकृत्यायन परिवार के लिए पटना संग्रहालय पर हुआ सरकारी हमला उत्तराखंड के भूकंप के झटकों से बड़ा झटका है।क्या सुषुप्त बिहार महापण्डित परिवार के इस झटके को अपना झटका मानने के लिए तैयार है?जागो बिहार जागो,जागो बिहार जागो, जागो बिहार जागो रे।