चाहकर भी सरला को एमपी नहीं बनवा सके थे बिरला

इन दिनों राज्यसभा चुनाव में धनकुबेरों के जलवे पर चरचा हो रही है. खासकर आम आदमी पार्टी जैसी पार्टी ने जबसे गुप्ता जैसे बिजनेसमैन को राज्यसभा भेजा है, यह सवाल उठने लगा है कि क्या राज्यसभा की सांसदी सिर्फ पार्टी फंड बटोरने के लिए होती है. क्या उसपर सिर्फ पैसे वालों का हक रह गया है. पहले भी झारखंड से धनपतियों को राज्यसभा भेजा जाता रहा है. बिहार से भी राज्यसभा में कुछ नये लोग जाने वाले हैं. ऐसे में निराला जी का यह आलेख प्रासांगिक है… जब बिरला जी चाहकर भी अपनी पत्नी को राज्यसभा नहीं भेज पाये थे…

निराला बिदेसिया

निराला

दिल्ली के बहाने एक बार फिर से राज्यसभा चुनाव पर चरचा गरम है. जारी है. बात और बहस के केंद्र में वही पुराना अध्याय है कि राज्यसभा धनकुबेरों के बस में है. और फिर बात यहां तक पहुंच रही है कि राजनीतिक दल भी राजनीति को नैतिक पेशा, सेवा माध्यम, बदलाव का उपक्रम बनाने की बजाय, राज्यसभा का इस्तेमाल कर धनार्जन का स्रोत बनाने पर आमादा हैं. इस बहस के बीच में भारत के मशहूर उद्योगपति बिरला परिवार से जुड़ा हुआ एक प्रसंग बहुत प्रेरक है.

यह प्रसंग बिरला परिवार के वरिष्ठ सदस्य बसंत कुमार बिरला से जुड़ा हुआ है. बसंत कुमार बिरला की यह इच्छा थी कि उनकी पत्नी सरला बिरला संसद में पहुंचे. लेकिन राजनीतिक मर्यादा और नैतिकता का खयाल रखने वाले बसंत बाबू ने अपने मन की यह इच्छा भी दफन कर दी. 13 दिसंबर 1953 को एक स्कूल के समारोह में सरला बिरला ने कोई स्पीच दिया था. उस रात बसंत बाबू ने अपनी डायरी में लिखा- ” स्कूल का फंक्शन था. सरला का स्पीच बहुत अच्छी हुआ. में सरला एमपी बन जावे, इच्छा है.”

निजी डायरी की यह पंक्ति बिरला परिवार के सौजन्य से और बसंत कुमार बिरला द्वारा तीन खंडों में लिखित पुस्तक ” स्वांत: सुखाय’ के तीसरे खंड में दर्ज है.

यह सर्वविदित है कि शुरू से ही बिरला परिवार का भारत के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक व सांस्कृतिक फलक पर गहरा प्रभाव रहा है. बिरला परिवार के वरिष्ठ सदस्य तो अपने जीवन में ही सब छोड़ गांधी के फॉलोवर बनते हुए वैश्यर्षी बन गये थे. यह भी सब जानते हैं कि बिरला घराना की राजनीति पर मजबूत पकड़ रही है और गहरा असर भी. उसमें भी बसंत बाबू बिरला परिवार में एक ऐसे सदस्य हुए जिन्होंने तमाम राजनीतिक दलों से तो बेहतर संबंध रखे, सबका सहयोग भी किया और साथी ही साथ साहित्य-कला—स्ंस्कृति के संरक्षण में कई अभूतपूर्व कार्य किये. इन सभी कार्यों में उनकी पत्नी सरला बिरला सहभागी बनी रहीं.

सरला बिरला खुद पुणे के फरग्र्युसन कालेज से पढ़ी लिखी और अपने समय में राजस्थान के प्रतिष्ठित कांग्रेसी नेता ब्रिज बियाणी की बेटी थी. यदि बसंत कुमार बिरला की ओर से एक बार सिर्फ कांग्रेस पार्टी को संकेत भर भर दिया जाता तो सरला बिरला को सांसद बनने में शायद ही रत्ती भर की परेशानी होती. “स्वांत: सुखाय’ पुस्तक में ही देखें तो पता चलेगा कि राजनीतिक दलों को भी आर्थिक तौर पर बसंत बाबू यथासंभव हमेशा मदद किया करते थे. और इतने के बाद यह भी एक खास बात है कि इसी पुस्तक को पढ़ने से पता चलेगा कि बसंत बाबू अपनी पत्नी सरला को बेपनाह मोहब्बत, असीम प्रेम करते थे.  बावजूद इसके बिरला परिवार के इस वरिष्ठ सदस्य ने अपने अरमान को अपने मन में ही दफन कर दिया. सरला को संसद सदस्य बनवाने की अपनी इच्छा और ख्वाहिश को वे उस वक्त बयां न कर सके. यह उनकी मर्यादा ही होगी. नैतिकता का ही खयाल रख कर बसंत बाबू ने ऐसा किया होगा.

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