संतूर दुनिया को कश्मीर का सबसे नायाब तोहफा है- अभय सोपोरी

बासु मित्र

कश्मीर के सोपोरी सूफियाना घराना से ताल्लुक रखने वाले मशहूर संतूर वादक अभय रुस्तुम सोपोरी किस परिचय के मुहताज नहीं हैं. स्पीक मैके के प्रोगाम में पहली बार पूर्णिया आये. विद्या विहार इंस्टीच्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के सभागार में अभय रुस्तुम सोपोरी ने संतूर और कश्मीर के वर्तमान हालत के साथ-साथ देश के विलुप्त हो रही लोककला पर दिल खोल कर बात की. उन्होंने कहा कि कुछ दशक से बदलते लाइफ स्टाइल के कारण युवा कल्चर से दूर होते जा रहे हैं. देश में आज एडवांस इण्डिया की बात हो रही है, जबकि आज की जरूरत है कि कैसे इस रेस से अपने कल्चर को बचा कर रखा जाये.

बासुमित्र के साथ अभय

हमने अपने कल्चर को आदर देना नहीं सीखा

हमने अपने कल्चर को आदर देना नहीं सीखा है. इस प्लेनेट का नियम है कि जिस चीज की आप आदर नहीं करेंगे वह खत्म हो जायेगी. आज पूरे देश से लोक कला विलुप्त हो रही है, लोक वाद्य यंत्र गायब हो रहे हैं. हकीकत यह है कि हमारा कल्चर इतिहास में बदल रहा है, उसे फिर से वापस लाने की जरूरत है, वरना हम सिर्फ इतिहास के किताबों में ही कला को देख पर पढ़ सकेंगे. जब तक लोगों का माइंडसेट नहीं बदलेगा तब तक इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता है.

संतूर के कण-कण में कश्मीर बसा है, यह विश्व को कश्मीर का सबसे नायाब तोहफा

संतूर वादन पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि अक्सर लोग इसे पर्सियन वाद्य यंत्र बताते हैं. जबकि सच तो यह है कि संतूर पूरे विश्व को कश्मीर की देन है और कश्मीर के कण-कण में संतूर बसा हुआ है. सौ तारों वाले इस वाद्य यंत्र को शत तंत्र वीणा भी कहते हैं. इसकी चर्चा तीसरी और चौथी शताब्दी में भी मिलती है. यह एक ऐसा वाद्य यंत्र है जिसे सुनने के बाद आप खुद को कश्मीर की वादियों में होने का अहसास मिलेगा.

300 साल से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है परंपरा

सोपोरी सूफियाना घराना की चर्चा करते हुए अभय बताते हैं कि संतूर वादन की परंपरा 300 सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है. पहले शैव परंपरा और उसके बाद 14 वीं शताब्दी में सूफिज्म आने के बाद इसका स्वरूप काफी बदला. मेरे दादा जी पंडित शंभूनाथ सोपोरी ने अपनी पूरी जिंदगी संगीत की सेवा में गुजार दी. उनके बारे में पूरे कश्मीर में यह कहावत प्रसिद्ध थी कि जो उनके साथ एक बार बैठ जाता था, वह कम से कम एक बंदिश सीख ही लेता था. इसके अलावा मेरे पिता जी पंडित भजन सोपोरी ने संतूर को एक नया आयाम दिया. वे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने महज पांच साल की उम्र में अपना पहला कंसर्ट दिया था, और छह साल की उम्र में उन्होंने रेडियो के लिए प्रोगाम किया था.

सोपोरी बाज संतूर सबसे अलग, इसने दिलाई पहचान

अपने संतूर पर चर्चा करते हुए बताया कि यह अपने आप में सबसे अलग संतूर है, जो इंस्ट्रूमेंटल और गायकी का सबसे बेजोड़ मिश्रण है. इसमें राग-रेंज ज्यादा होने के कारण से इसमें इंडियन क्लासिकल म्यूजिक, सूफी संगीत के अलावा अन्य राग भी काफी आसानी से बजाये जा सकते हैं. इसकी बदौलात आज देश विदेश में काफी सम्मान मिला है.

सुनिये अभय सोपोरी का संतूर वादन

सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण, बेहतरी की उम्मीद

कश्मीर में संगीत और संतूर की स्थिति पर चर्चा करते हुए आप बताते हैं कि कश्मीर में म्यूजिक कोई सब्जेक्ट ही नहीं है. ऐसा नहीं है कि युवा संगीत में रूचि नहीं ले रहे हैं, सही माहौल नहीं मिलने के कारण से शौक खत्म होता जा रहा है. किसी की जगह की कला और संस्कृति को बचाने के लिए सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. आज जो कश्मीर के हालात हैं वह दशकों से सरकार की लापरवाही का नतीजा है. पॉलटिक्स के चक्कर में कश्मीर डूब रहा है, अभी भी मौका है अगर सरकार चाहे तो हालात बेहतर हो सकते हैं.

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