क्या राजद और तेजस्वी के लिए संजीवनी साबित होगी ‘जगन्नाथ’ की रिहाई?

P.M.

सजा सुनाये जाने के आधे घंटे के भीतर ही वरिष्ठ राजद नेता टेलीविजन पर चीखते नजर आये… एक ही मामले में लालू को जेल और मिश्रा जी को रिहाई, यही है मोदी का खेल… देख लो, यही है मोदी का खेल… इशारा साफ था. वे इस मौके को भाजपा की ब्राह्मणवादी सोच को उजागर करने में इस्तेमाल कर रहे थे. क्योंकि ब्राह्मणवाद के खिलाफ राज्य की पिछड़ी जमात को एकजुट करना ही अब तक राजद की सबसे कारगर पोलिटिकल आइडियोलॉजी है. इसलिए जहां राजद में लालू के जेल जाने की वजह से थोड़ी निराशा है, वहीं इस फैसले ने. खासकर डॉ. जगन्नाथ मिश्र की रिहाई के फैसले ने उसके क्षत्रपों को बैठे-बिठाये एक मुद्दा दे दिया है.

इस बात के डीटेल्स कहीं ठीक से उपलब्ध नहीं है कि देवघर ट्रेजरी के इस मामले में जब लालू को दोषी माना गया तो जगन्नाथ को क्यों बरी कर दिया गया. जगन्नाथ मिश्र के पुत्र नीतीश मिश्र जो फैसला सुनाये जाने के वक्त उनके साथ थे ने जरूर रिपोर्टरों को बताया कि उनके पिता को महज तीन सिफारिशी चिट्ठियों की वजह से इस मामले में घसीट लिया गया है. बताया जाता है कि पशुपालन विभाग के एक तत्कालीन पदाधिकारी का टेन्योर बढ़ाने के लिए उस वक्त पूर्व हो चुके जगन्नाथ मिश्र ने चिट्ठियां लिखी थीं. सीबीआई ने उसी को आधार मान कर उनके खिलाफ चार्जशीट तैयार किया.

रांची में राजद समर्थकों के बीच लालू और तेजस्वी

मगर चारा घोटाला के अलग-अलग छह मामलों में जिनमें लालू अभियुक्त हैं, जगन्नाथ मिश्र की क्या भूमिका रही है, कहना मुश्किल है. मुमकिन है कि देवघर ट्रेजरी से की गयी अवैध निकासी में उनका प्रभाव साबित नहीं किया जा सका हो, इसी वजह से उन्हें रिहाई मिल गयी हो. मगर आवाम इन बातों को नहीं समझती. वह यही समझती है कि चारा घोटाले में लालू और जगन्नाथ बराबर के दोषी हैं. अगर आज जगन्नाथ को रिहाई मिली है तो यह मोदी के प्रभाव के कारण, क्योंकि जगन्नाथ मिश्र खुद जदयू में हैं और उनके पुत्र नीतीश भाजपा में.

इससे पहले भी इस मसले को लेकर एक बार राजद राज्य में पोलिटिकल माइलेज ले चुकी है. 1997 में इसी तरह एक बार लालू को तो जेल भेज दिया गया था मगर जगन्नाथ मिश्र को जेल जाने से छूट मिल गयी थी. तब राजद ने नारा उछाला था. लालू को जेल और बाबा को बेल? मतलब यह कि पिछड़ा औऱ यादव होने की वजह से लालू को जेल भेज दिया गया और ब्राह्मण होने की वजह से जगन्नाथ को बेल मिल गया. हालांकि दो माह के भीतर ही जगन्नाथ मिश्र को भी जेल भेज दिया गया.

जेल के सीखचे को सीढी बनाने का हुनर. लालू 1997 में पटना के बेउर जेल में.

इस बार की लालू की जेल यात्रा लगभग तय थी, इसलिए लालू जी और उसके सिपहसारों ने पहले से तय कर रखा था कि इस मौके का लाभ राजद को भावनात्मक समर्थन दिलाने में और तेजस्वी को नेता के तौर पर स्थापित करने में करना है. संयोग से जगन्नाथ के बरी होने से उन्हें बैठे-बिठाये मुद्दा मिल गया है. लालू और उनकी पार्टी यह मानकर चलती है कि लालू के जेल जाने से पार्टी को लाभ मिलता है.

पहली बार 1997 में वे 134 दिनों के लिए जेल गये तो लौटकर आये और लोकसभा चुनाव में वे मधेपुरा से जीत गये, पार्टी को 17 सीटें मिलीं. फिर 1998 में 73 दिनों के लिए जेल गये तो 2000 में विधानसभा चुनाव में विपरीत स्थितियों के बावजूद सरकार बचा ले गये. उस वक्त माना जा रहा था कि राबड़ी सरकार जाने वाली है. 2004 में राजद ने लोकसभा में 22 सीटें जीतीं. इसके बाद एक-दो बार वे और जेल गये मगर एक-आध दिनों के लिए इस बीच उनकी साख मिटती गयी और नीतीश कुमार के दो टर्म लगातार सीएम रहने के बाद यह माना जाने लगा कि अब लालू जी और राजद खत्म हो रहे हैं.

2010 के विधानसभा चुनाव में तो उनकी पार्टी 22 सीटों पर पहुंच गयी. मगर 2013 में चाइबासा जेल में दो माह की सजा भुगतने के बाद लालू लौटे तो 2014 के लोकसभा चुनाव में तो इसका लाभ नहीं मिला, मगर 2015 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी 80 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बन गयी, जो आज भी है. अब यह देखना है कि इस बार की जेल यात्रा लालू को, उनकी पार्टी को और तेजस्वी को कितना उबारती है? फैसला तो उनकी पोलिटिकल लाइनिंग को सूट करता है…

 

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