हॉकरों को हक मिला और पटना में बढ़ गये अखबारों के दाम

बिहार कवरेज

आज तीन दिन बाद अखबार हमारे घरों में गिरा. तीन दिन से अखबार से वंचित रह गये पटना वासियों को सुकून मिला. बजट के अगले दिन भी अगर अखबार नहीं मिलता तो लोगों के लिए बजट समझना मुश्किल हो जाता. क्योंकि बजट ऐसी चीज है कि जिसे आप टीवी देखकर समझ नहीं सकते. मगर क्या आपको खबर है कि इस बीच अखबारों के दाम बढ़ गये हैं.

अपने अखबारों के पहले पन्ने पर देखिये. ज्यादातर अखबारों ने सूचना दी है कि उन्होंने अपनी कीमतें बढ़ा दी हैं. हिंदुस्तान अब पांच रुपये का हो गया है. जागरण ने शुक्रवार के दिन अखबार की कीमत पांच रुपये की है और भास्कर चार रुपये का और प्रभात खबर साढ़े तीन रुपये का. हॉकरों की मांगें मान लेने की वजह से अखबारों ने कीमत बढ़ा दी है.

दरअसल तीन दिन से पटना में हॉकरों ने स्ट्राइक कर रखी थी. वे अपना कमीशन बढ़ाना चाहते थे. अब तक उन्हें प्रति अखबार 1.12 पैसे कमीशन मिलता था, अब उन्हें 1.50 रुपये मिलेगा. मगर कमीशन में 38 पैसे की बढ़ोतरी की वजह से अखबारों की कीमत 50 पैसे से लेकर एक रुपये तक बढ़ गयी है.

हालांकि अखबारों की कीमत बढ़ने में कोई बुराई नहीं है. प्रतिस्पर्धा में बिहार में अखबारों की कीमत घटा दी जाती है. बाद में जब दबाव बढ़ता है तो कीमतें बढ़ जाती हैं. मगर यह सच है कि अखबार की कीमत पाठक नहीं विज्ञापनदाता अदा करते हैं. हम जो अखबार तीन, चार और पांच रुपये में पढ़ते हैं. उसकी छपाई की लागत लगभग 12-15 रुपये होती है. अखबार घाटा उठाकर पाठकों को अखबार उपलब्ध कराते हैं और इस घाटे की भरपाई विज्ञापन से करते हैं. इसी वजह से अखबारों के पन्नों पर खबरों से अधिक जगह विज्ञापनों को मिलती है. इन्हें विज्ञापनों की वजह से अखबार उद्योग फायदे में है.

मगर ये विज्ञापन अखबार के कंटेंटे को बुरी तरह प्रभावित करते हैं. जैसे स्कूल, कोचिंग और अस्पताल, बिग बाजार जैसे निजी संस्थान जो विज्ञापन देते हैं, उसकी वजह से यह अलिखित करार रहता है कि अखबार इनके खिलाफ निगेटिव खबर नहीं छापेंगे. ये तो छोटे विज्ञापनदाता हैं. असली ताकत तो सरकार की है. बिहार में इन अखबारों को मिलने वाले कुल विज्ञापनों में से 40-50 फीसदी सरकारी विज्ञापन होते हैं. आप समझ लीजिये कि जिस उद्योग को आधी आय सरकार से होती हो, वह सरकार के खिलाफ कैसे खबर छाप सकता है. इस वजह से तमाम अखबार सरकार के दबाव में रहते हैं और सरकार के खिलाफ लिखने से बचते हैं, क्योंकि एक निगेटिव खबर की वजह से विज्ञापन बंद कर दिया जाता है.

ऐसा साल में कई बार होता है. आप अगर इसे समझना चाहें तो अपने अखबार में सरकारी विज्ञापनों पर नजर डालें. जब आपको अपने अखबार में सरकारी विज्ञापन दिखने बंद हो जायें तो समझें कि आपके अखबार ने सरकार के खिलाफ कोई तगड़ी खबर लिखी है.

तो आप समझ लीजिये कि आप सस्ते में अखबार पढ़ते हैं इसी वजह से अखबार सरकार के खिलाफ खबर नहीं लिखता है. इसलिए अगर आपको सरकार के खिलाफ भी खबरें पढ़नी है. आपको एक इमानदार और साहसी अखबार चाहिए तो आप अखबार के बदले दस रुपये देने का मन बनाइये. या दस रुपये वाला अखबार पढ़िये.

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