आइये याद करें आदि विद्रोही तिलका मांझी को

आज तिलका मांझी की जंयती है. 268 वीं. हिंदुस्तान के आजादी के इतिहास में तिलका मांझी की हैसियत आदि विद्रोही वाली होनी चाहिए थी. इस पहाड़िया लड़का ने उस वक्त अंगरेजी राज के खिलाफ बिगुल फूंका था, जब ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में सेटल ही हो रही थी. कहा जाता है कि 1783 में उसने भागलपुर के तत्कालीन कलेक्टर क्लीवलैंड को तीर मार कर मौत के घाट उतार दिया था. वह पहाड़िया जनजाति ही थी जिससे अंगरेज सबसे अधिक खतरा महसूस करते थे. पलासी की युद्ध के बाद जब बंगाल में अंगरेजों का दबदबा हो गया तो पहाड़िया अक्सर विद्रोह कर बैठते थे और वारेन हेस्टिंग्स का काफी समय इस विद्रोह को दबाने में बीतता. देश के पहले अखबार बंगाल गजट में अक्सर पहाड़िया विद्रोह की खबरें छपती थीं. मगर आज पहाड़िया जनजाति झारखंड में एक विलुप्त प्राय जनजाति बनकर रह गयी है और आपको पूरे झारखंड में कहीं तिलका मांझी की मूर्ति नहीं मिलेगी. तिलका मांझी का जिक्र आपको मिलेगा भागलपुर में जहां उसके नाम से एक चौराह और एक विवि है. आज भी भागलपुर के एक मित्र सार्थक भारत ने यह आलेख उनकी याद में लिख कर भेजा है. आपके लिए…

सार्थक भारत

दिनांक 11 फरवरी 2018 को भारत और भागलपुर संथाल परगना क्षेत्र के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी, महान् क्रान्तिकारी किसान नेता एवं महान जननायक शहीद तिलकामांझी की जयंती है. हम जानते हैं कि उनका जन्म 11 फरवरी 1750 ई में मूलनिवासी संथाल जनजाति में राजमहल के गांव में हुआ था. उनके पिता सुन्दर मांझी एवं माता सोमी थे. उन्होंने मात्र 29 वर्ष की आयु में 1779 में अंग्रेज ईस्ट इंडिया कम्पनी की दमनकारी नीतियों और कार्यों के खिलाफ मूलनिवासी किसानों को संगठित कर  हुल विद्रोह का बिगुल बजा दिया था. शाल पेड़ के छाल में गांठ बांध कर गांव गांव में भेजा गया और विद्रोह का निमंत्रण दिया गया था.

1779 ई से 1784 ई तक रुक-रुक कर जगह-जगह राजमहल से लेकर खड़गपुर मुंगेर तक अंग्रेजों की सेना के साथ युद्ध का कुशल नेतृत्व तिलकामांझी ने किया. 1779 ई में ही भागलपुर के प्रथम कलक्टर क्लीवलैंड नियुक्त हुए थे. उनके द्वारा जनजातियों में फूट डालने की नीति के तहत पैसे, अनाज और कपड़े बांटने के कार्य किए जा रहे थे और पहाड़िया जनजाति के लोगों की 1300 सैनिकों की भर्ती 1781 ई में की गई थी. उस सैनिक बल का सेनापति जुउराह नामक पहाड़िया कुख्यात लूटेरे को बनाया गया था. ये सैनिक बल तिलकामांझी के जनजाति एवं किसान विद्रोह को कुचलने और दमन करने के लिए लगातार लड़ाई कर रहे थे.

तीतापानी के समीप हुए दो युद्धों में अंग्रेजी सेना की बुरी तरह पराजय हुई थी और तब स्वयं कलक्टर क्लीवलैंड के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना के साथ 1783 के 30 नवम्बर को पुनः उसी स्थान पर तिलकामांझी के साथ भीषण युद्ध हुआ. इस युद्ध में क्लीवलैंड विषाक्त तीर और गुलेल के पत्थर से बुरी तरह घायल हो गए और उसे भागलपुर लाया गया. उन्होंने अपना प्रभार अपने सहायक कलेक्टर चार्ल्स कांकरेल को सौंप दिया और वे अपनी चिकित्सा के लिए इंग्लैंड वापस लौट गए, किन्तु रास्ते में ही जहाज पर 13 जनवरी, 1784 ई को उनकी मौत हो गई.

उसके बाद सी कैपमैन भागलपुर के कलक्टर नियुक्त हुए, जिन्होंने तिलकामांझी की सेना और जनजाति समाज के विरुद्ध भागलपुर राजमहल के पूरे क्षेत्र में पुलिस आतंक का राज बना दिया. दर्जनों गांवों में आग लगा दी गई, सैकड़ों निर्दोष आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिए गए और पागलों की तरह अंग्रेजी सेना तिलकामांझी की तलाश करने लगीं. तिलकामांझी राजमहल क्षेत्र से निकल कर भागलपुर क्षेत्र में आ गये और अब छापा मारकर युद्ध करने लगे. सुल्तानगंज के समीप  के जंगल में 13 जनवरी 1785 ई में हुए युद्ध में  तिलकामांझी घायल हो गए और उन्हें पकड़ कर भागलपुर लाया गया.

यहां कानून और न्याय के तथाकथित सभ्य अंग्रेजी अफसरों ने घोड़े के पैरों में लम्बी रस्सी से बांध कर सड़कों पर घसीटते हुए अधमरे  कर तिलकामांझी चौंक पर स्थित पेड़ पर टांग दिया और मौत की सज़ा दी. अंग्रेजों ने उन्हें आतंकवादी और राजद्रोही माना, किन्तु भागलपुर राजमहल क्षेत्र सहित बिहार के लोगों ने उन्हें अपना महान नेता, महान् क्रान्तिकारी योद्धा और शहीद मानकर श्रृद्धांजलि अर्पित की. उनके सम्मान में शहादत स्थान का नाम तिलकामांझी चौंक रखा गया,

उनके नाम पर तिलकामांझी हाट लगाया गया, जहां से वे पकड़े गए थे उस स्थान को तिलकपुर गांव और फिर भागलपुर विश्वविद्यालय तिलकामांझी विश्वविद्यालय बना. आइए हम अपने प्रथम स्वतंत्रता सेनानी और महानायक अमर शहीद तिलकामांझी की 269वीं जयंती के शुभ अवसर पर उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि और शत शत नमन अर्पित करें.

दिन और तिथि को याद करना आज हमारा मकसद नहीं रहा है मकसद है आजादी के लिए एक ऐसी भावना को याद करना  जो कि अमर शहीद तिलकामांझी के दिलो दिमाग पर उनकी उम्र के तरुणावस्था में सामने आ गई थी. उन्होंने ना सिर्फ होने वाले ब्रिटिश दमन के बारे में पूर्वानुमान लगा लिया था बल्कि किसी भी साम्राज्यवादी शक्तियों का मानसिकता को भी भाप  लिया था. आज यदि भारत 1947 में अपनी स्वतंत्रता को स्वीकार करता है तो निश्चित रूप में अमर शहीद और योद्धा तिलकामांझी को अपने प्रथम स्वतंत्रता सेनानी के रूप में याद करता है.

 

 

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