गुजरात के फैसले से पहले पढ़िये कथा ‘चिमन-चोर’ सिंड्रोम की

P.M.

आज गुजरात का फैसला आने वाला है. फैसला कुछ भी हो सकता है. मोदी की लाज भी बचा सकता है, राहुल का पहला ब्रेक भी दिला सकता है. मगर इससे हम बिहारियों का क्या लेना-देना. हमें गुजरात क्या देश के किसी कोने में होने वाले चुनाव से कोई फर्क नहीं पड़ता. और तो और अपने बिहार में होने वाले नतीजे को भी हम पलट डालते हैं. हारने वालों को राज-पाट दिला देते हैं. खैर, जीत-हार राजनीति के किस्से हैं. इन्हीं किस्सों में एक बड़ा दिलचस्प किस्सा है, मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल का. जो ऐन चुनाव के मौके पर अपने ही विरोधियों के, खुद को चिमन चोर कहने वालों के नेता बन गये. उन्होंने अपनी ही सरकार को चुनाव में हरा दिया. अपने विरोधी को समर्थन देकर सीएम बना दिया.

चिमनभाई पटेल गुजरात की राजनीति के ऐसे कैरेक्टर हैं, जिन्हें इन्गोर नहीं किया जा सकता. और इन्हें समझे बगैर गुजरात की राजनीति को समझा भी नहीं जा सकता. ये देश के पहले और इकलौते कांग्रेसी थे, जो इंदिरा गांधी की आंखों में आंखे डालकर अपना हक मांगते थे. उन्हें चुनौती देकर गुजरात के सीएम बने. फिर ऐसा राज चलाया कि ‘चिमन-चोर’ के नाम से कुख्यात हो गये. फिर अपने ही विरोधियों के साथ खड़े हो गये. उनकी सरकार बनवा दी. फिर 16 साल बाद जब दुबारा सीएम बने तो ‘गुजरात के निर्माता’ मान लिये गये.

इंदिरा को चुनौती देकर सीएम बनने का उनका किस्सा पिछले दिनों कई लोगों ने कहा है. वह यह है कि इंदिरा उन्हें सीएम नहीं बनाना चाहती थी. मगर चिमनभाई ने कहा कि विधायकों का समर्थन उन्हें है. इंदिरा को विधायक दल का नेता बनने के लिए गुप्त मतदान कराना पड़ा. और गुप्त मतदान में चिमन भाई जीत गये और सीएम बन गये. यह 1973 की बात है. मगर यह किस्सा बहुत कम कहा गया है कि कैसे चिमन भाई अपने ही खिलाफ नारा लगाने वाले, खुद को ‘चिमन-चोर’ कहने वालों के नेता बन गये. और अपनी ही सरकार को चुनाव में हरा दिया.

दरअसल यह 1974 का किस्सा है, जब भीषण महंगाई की वजह से गुजरात में छात्रों ने आंदोलन छेड़ दिया था. नव निर्माण के नाम से शुरू हुआ वह आंदोलन बाद में जेपी आंदोलन की पृष्ठभूमि बना. इस आंदोलन की तत्कालिक वजह यह थी कि चिमनभाई ने भीषण महंगाई के बीच छात्रों के मेस का किराये में 30 फीसदी की बढ़ोतरी कर दी थी. छात्र भड़क उठे और जब वे सड़क पर उतरे तो उनका नारा था, ‘चिमन चोर-गद्दी छोड़’. आक्रोश इतना बढ़ गया कि कांग्रेस पार्टी ने ही अपने सीएम चिमनभाई पटेल को बर्खास्त कर दिया और चुनाव की घोषणा हो गयी.

गुजरात में चिमन भाई की सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते नव निर्माण आंदोलन के युवक

मगर दिलचस्प बात यह है कि बर्खास्त सीएम अगले चुनाव में अपनी पार्टी का, अपनी सरकार के काम-काज का बचाव नहीं कर रहे थे. बल्कि वे अपनी ही पार्टी के खिलाफ जन-मोर्चा का गठन करवा रहे थे. जन-मोर्चा बना और चिमनभाई उस जनमोर्चा के अभिन्न अंग थे. वे उस महंगाई के खिलाफ कांग्रेस को घेर रहे थे, जो महंगाई उनके ही राज में फैली थी, अब वे उनके साथ नारा लगा रहे थे, जिनके ‘चिमन-चोर, गद्दी छोड़’ नारे की वजह से यह चुनाव हो रहा था.

जन-मोर्चा चुनाव जीत गया और उनकी मदद से बाबूभाई पटेल सीएम बने. हां, यह जरूर हुआ कि 1974 में सीएम की कुर्सी से उतरे चिमनभाई को दुबारा सीएम बनने में 16 साल लग गये. मार्च 1990 में वे जनता पार्टी और भाजपा गठबंधन सरकार के सीएम बने. अक्तूबर 1990 में जब यह गठबंधन टूटा तो उन्होंने उसी कांग्रेस की मदद से अपनी सरकार को बचा लिया जिसने उन्हें बर्खास्त कर दिया था. जिसे उन्हें चुनाव में हरवाकर बर्खास्तगी का बदला लिया था.

कहते हैं, 1974 में चिमनभाई पटेल की सरकार के पतन के पीछे खुद इंदिरा गांधी का हाथ था. उन्हें चिमनभाई का स्वतंत्र व्यक्तित्व पसंद नहीं था. उन्होंने गुजरात को मिलने वाले अनाज के कोटे में भारी कमी कर दी थी, जिससे गुजरात में महंगाई बढ़ गयी और जनाक्रोश चरम पर पहुंच गया. इंदिरा तो बस चिमनभाई को हटाना और औकात दिखाना चाहती थी, मगर चिमनभाई ने चतुराई से इस आक्रोश को इंदिरा के खिलाफ राष्ट्रीय जनाक्रोश का आंदोलन बना दिया. जिसकी वजह से जेपी आंदोलन शुरू हुआ. इमरजेंसी लगी और इंदिरा की भी सरकार चली गयी.

चिमनभाई पटेल को आधुनिक गुजरात का निर्माता भी कहा जाता है. 1990 में जब वे सीएम बने तो उन्होंने गुजरात के विकास के लिए कई काम किये. इसी में नर्मदा पर बांध बनवाने और समुद्र तट का विकास कराने जैसी योजनाएं हैं, जो आज गुजरात की खुशहाली का कारण बताये जाते हैं. मगर चिमनभाई ने गुजरात में राजनीति की परंपरा शुरू की वह किसी अजूबे से कम नहीं थी. इसलिए गुजरात में चुनाव पर ध्यान मत दीजिए, नतीजों पर भी गौर मत कीजिये. ध्यान दीजिये और पहचानिये कि वहां कहीं कोई और चिमनभाई तो कोई दूसरा दांव नहीं खेल रहा…

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