पढ़िये, सच्चिदानंद सिंह की कहानी ‘पकड़वा’

इस पुस्तक मेले में साहित्यिक रचनाओं से जुड़ी कई किताबें आयीं, इनमें से ब्रह्मभोज सबसे अलग इसलिए है, क्योंकि इसकी कहानियों में पुराना क्लासिकल अंदाज तो है ही, नये जमाने की नयी सोच भी शामिल है. भूले-बिसरे दिनों की छौंक के बीच से कुछ ऐसे किस्सों को निकाल कर लेखक सच्चिदानंद सिंह लाते हैं, जो आज भी आपको उतना ही आकर्षित करती है. आज छुट्टी के दिन आप आराम से पढ़िये उनकी इस संग्रह की एक कथा पकड़वा…

सच्चिदानंद सिंह

लेखक सच्चिदानंद सिंह

भागलपुर विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के रहने के लिए छात्रावास तो हैं पर पर्याप्त नहीं हैं, और सुविधाओं का अभाव तो शुरू से रहा है. बहुत दिनों से विद्यार्थी विश्वविद्यालय के निकटवर्ती इलाकों में रिहायशी घरों में किराए पर कमरे ले कर रहते आ रहे हैं. अब तो उनकी संख्या बहुत बढ़ गयी है पर करीब चालीस-पचास साल पहले भी परबत्ती में टीएनबी कॉलेज या पीजी के बहुत सारे छात्र इस तरह रहते थे. कुछ तो अपना खाना खुद बनाते थे – कोयले की छोटी अंगीठी पर और कुछ नजदीक के होटलों में खाते थे. कुछ हिम्मत वाले हिंदू महीने के अंत में, पैसे घट जाने पर, तातारपुर के मुस्लिम होटलों में भी खा आते थे – जहाँ अगर कोई मांगे तो उसे आठ आने में एकाध मोटी रोटी और आधा कप शोरबा मिल जाता था. खाना बुरा नहीं था, स्वाद बहुत अच्छा रहता था पर कहते हैं कि उन होटलों में सिर्फ गाय के मांस बनते हैं. कुछ कहते हैं नहीं, बकरे भी बनते हैं और मांगने पर बकरे का मांस ही मिलता भी है. कुछ कहते हैं बनते तो सब एक ही साथ हैं. जो हो, अवधेश और प्रहलाद खाने के लिए कभी तातारपुर नहीं गए.

परबत्ती के एक मकान के बाहरी कमरे में दोनों, अवधेश मंडल और प्रह्लाद शर्मा, साथ रह रहे थे. दोनों अलग अलग इलाकों से आते थे. अवधेश सुल्तानगंज के पश्चिम के एक गांव का था और प्रह्लाद पीरपैंती के पास गंगा के दियारे से. दोनों बी.एससी. में एक साथ थे. अच्छी जान पहचान हो गयी थी. जब सांख्यिकी से एमएससी करने आये तो साथ रहने लगे. सेकंड इयर की परीक्षाएं लगभग समाप्त हो चलीं थीं. नौकरी की तलाश तो बहुत दिनों से चल रही थी, अब रिसर्च फेलोशिप की भी खोज शुरू हो गयी थी. एक दिन प्रहलाद ऐसी ही एक फेलोशिप के चक्कर में विश्वविद्यालय के लिए निकला हुआ था जब अधेड़ उम्र के एक संभ्रांत सज्जन उनके कमरे में आ पहुंचे और बिना अपना कोई परिचय दिए अवधेश से उसकी पढ़ाई के विषय में पूछ ताछ करने लगे.

“आप कॉलेज में पढ़ते हैं?”
“जी नहीं पीजी में”
“फर्स्ट इयर में हैं?”
“जी नहीं, सेकंड इयर में; एग्जाम अब खतम ही हो चले हैं” अवधेश ने कहा.
“हम लोग लोदीपुर की तरफ जा रहे थे, लगता है रास्ते से थोडा भटक गए है, लोदीपुर जाने का रास्ता बता पाइयेगा?”
“कोई ख़ास नहीं भटके हैं, करीब पांच सौ गज पूरब जाने पर दक्षिण की तरफ जाता एक पथरीला रास्ता मिलेगा. उसी से रेल लाइन के नीचे सब-वे होते निकल जाइये, लाइन के दो-तीन सौ गज बाद बाएं मुड़ कर बढ़ते जाइये, करीब दो किलो मीटर के बाद पूछ लीजियेगा, लोदीपुर वहीँ पर है.”
आगंतुक थोड़े थेथर किस्म के थे, “पथरीला रास्ता तक हमारे साथ चलिये, हम पूरब से ही आ रहे हैं और उसी को खोजते आ रहे थे पर लगता है मिस कर गए. बस मोड़ दिखा दीजिये, हम आपको वापस यहाँ छोड़ कर निकल जायेंगे.”

गर्मी की दोपहर थी, अवधेश लुंगी गंजी पहने लेटा था, अलमारी से पैंट निकालने लगा. आगंतुक ने कहा, “केवल बुशर्ट डाल लीजिये, कार में तो बैठना है पांच मिनट के लिए”. बात ठीक ही लगी.अवधेश बुशर्ट डाल उनके साथ निकल पड़ा. सामने कुछ गंदे से सफ़ेद रंग की एक एम्बेसडर कार खड़ी थी. ड्राईवर के अलावा सामने की सीट पर एक और व्यक्ति बैठा हुआ था. आगंतुक को अगली सीट की तरफ बढ़ता देख, अवधेश पिछली सीट पर बैठ गया. गाडी चल पड़ी. पथरीले रास्ते वाला मोड़ आ ही रहा था कि उसकी बगल में बैठे लड़के ने उसे खींच कर बीच में बिठा लिया और दोनों ने उसके हाथ पांव कस कर पकड़ लिए. गाडी की स्पीड अचानक बहुत बढ़ गयी. अवधेश चिल्ला उठा, “मोड़वा तो छूट गया…”

आगंतुक का स्वर बदला हुआ था, “चुप चाप बैठे रहो; अरे उसका मुंह नहीं दाबे हो तुम लोग?”
अचानक अवधेश की गर्दन एक बलिष्ट कोहनी की गिरफ्त में आ गयी, जिसकी लम्बी चौड़ी हथेली उसके मुंह से चिपक गयी थी. उस ने कुछ बोलने की कोशिश की पर ऐसा लगा कि पैर की हड्डी पर किसी ने लकड़ी का एक हथौड़ा पटक दिया. अवधेश दर्द से बिलबिला गया. बायीं तरफ बैठे लड़के ने हथौड़ा दिखाते कहा “यह कुछ भी नहीं था, फिर मुंह खोले तो फ्रैक्चर पक्का समझो”.

अब तक उसकी आँखों और उसके मुंह को एक गमछे से अच्छी तरह लपेटा जा चुका था. बोलना तो दूर, सांस लेना भी दूभर हो चला था. अवधेश को कुछ सोचने समझने की फुर्सत नहीं थी. वह जोर जोर से अपने पैर चलाने लगा कि अचानक हथौड़े की एक जोरदार चोट उसकी जांघ पर पडी और वह सिसकने लगा. समझ गया कि फिरौती के लिए उसे उठाया गया है, ये अभी जान से तो नहीं मारेंगे पर अब छूटने का भी कोई उपाय नहीं है. उसने अपने को ढीला छोड़ दिया.

पता नहीं मकान मालिक ने इस कार को देखा था या नहीं. नम्बर तो किसी ने नहीं ही नोट किया होगा पर कोई अगर गंदे सफ़ेद रंग का एम्बेसडर ही बता पाता तो कुछ तो काम आता शिनाख्त करने वालों को. पता नहीं प्रह्लाद को तेल मिलेगा या नहीं, दुकान से ला कर उसने चौके की जगह, अपनी पैंट टांगते समय तेल की बोतल अलमारी में ही रख दी थी. यहाँ जान जा रही है और मैं प्रह्लाद को तेल नहीं मिलने की चिंता कर रहा हूँ. बाबू जी को पता चलेगा तो वे तुरंत घोरघट के महतो जी के पास जायेंगे. महतो जी के बहुत लाग भाग हैं – भागलपुर और मुंगेर, दोनों के एस पी के साथ उनकी जान पहचान है. उसे थोड़ी भूख भी लगने लगी थी. खाना बना कर वह प्रह्लाद का इन्तजार कर रहा था. प्रह्लाद अब तक आ गया होगा, पता नहीं खा रहा होगा कि मेरा इन्तजार कर रहा होगा. तभी अगली सीट से आवाज आयी “प्रह्लाद बाबू, देखिये जो होनी में लिखा रहता है वो होता ही है. अब शांत मन से चलिए, आप को कोई नुकसान नहीं होगा. हाँ आपके बाप साहेब जो दस लाख पर गिरगिटिया नजर लगाए हुए हैं, उनका हाथ खालिये रह जाएगा. लड़की लूल-लांगड़ नहीं है, पढ़ी-लिखी है, गोरी है, सुघड़ है; ठीक से रहियेगा तो आप का भी ठीक से सम्मान होगा; और जो ठीक से नहीं रहिएगा तो लात-जूता भी खाइएगा. जो होनी रहता है सो तो होयबे करता है.”

अवधेश की समझ में अब बात आयी. ये उसके पिता से फिरौती नहीं मांगने वाले हैं. ये तो अपनी समझ से प्रह्लाद शर्मा को पकड़ कर ले जा रहे हैं उसकी जबरन शादी करवाने. उसने कुछ बोलने की कोशिश की, बिना हाथ पैर पटके.

“छटपटा रहा है क्या?” आगे से आवाज आयी.
“नय, एक दम शांत है.”
“मुंह पर से हाथ हटाओ तो क्या कह रहा है”.
मुंह से गमछा हटते ही अवधेश चिल्ला उठा, “अरे हम प्रह्लाद शर्मा नहीं हैं, हम तो अवधेश मंडल हैं. आप लोग गलत आदमी को उठा लिए हैं”.
“दे सार के दू हाँथ, नाम याद आ जाएगा”.

अचानक अवधेश की कनपट्टी पर एक जोरदार मुक्का पड़ा. लगा उस कान से अब कभी कुछ नहीं सुनायी पडेगा. हाथ जकड़े हुए थे, सहला भी नहीं पा रहा था. फिर सिसकने लगा.

“नाम याद आया? बाप साहेब का नाम बताइये”
रोते रोते बोला “जी, बिसुन देव मंडल”
“फिर दे सार के”

दूसरी कनपट्टी पर भी वैसा ही मुक्का पड़ा. अब उस से शांत नहीं बैठा जा रहा था. लगा फिर हाथ पैर चलाने.

“खींच सार के लुंगी” आगे से आवाज आयी और अवधेश की लुंगी उतर गयी. उसने फीते वाला नीले और हरे रंग के स्ट्राइप्स का अंडर वियर पहन रखा था. पर उसका आत्म विश्वास टूट गया और वह फिर सिसकने लगा. अब वह पूरा मामला समझ चुका था. ये उसे पीरपैंती ले जा रहे थे. अभी सबौर पार कर रहे थे फिर घोघा आएगा, फिर कहलगांव, उस के बाद मथुरापुर – जिसके स्टेशन का नाम शिवनारायण पुर है क्योंकि शिवनारायण बाबू ने स्टेशन बनाने के लिए सस्ती के जमाने में एक लाख दिए थे. तब जा कर कहीं आएगा पीरपैंती. प्रह्लाद का गांव करीब तीन किलोमिटर दीयर में है. एम्बेसडर वहाँ तक जा पायेगी? उसे शक था. उसकी भूख भी बढ़ गयी थी. अगर पैंट पहने रहता तो शायद अपना पर्स भी ले कर चलता. अरे पर्स में उसका आई कार्ड भी है, हॉल टिकट भी. दोनों पर उसके नाम और फोटो हैं. उसे बेहद गुस्सा आया अपने आप पर. लुंगी में भी कोई घर से निकलता है.

पर अगर प्रह्लाद को जबरन शादी के लिए उठा रहे हैं तो उसे उसके घर क्यों ले जायेंगे? उसे तो लड़की वालों के घर ले जायेंगे. हो सकता है लड़की वाले भी पीरपैंती के पास के ही हों. पर ऐसा कोई करता है – पड़ोस के लड़के का शादी के लिए अपहरण? सोचने के लिए एक नयी चीज मिली अवधेश को. यदि पीरपैंती नहीं तो कहाँ उसे ले जाया जा रहा है?

“चाइयो के लिए नहीं रोकियेगा?” उसकी दाहिनी बगल से आवाज आयी.
“चुप चाप बैठो” अगली सीट वाले ने कहा.
“प्रह्लाद बाबू भी भुखाए होंगे”
“विवाह के दिन विवाह होने तक वर, वधु और कन्यादान करने वालों को उपवास में ही रहना होता है; ईहो नहीं जानते?”
“हमरा कोई बिआह हुआ है?”
“अरे तुम्हरा नहीं हुआ तो क्या, कराये तो हो न; हमरे साथ ई तीसरा करा रहे हो. बहुत बतिया लिए, अब चुप रहो”.

आवाज से अवधेश को लगा कि कार एक लम्बे पुल के ऊपर से गुज़र रही थी. त्रिमुहान होगा, वह मन ही मन जोड़ रहा था. दस मिनट में कहलगांव पार हो जाएगा. फिर मथुरापुर, फिर पीरपैंती. एक वर्ष हुआ, वह अपने बाबू जी के साथ इधर आया था. बाबू जी की बतायी कहानी याद आ गयी – पीरपैंती एक पुरानी बस्ती है जिस का नाम पहले सिर्फ पैंती हुआ करता था. तीन चार सौ साल पहले पीर सैय्यद कमाल शाह नाम के एक मुस्लिम संत यहाँ आये. उसी पीर के नाम पर जगह का नाम पैंती से पीरपैंती हो गया. गंगा के किनारे वाले पहाड़ पर उस समय कोई नट राजा तपस्या करता था. एक ही जगह पर दो संत नहीं रह सकते थे. पीर और नट में युद्ध हुआ. कमाल शाह जीत गए और वहीं रहने लगे. मरने पर उन्हें इसी पहाड़ पर दफना दिया गया. कहते हैं, उनकी मृत्यु के दस साल बाद मदीना में एक अरब को सपने में पैंती जाने का सन्देश मिला. उसी अरब ने यहाँ कमाल शाह का मजार बनवाया और एक मदरसा भी. बंगाल के जमींदारों से मिल कर उसने छह सौ बीघे खेत भी मदरसा के लिए लिखवा दिए. मजार का खादिम उस खेत को बटाई पर लगाता है. खादिम का घर बस गया और मदरसा उजड़ गया. हिन्दू हों या मुसलमान, सब साले एक समान चोर हैं.

गाड़ी थोड़ी धीमी हुई और लगा जैसे कच्ची सड़क पर उतर रही हो. फिर एक दम रुक गयी. अवधेश के दोनों हाथ सामने ला कर एक रस्सी से बाँध दिए गए. एक दूसरी रस्सी उसके पेट और हाथों के ऊपर लपेट दी गयी, अब वह अपने हाथ हिला भी नहीं पा रहा था. लकड़ी का हथौड़ा उसकी गोद में रख, उसके बगल बैठे लड़के ने, जो थोड़ी देर पहले चाय मांग रहा था, कहा “इसको बूझ रहे हैं न, इधर उधर किये कि पीठ पर बरसने लगेगा. चोट ई लाठी से जादे करता है और घुमाने के लिए ओतना जगहो नहीं खोजता”. गमछे से मुंदी आँखों से भी जैसे वह उसकी मुस्कराहट देख पा रहा था.

गाडी फिर चल पडी.रास्ता कच्चा ही लग रहा था. गमछा के नीचे भी उसकी नाक में मिटटी के कण घुसने लगे. गाड़ी थोड़ी पटकाती हुई चल रही थी. करीब आधे घंटे बाद गाड़ी रुकी और इंजिन बंद हो गया. अवधेश समझ गया कि गंतव्य आ पहुंचा है. कभी वह अपने बाबू जी को याद कर रहा था, कभी प्रह्लाद को पर ज्यादा समय वह मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ रहा था – “संकट से हनुमान छोड़ावें …”.

कार के दरवाजे खुलने की आवाज आयी. आगे बैठा व्यक्ति शायद उतर कर पिछले दरवाजे के सामने खड़ा था. “प्रह्लाद बाबू, ई दूनो मिल कर आप को गाडी से उतार कर जमीन पर खड़ा कर देगा. फिर आपके दूनो बगल हो कर जिधर ले चलेगा उधर चुप चाप इज्जत से चलते रहिएगा. थोडा भी हील हुज्जत किये तो हम पीठ गरमा देंगे”. अवधेश चुपचाप चल पड़ा जिधर उसे ले जाया जा रहा था. लगा किसी बंद कमरे को खोला जा रहा है. अंदर घुसने में चौखट से चोट लगी. हवाई चप्पल पहने था, बांये पैर का अंगूठा झन-झना उठा. अंदर उसे एक चौकी पर बिठा कर उसके पैर भी बाँध दिए गए. ऐसा लगा जैसे सब लोग उसे बिठा, बाँध कर, कमरे से निकल गए. फिर दो-तीन लोगों के आने की आवाज आयी. कुछ औरतें भी थीं. एक आदमी ने उसके मुंह से गमछा खोल दिया. यह वही था जो परबत्ती में उसके कमरे में दो घंटे पहले आया था. लेकिन परबत्ती किसी दूसरे देश में, दूसरे युग में चला गया था. कड़ी आवाज में हिदायत आई, “जितना पूछा जाए उतना ही बोलियेगा नहीं तो फिर बांधना पड़ जाएगा”.

दो औरतें थीं. एक घर की मालकिन लग रही थी दूसरी कम उम्र की थी. “पानी ऊनी पीयब”, मालकिन ने पूछा. पीरपैंती के पास सब पछिआहे बसे हैं- आरा, छपरा के; सब जात के – भूमिहार, कलवार, राजपूत… तीन-चार पुश्त के बाद भी सब भोजपुरी ही बोलते हैं और पूरे इलाके में सिर्फ भोजपुरी ही सुनी जाती है. पीरपैंती बाजार में भी केवल जन, मजदूर ही अंगिका बोलते हैं. लेकिन गल्ला की दुकान वाले मारवाड़ी भोजपुरी और अंगिका दोनों फर्राटे से बोल लेते हैं – अवधेश ने स्वयं उन्हें दोनो बोलते सुना था, जब वह अपने पिता के साथ पीरपैंती में गल्ले की एक दुकान पर पिछले वर्ष गया था.

“ई तो कुछ बोलते नइखन रामानंद बाबू”, मालकिन ने शिकायत की.
“पानी पीजिएगा? कि पहिले पर पैखाना जाइयेगा? ओने बाथरूम लगा हुआ है”
तो इस आदमी का नाम रामानंद है, अवधेश सोच रहा था. “मुंह हाथ धो लें?”

रामानंद ने उसके सारे बंधन एक एक कर खोल दिए. “इस रूम में एक्के दरवाजा है जिसके बाहर दूनो भीमसेन खड़े हैं. ई दाई यहीं रहेगी, कुछ मांगना हो तो इसी को कहियेगा. ठीक से बिहैव कीजियेगा नहीं तो हम ऊ दूनो को बहुत देर तक नहीं सम्भाल पाएंगे”, कहते हुए रामानंद मालकिन के साथ बाहर निकल गया; दरवाजा फिर बंद हो गया. अवधेश बाथरूम में घुस कर खिड़की, रोशनदान देखने, समझने लगा. अंदर दो बाल्टी पानी, दो मग, साबुन वगैरह रखे थे. थोड़ी देर में हाथ मुंह धो कर वह बाहर निकल आया. दायी ने शरबत और पानी के जग रखे. अवधेश ने दो गिलास शरबत फिर एक गिलास पानी पी कर उस से कहा, “हम वह नहीं हैं जो ये समझ रहे हैं”. वह मुस्कुराती रही. एक और औरत अंदर आयी नयी धोती, गंजी ले कर. दोनों मिल कर अवधेश को, जो अभी तक गंजी, अंडर वियर में ही था, हल्दी लगाने का प्रयास करने लगीं. तब तक एक ने देखा कि अवधेश के शरीर पर जनेऊ नहीं था. उसने दूसरी को दिखाया जो पंडित जी को बताने निकल गयी. अवधेश ने फिर कहा कि रामानंद गलत लड़के को उठा लाया है. औरत हूँ, हाँ करती रही जब तक दो पंडित जी कमरे में घुसे.

“का बाबू राउर जनेऊ नइखे?”
“हम लोग जनेऊ नहीं पहनते, आप मान क्यों नहीं रहे कि हम प्रह्लाद शर्मा नहीं हैं”
ठीक है, ठीक है कहते हुए एक पंडित ने अपने कुर्ते की जेब से एक जनेऊ निकाला, “आप का गोत्र क्या है?”
“पता नहीं” अवधेश ने कहा.
“का करिं, गुप्त गोत्र, ना तो कच्छप गोत्र से पढ़ दीं?”
“नाबालिगे रह जैबा का जी? बखीरपुर के सरमा लोगन के गोत्र नइखा जानत? भारद्वाज.”
“पंडित जी आप मान क्यों नहीं रहें हैं, मैं बखीरपुर का प्रह्लाद शर्मा नहीं हूँ; मैं सुल्तानगंज के पास का अवधेश मंडल हूँ.”
“हाँ बाबू”, कहते हुए एक पंडित ने, जो कुछ मन्त्र बुदबुदा रहा था, अवधेश के गले एक जनेऊ डाल दिया.
“अब हरदी उरदी ला टाइम नइखे. धोती पहिना के बाबू के मँड़वा पर लिया आवा जा”, जाते जाते एक पंडित ने औरतों को कहा.

अवधेश को धोती पहननी नहीं आती थी. दरवाजे से दोनो भीमसेन अंदर आ उसे धोती पहना कर आँगन की तरफ ले चले. अवधेश के सोचने की शक्ति ख़त्म हो चुकी थी. पैरों में हथौड़े की, कनपटियों पर मुक्कों की और बांये पैर के अंगूठे में चौखट के मार की कसक पूरी तरह बची हुई थी. अगले तीन-चार घंटे कैसे बीते उसे कुछ याद नहीं. इस बीच उसे बहुत बार खड़ा होना पड़ा, बैठना पड़ा, हाथ धोने पड़े, पैर धुलवाने पड़े, पता नहीं और क्या क्या. शाम के सात ही बजे थे पर लग रहा था तीन दिनों से सोया न हो. अब वह सिर्फ सोना चाहता था, खाना खा कर.

शादी हो गयी. दोनो भीमसेन उस से बारी बारी से लड़की के माता, पिता आदि को प्रणाम करवा रहे थे. एक साली ने एक थाल पर कुछ खाना दिया और कहा “दीदी के साथ खाइएगा, अकेले नहीं” उसकी दीदी कहीं अंदर चली गयी थी, अवधेश ने खाना शुरू कर दिया. साली मना करने लगी, रामानंद ने कहा खाने दो और वह खाता गया. भला हो रामानंद का, उसे नहीं लगता था कि वह कभी रामानंद के प्रति कृतज्ञ होगा!

उसे फिर एक कमरे में बंद कर दिया गया. बाहर से जोर जोर से बहस की आवाज आ रही थी. मालकिन भोजपुरी में कह रहीं थीं होता होगा ऐसा रामानंद बाबू के बिहपुर में, हमारे घर चौठारी के पहले लड़की नहीं जाती लड़के के पास. रामानंद बाबू पहले धैर्य से, फिर क्रोध से, अंत में चिंतित हो समझा रहे थे.

“ई शादी अनल्ल हो सकता है. पूजा वगैरह से शादी होती है पर शादी का सिर्फ होना ही काफी नहीं है. शादी को कंजुमेट भी करना जरूरी है नहीं तो कल लड़का जो कह दे कि उसे जबरजस्ती बैठाया गया था तो शादी अनल्ल हो जाएगा.”
“कंजुमेट क्या होता है”, किसी ने पूछा, शायद लड़की के पिता ने.
“दोनो को कम से कम एक बार पति पत्नी की तरह सोना जरूरी है; तब शादी कभी अनल्ल नहीं होगा; बखीरपुर के शर्मा जी को आप जानते हैं, सब उपाय ऊ खोज लेंगे इस से निकलने का.”
फिर देर तक फूसा फूसी होती रही और अवधेश कब सो गया उसे पता नहीं चला. थोड़ी देर में उसकी आँखें खुल गयीं. दरवाजा बहुत जोर की आवाज के साथ खुला था. लड़की को अंदर धकेल कर फिर बंद कर दिया गया.

बाहर लोग चाय पी रहे थे जब एक पंडित ने कहा कि बखीरपुर के शर्मा जी के इकलौते लड़के के जनेऊ में उस ने भोज खाया था. फिर इस की देह पर जनेऊ क्यों नहीं था?
“हम तो पहले ही कहे थे”, एक सज्जन ने कहा. ये कार में अगली सीट पर रामानंद की बगल में बैठे थे.
“क्या कहा था आपने?”, लड़की के पिता ने पूछा.
“कि यह लड़का सही नहीं लग रहा है.”
“का मरदे एक्के बतिया दिन भर से रगड़ले बाड़ा”, एक भीमसेन की आवाज थी यह.
“आप को शक था तो आप ने शादी होने क्यों दी?” लड़की के पिता के स्वर में क्रोध और भय मिले हुए थे.
“मैंने साफ साफ कह दिया था, पर रामानंद बाबू को शायद अपने पच्चीस हजार की ज्यादा चिंता थी.”
“सरजू राय के बेटा को बुलवाइये, आज भागलपुर गया था.”
थोड़ी ही देर में एक आदमी सुदर्शन राय को लेता आया. उस से घर के बाहर ही बात की गयी जहाँ घर में आज किसी शादी के सम्पन्न होने के कोई लक्षण नहीं दीख रहे थे. उस ने बताया कि वह दोपहर तीन बजे प्रह्लाद से यूनिवर्सिटी में मिला था. प्रह्लाद अपने साथी अवधेश को खोजते वहाँ गया हुआ था. “क्यों क्या हुआ”, उस ने पूछा.
“नहीं कुछ, हम बखीरपुर जाने की सोच रहे हैं.”
सुदर्शन के वापस जाने पर सभी के मन में एक ही बात थी. रैबीघा की किसी लड़की की शादी एक मंडल से हो गयी. अब क्या करें?
“क्या करें? अब करना क्या है, मार के उसको दीयर में गाड़ आइये”, लड़की के पिता और चाचा एक साथ बोले. रामानंद और दोनों भीमसेन खड़े होने लगे.

लड़की की माँ झट से उठ कर अवधेश के कमरे से अपनी बेटी को बुलाने चल पड़ी. उस का दिल धक-धक कर रहा था. शायद शादी अब तक “कंजुमेट” नहीं हुई हो.

हमलोग अवधेश के कमरे में चलें.

उसकी आँखें लगीं हीं थीं कि सुनीता, यही नाम था नव विवाहिता का, के कमरे में आने से वह जग पड़ा. पलंग से उठ, बिना किसी भूमिका के, बिना रुके वह बोलने लगा.
“मेरा नाम अवधेश मंडल है, मैं बखीरपुर का प्रह्लाद नहीं हूँ. हम दोनों साथ साथ रहते हैं परबत्ती में, जहाँ से रामानंद गलती से मुझे उठा लाया है पर अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है.”
सुनीता चुप चाप खड़ी रही.
“मैं इस शादी को नहीं मानता हूँ. मुझे जबरन बिठाया गया था. पूरी शादी मर्जी के खिलाफ हुई है. मेरे माता पिता भी इसे नहीं मानेंगे. आप को भी इसका विरोध करना चाहिए.”

उसे क्या करना चाहिए यही तो सुनीता की समझ में नहीं आ रहा था. अपने पिता की परेशानियां देख पिछले चार महीनों से उसे लग रहा था कि उसे पैदा ही नहीं होना चाहिए था. उसे ही क्या उसके समाज में किसी लड़की का जन्म लेना वर्जित हो जाना चाहिए. उसे पता था कि शादी जबरन हुई है.

शर्मा जी के पास उसके पिता पिछले पांच महीनों से जा रहे थे. प्रह्लाद अपने पिता का इकलौता पुत्र था, कम से कम दो सौ बीघे के जोतदार होंगे बखीरपुर के शर्मा जी. डेढ़ सौ बीघे जमीन तो उन्हें बुढऊ शर्मा, अपने पिता, से मिली थी – लेकिन सब दियारे की जमीन, गंगा जी का बहाव बदलने से पूरा डेढ़ सौ बीघा एक ही बरसात में कट भी सकता है. शर्मा जी दूर की सोचते हैं. बारह साल पहले उन्होंने कुछ जमीन पीरपैंती के पास खरीदी थी, जहाँ उनका कुनबा गंगाजी में पूरा बखीरपुर कट जाने पर भी बस सकता है – अपने तमाम ताल-झाल, गाय-गोरु के साथ. हर साल वे खेती की कुछ जमीनें दक्षिण में भी खरीदते आ रहे हैं, दियारे से बहुत दूर जहाँ वे साल में तीन फसलें ले लेते हैं.

शर्मा जी ने खुद यह सब बताया था जब राय जी सुनीता के रिश्ते की बात ले कर पहली बार बखीरपुर गए थे. शर्मा जी धीरे से यह भी बोल गए थे कि पैर उतने ही फैलाने चाहिए जितनी लम्बी चादर हो किसी की. राय जी को यह बात लग गयी थी, अगली बार जा कर छह लाख की बोली लगा आये. पर शर्मा जी ने प्रह्लाद के हाथ के लिए रिज़र्व प्राइस दस लाख रखा था, ऊपर के खर्चे अलग से. जब बहुत मिन्नत के बाद भी शर्मा जी न पसीजे तो राय जी ने रामानंद कंपनी की शरण ली. सिर्फ पच्चीस हजार और खर्चे में रामानंद प्रह्लाद को उठा लाने को तैयार हो गया था. सब जानते हैं उसने इस तरह बहुत शादियां करायीं हैं; नवादा से नरकटियागंज तक समाज में उस की समाज-सेवा की धाक है.

रामानंद से ऐसी गलती नहीं हो सकती, प्रह्लाद भी अपने पिता की तरह दस लाख खो जाने के चलते इस तरह की नौटंकी कर रहा है. यह सब सोचते हुए सुनीता कह पड़ी “जो होना था वह हो गया. देवताओं को साक्षी मान आप ने सिन्दूर दान दिया, हवन किये, अग्नि के फेरे लगाए, अब ऐसी बातें आप को शोभा नहीं देतीं. आप मेरे पति हैं, मेरे स्वामी.”
“पर मैं वह नहीं हूँ, जो आप सोच रहीं हैं.”
“आप जो भी हैं अब मेरे पति हैं और आप को भर्तारोचित व्यवहार ही करना चाहिए मेरे साथ.” यह ज्ञान की बात उसकी माँ ने उसे कमरे में धकेलने के ठीक पहले सिखायी थी. इसी तरह, दोनों दो समानांतर लीकों पर चलते रहे जब अचानक किसी ने जोर से दरवाजा खटखटाया. दोनों चौंक गए. सुनीता ने धीरे से दरवाजा खोला ही था कि उसकी माँ ने उसे खींच बाहर किया.

अवधेश वापस बिस्तर पर लेट गया. सब कुछ उसकी समझ के बाहर था. अब नींद भी काफूर हो चुकी थी. देर तक वह आँखें खोले लेटा रहा. एकाध घंटे बाद दरवाजा फिर खुला – एक दम आहिस्ते से. दो व्यक्ति अंदर आये और दरवाजा बंद हो गया. अवधेश थका हुआ था, आँखें बंद रखे वह लेटा रहा.

“उठिए”, सुनीता ने कहा, “समय एक दम नहीं है. आप को मारने की योजना बनी है. चाचा जी आप को भागलपुर ले जाने के लिए गाडी में बैठाएंगे पर पीरपैंती से पूरब मुड़ कर सकरीगली की तरफ ले चलेंगे. रामानंद और उसके दोनो साथी पीछे से आ कर…”
“क्या क्या ..”, कहते वह हड़बड़ा कर उठ बैठा
“एक दम समय नहीं है, दुलाली एक साड़ी लायी है तुरंत पहन लीजिये और उस के साथ निकल जाइये. वह आप को अपने घर के पास एक स्कूल में ले जायेगी. मैं भी उसी की एक साड़ी पहन कर थोड़ी देर में वहीँ आ जाउंगी.”

अवधेश साड़ी पहनने लगा पर वह बहुत डर गया था, कहीं स्कूल के निकट ही उसकी ह्त्या न कर दी जाए.

“जल्दी कीजिये, समय एक दम नहीं है”, सुनीता उसे दरवाजे की तरफ धकेल रही थी.
दुलाली और अवधेश निकल पड़े, दुलाली ने साड़ी लपेट दी थी और एक लंबा आँचल सर पर रख कर उसके मुख को ढक दिया था.

“कोई कुछ बोले आप एक दम चुप रहियेगा और मेरे पीछे पीछे सर झुका कर चलते रहियेगा.”
बाहर आँगन में कोई नहीं था. दुलाली पिछवाड़े के रस्ते निकल पड़ी.

घर से निकलते ही कुछ कुत्ते भूँकने लगे.
“के जा ता?” एक आवाज आयी.
“हम्मैं छि दुलाली.”
“दुलाली? काम हो गइल तोहार? आउ के बिया?”
“सनका माय”

अवधेश की सांस रुक गयी थी. दुलाली के पीछे पीछे चलता रहा. करीब पंद्रह मिनट में वे स्कूल के पास पहुँच गए. दुलाली अंगिका बोल रही थी, अवधेश के गांव की बोली. इस से वह थोड़ा आश्वस्त हुआ था. पर दुलाली नाम कुछ अटपटा लगा उसे. उसने पूछ ही डाला. दुलाली के पिता बांग्ला देश से भाग कर आये थे. माँ पाकुड़ के पास की थी. वे बंगाली थे पर तीस साल से पीरपैंती के पास रैबीघा में बसे थे. दुलाली का जन्म यहीं हुआ था, वह बंगाली एक दम नहीं बोल सकती थी. अवधेश ने अपने बारे में पूछा. यहाँ वे कब तक रुके रहेंगे?वह अपने कपडे कब पहन पायेगा? पर अपने कपड़ों के नाम पर तो बस उसकी लुंगी, गंजी थी और पैसों के नाम पर शून्य. अवधेश चुप हो रहा. पर चुप्पी चिंतामुक्त नहीं थी. दुलाली ने बताया कि सुनीता अपने गहने लेने घर में गयी है और कुछ पैसे भी. सब सामान ले कर दुलाली की ही साड़ी पहन कर वह स्कूल पर जल्द आएगी और वे पगडण्डी पकड़ कर मथुरापुर की तरफ निकल पड़ेंगे. दो- तीन घंटे का रास्ता है. मथुरापुर फांड़ी (पुलिस चौकी) पर ही उसका अपनी लुंगी गंजी पहनना वाजिब है. पीरपैंती थाने में सब राय जी और शर्मा जी दोनों को जानते हैं वहाँ क्या होगा कोई नहीं कह सकता.

आधे घंटे में सुनीता आ पहुंची. तीनो निकल पड़े, निश्शब्द. दुलाली सबसे आगे थी, उस ने रास्ता देख रखा था. बीच में सनका माय यानी अवधेश और सबसे पीछे सुनीता. रास्ते में दो नाले पड़ते थे पर बैसाख आते आते दोनों सूख जाते थे और गर्मियों में कहीं कोई दलदल भी नहीं था. तीन घंटों में वे मथुरापुर के निकट पहुँच गए. शिवनारायणपुर स्टेशन पहले पड़ा, फांड़ी आगे थी. अवधेश थाने, फांड़ी के नाम से डर रहा था. उसे ट्रेन से भागलपुर निकल जाना अधिक सुरक्षित लगा. सुनीता मान गयी. दुलाली वापस जाना नहीं चाह रही थी. उसे भय था वह पकड़ ली जायेगी. अवधेश ने अपने कपडे बदले, दुलाली ने तीन टिकट खरीदे और पश्चिम जाती पहली ट्रेन में तीनो दुबक कर बैठ गए.

कहलगांव पहुँचते पहुँचते पूर्व दिशा में आकाश पर लाली दीखने लगी थी. अन्धकार के आवरण की सुरक्षा फिसली जा रही थी. तीनो को पकड़े जाने का डर सता रहा था जब अवधेश ने उतरने का निर्णय ले लिया. कहलगांव में स्टेशन से डेढ़ किलोमीटर पर उसके एक रिश्तेदार रहते थे. सूर्योदय होते होते तीनो उनके दरवाजे पर पहुँच गए. लुंगी गंजी में, जनेऊ धारी अवधेश को उतने तड़के देख सभी अचंभित थे. सारी बात सुन कर पड़ोस के कुछ और लोगों को सलाह मशविरा के लिए बुला लिया गया. सब की राय बनी कि एक पडोसी की गाड़ी से तीनो को तुरंत सुल्तानगंज, अवधेश के घर, पहुंचा दिया जाय. आठ बजते बजते पूरी पार्टी सुल्तानगंज पहुँच गयी. अवधेश के पिता को पहले संदेह हुआ कि उनके लड़के ने एक विजातीय लड़की को घर से भगा किसी मंदिर में शादी कर ली है. दुलाली, सुनीता और कहलगांव के उनके सम्बन्धी उन्हें विश्वास दिलाने में सफल रहे.

फिर जैसा होता है, औरतें अवधेश की कनिया को ठीक से देखने के लिए अंदर ले गयीं, पुरुष निकल पड़े भागलपुर के लिए. रामानंद के खिलाफ अपहरण की शिकायत दर्ज करायी गयी. जब सुनीता को स्वीकार ही कर लिया गया था तो राय जी के खिलाफ जबरन विवाह कराने की शिकायत दर्ज कराने में कोई तुक नहीं था. हाँ, रामानंद और उसके दोनो भीमसेन से अभी भी आशंका थी. इस आशंका की सनहा भी लिखवा दी गयी. दस दिनों बाद अवधेश ने एम.एससी. का अपना आख़िरी पेपर देना था. परबत्ती का डेरा कतई सुरक्षित नहीं रह गया था. एक महीने के लिए एक डेरा खोजा गया जिसमें सुरक्षा की दृष्टि से अवधेश का पूरा परिवार उसके साथ रहा. इस बीच पटना के एक शोध संस्थान में अवधेश को दो वर्षों की रिसर्च फ़ेलोशिप मिल गयी. काम पर्मानेंट नहीं था पर तनख्वाह व्याख्याता की तनख्वाह के बराबर थी.

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