जानिये, रक्सौलवासियों ने कैसे लड़कर बचाया अपने शहर का पर्यावरण?

वैसे तो बिहार आंदोलनों की प्रयोगशाला रहा है, मगर कल राज्य के सीमावर्ती कस्बे रक्सौल में जो आंदोलन हुआ है वह किसी राजनीतिक बदलाव के लिए नहीं हुआ, न सामाजिक न्याय के लिए या सरकारी योजना का लाभ हासिल करने के लिए. यह आंदोलन हुआ शहर के पर्यावरण को बचाने के लिए. दिलचस्प है कि इस आंदोलन में किसी एनजीओ या एक्टिविस्ट की भूमिका नहीं थी. यह शहर का स्वतःस्फूर्त आंदोलन था. कल रक्सौलवासियों ने यह आंदोलन जीत लिया. आइये इस अनूठे आंदोलन के बारे में जानें और वहां के लोगों को बधाई दें.

P.M.

क्लिंकर ऐसा दिखता है.

बिहार के सीमावर्ती कस्बे में पिछले कुछ दिनों से एक अनूठा आंदोलन चल रहा था. यह आंदोलन शहर की आबोहवा को सुरक्षित करने के लिए जारी थी. मगर इस आंदोलन को करने वाले लोग कोई पर्यावरणविद नहीं थे, वे शहर के आमलोग थे. दिलचस्प है कि इस स्वतःस्फूर्त आंदोलन का सकारात्मक नतीजा सामने आया और सरकार ने आखिरकार उनकी मांगों को मान लिया.

दरअसल यह आंदोलन क्लिंकर नामक एक खनिज पदार्थ के रक्सौल रेलवे यार्ड में डंपिंग के विरोध में शुरू हुआ था. मध्य प्रदेश के सीमेंट उत्पादक जिलों से यह क्लिंकर नेपाल भेजा जाता है और इस दौरान इसे पूर्वी चंपारण के सीमावर्ती रक्सौल कस्बे में डंप किया जाता है. कहा जा रहा है कि क्लिंकर का निर्यात भारत और नेपाल के कुल व्यापार का 20 फीसदी है और इसकी सबसे अधिक मात्रा इसी रास्ते से नेपाल जाती है.

रक्सौल में भारी मात्रा में क्लिंकर की डंपिंग की वजह से शहर के पर्यावरण पर नकारात्मक असर पड़ रहा था. स्थानीय लोगों का कहना था कि काले धूल-कण से दिन में ही अंधेरा छा जाता है. लोग सांस, फेफड़ा, चमड़े व पेट की बीमारियों के साथ-साथ आंखों में जलन से भी परेशान हैं. आसपास के पेड़-पौधों का सूख जाना, टहनियों का गिरना आम बात है. लोग घरों की खिड़कियां व दरवाजे बंद रखते हैं. इसके बावजूद भोजन व अन्य खाद्य पदार्थों में इसके कण मिले नजर आते हैं, जिन्हें जबरन निगलना पड़ता है. कुल मिलाकर एक लाख की आबादी इस प्रदूषण से परेशान है.

दरअसल क्लिंकर एक ऐसा कच्चा माल है जिसके सांस में जाने से सिलिकोसिस सहित कई बीमारियों का खतरा रहता है. मगर चुकि नेपाल की सीमेंट कंपनियों के लिए यह कच्चा माल जरूरी है, इसलिए इसकी डंपिंग यहां कई सालों से की जा रही है. पहले कम क्लिंकर जाता था, अब यह बढ़कर 70 रैक प्रतिदिन हो गया, जिससे लोगों की परेशानी बढ़ गयी. इन परेशानियों से आजिज आकर शहर के आमलोगों ने तय किया कि वे रक्सौल से इस क्लिंकर को हटाकर दम लेंगे. उनका कहना था कि अगर इस क्लिंकर का काम नेपाल को है तो इसकी डंपिंग वहां करायी जाये.

इसके विरोध में 11 दिसंबर से आंदोलन शुरू हुआ. जनजागरण शुरू हुआ और चरणबद्ध तरीक से आंदोलन भी. लोगों ने तय किया कि वे 25 दिसंबर को विरोध में चक्का जाम करेंगे. इस बीच रेलवे ने किसी अन्य ग्रामीण इलाके में डंपिंग यार्ड बनाने की कोशिश शुरू की तो वहां के लोगों ने भी इसका विरोध शुरू कर दिया. थक हार कर रेलवे ने 22 दिसंबर के बाद रक्सौल के लिए क्लिंकर की बुकिंग बंद कर दी. नेपाल सरकार से कहा गया कि वे अपनी सीमा में वीरगंज डंपिंग यार्ड में क्लिंकर उतरवाये. वहां से स्वीकृति मिलते ही क्लिंकर की डंपिंग वहां शुरू हो जायेगी.

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2 Thoughts to “जानिये, रक्सौलवासियों ने कैसे लड़कर बचाया अपने शहर का पर्यावरण?”

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