रसगुल्ला और सिंघाड़ा- लेखक सच्चिदानंद सिंह की स्वाद यात्रा

नये साल की शुरुआत हम स्वाद यात्रा से कर रहे हैं. वैसे तो समोसा और रसगुल्ला दोनों में से किसी का संबंध बिहार से नहीं है. मगर बिहारियों को दोनों बहुत पसंद आता है. वह समोसा को सिंघाड़ा बनाकर खाता है और रसगुल्ला को दशमलव प्रणाली से, यानी एक बार में कम से कम दस. इस सिंघाड़ा और रसगुल्ला की स्वाद यात्रा कथाकार सच्चिदानंद सिंह ने लिखी है. वे अपने बचपन में भागलपुर के उस बहंगी वाले से इस यात्रा की शुरुआत करते हैं, जो घूम-घूमकर समोसा-रसगुल्ला बेचता था. फिर अलग-अलग शहरों में बिकने वाले इन दो खाद्य पदार्थों को यात्रा करते हुए 2017 तक पहुंचते हैं. उनकी किस्सागोई लाजवाब है, इसका परिचय हमलोग उनकी आने वाली किताब ब्रह्मभोज से समझ सकते हैं. फिलहाल इस स्वाद यात्रा का आनंद लीजिये…

सच्चिदानंद सिंह

सच्चिदानंद सिंह

मेरे लड़कपन में, साठ की दशक के शुरुआती वर्षों में, भागलपुर के रिहायशी मोहल्लों में प्रतिदिन सांझ ढलने के पहले रसगुल्ले-समोसे वाले घूमते रहते थे. बहँगी की एक तरफ रसगुल्लों की डेगची और दूसरी तरफ समोसे से भरी एक टोकरी लटका कर, जोर जोर से ‘रसगुल्ला सिंघाड़ा’ बोलते हुए वे मुहल्लों में आते थे. भागलपुर में उनदिनों समोसा सुनने को भी नहीं मिलता था, बस सिंघाड़ा; आज भी अधिकतर भागलपुरिये सिंघाड़ा ही कहते सुने जाते हैं.

चार आनों में एक रसगुल्ला और एक सिंघाड़ा मिलता था. रसगुल्ला सिंघाड़ा बंगालियों का प्रिय संध्या-जलपान था, और बंगाली उनदिनों भागलपुर में भरे पड़े थे. हमारे घर की एक तरफ तो श्याम सुंदर विद्यालय था, बाकी तीन दिशाओं में बंगालियों के बंगले थे – पश्चिम में सरकार बाड़ी, पूर्व में डे बाड़ी और दक्षिण के घर का नाम तो याद नहीं है पर यह याद है कि उसमें मैना नामकी एक बंगाली लड़की रहती थी.

हमलोग भागलपुर में नए थे. बाबूजी मार्च 1960 में हमें भागलपुर लाये थे. शाम होते ही रसगुल्ले-सिंघाड़ा खाने की हमारी कोई परंपरा नहीं थी. पर सीखने में मुझे देर नहीं लगी. भागलपुर में रसगुल्लों की अच्छी दुकानें भी थीं पर  हमलोग उन्हें नहीं गुनते थे. दोपहर से सभी लड़के लड़कियाँ बहँगी वाले का बाट निहारती रहती थीं.

मैं उनदिनों सिंघाड़े को घोर उपेक्षा की दृष्टि से देखता था और जिस दिन चार आने मिल जाएं उस दिन दो रसगुल्ले खा लेता था. मेरे अधिकतर साथी एक रसगुल्ला और एक सिंघाड़ा लेते थे. दो रसगुल्लों से उनकी भूख नहीं मिटती थी. यह समस्या मुझे नहीं थी. कुछ भी खा लेने पर मेरी भूख नहीं मिटती थी और जब क्षुधित ही रहना नियति हो तो रसगुल्ले खाकर क्षुधित रहना मुझे श्रेष्ठतर विकल्प लगता था.

सिंघाड़े या समोसे से मेरी विरक्ति करीब बारह वर्षों तक चली. इस बीच रसगुल्ले से प्रेम बढ़ता गया. मारवाड़ियों के घर जीमने के क्रम में रसगुल्ले का एक महाप्रतापी रूप राजभोग भी देखने को मिल गया था. मारवाड़ी भोजन का शुभारंभ राजभोग से होता था, शायद अभी भी होता हो.  इस मामले में बंगाली भोजन की अपेक्षा इसकी श्रेष्ठता स्वयं स्पष्ट है. गट्टे का साग कम पसंद था किंतु सात आठ राजभोग भोग लेने के बाद वह मुझे हमेशा अनावश्यक लगता था.

1971-72 के सत्र में मदिरा का आस्वादन कर लेने के बाद मेरी रुचि रसगुल्ले से हट कर सिंघाड़े की तरफ आ गयी. और 1981 में तीता पानी त्यागने के बाद में पुनः रसगुल्ले की ओर मुड़ा. उनदिनों भी मैं भागलपुर में कार्यरत था और एक सहयोगी मिले थे सहाय जी जो खुद रसगुल्ले से विशेष प्रेम रखते थे. सहाय जी दशमलव पद्धिति के महाप्रवर्तक थे और एक बार में दस रसगुल्लों से कम का आर्डर नहीं करते थे.

सहाय जी के साथ जब भी मैं आदर्श जलपान गृह,  मिठाइयों की एक उत्तम दुकान, गया, उनका आर्डर रहता था, दो जगह दस-दस रसगुल्ले लाइये. दस खाने के बाद, चाय पीने के पहले हम एक प्लेट सिंघाड़ा मंगा कर शेयर करते थे. सिंघाड़ों के बाद सहाय जी फिर रटते थे, सर दस दस और हो जाये. एकाध ही बार इस आंकॉर में मैं साथ दे पाया था.

नब्बे आते आते डॉक्टरों ने मुझे सीमावर्ती मधुमेही यानी बॉर्डरलाइन डायबिटिक करार कर देने की धमकी देनी शुरू कर दी. एक बार फिर मैं समोसों की ओर मुखातिब हुआ. पर समोसों के खराब ग्रह चल रहे थे. मैं पटने था और मेरे घर के निकट गोसाईं टोला का घोष स्वीट्स पटने में शायद सबसे अच्छे रसगुल्ले बनाता था. (न्यू पिंटू बंद होने के कगार पर था.)

सांकेतिक तसवीर

पटना के बाद मैं कलकत्ते चला गया. कलकत्ते में रसगुल्ले छोड़ना कठिन तो है ही, मेरी समझ से यह घोर पातक भी है. स्वभाव से मैं सात्विक हूँ और ऐसे पापकर्मों से बचता रहा; छुट कर रसगुल्ले, गुड़ के रसगुल्ले और खजूर के गुड़ के रसगुल्ले दाबा.

कलकत्ते के बाद ओडिशा का राजगांगपुर. रसगुल्ले स्वतः छूट गए. अच्छे रसगुल्ले सब जगह नहीं मिलते. अच्छे समोसे प्रायः सर्वत्र उपलब्ध हो जाते हैं. राजगांगपुर इस नियम को सिद्ध करने वाला अपवाद था. वहाँ न रसगुल्ले मिले न समोसे. उसके बाद मुंबई, जहाँ सबकुछ मिलता है यदि आप सही जगह जानें, पर महाराष्ट्र वासी अधिक तीखा खाते हैं और मुम्बई के समोसे मुझे नहीं रुचे.

वहीं दिल्ली के समोसे मुझे अच्छे लगते हैं, कम तीखे होते हैं. मारवाड़ी समोसों में मैंने पाया है, उबले आलू को भरने के पहले प्रचुर मसालों के साथ भून दिया जाता है. मुझे वह आलू और खाने वाले, दोनो के ऊपर अत्याचार प्रतीत होता है.

विद्यार्थी काल में खाये, दिल्ली के ग्वायर हॉल के पंडित के समोसे अविस्मरणीय हैं. आधे उबले आलू के छोटे क्यूब को चुटकी भर नमक और चाट मसाला, पर्याप्त हरे मटर और ढेर सारे कटे धनिया पत्तों के साथ पंडित प्रेम से भरता था और में उतने ही प्रेम से उनका सेवन करता था.

फिर वैसे ही छोटे छोटे समोसे मुझे भुवनेश्वर में खाने को मिले थे. महीने में एकाध रात हम बस समोसे खाते थे.

समोसे किस चीज के साथ खाए जाएं? बहुत लोग उसके साथ हलवाई की दी हुई चटनी पसंद करते हैं, युवा वर्ग अक्सर टमाटर का सॉस खोजता है. मैं नहीं, मुझे समोसों के साथ बस ताजे कटे प्याज के टुकड़े चाहिए.

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