क्यों बिहार के इस कस्बे को पहली के बदले दूसरी जनवरी का इंतजार रहता है?

बिहार कवरेज

दिसंबर का महीना आते ही जहां पूरी दुनिया में नए साल का इंतजार शुरू हो जाता है, परंतु इसी धरती का एक ऐसा हिस्सा भी है, जहां लोग एक के बजाय दो जनवरी का इंतजार करते हैं. जैसे-जैसे यह दिन नजदीक आता है, हर चौक-चौराहे, बाजार, खेत-खलिहान, दुकान-दफ्तर पर एक ही चर्चा होती है, इस बार क्या होने वाला है. यह इलाका है औरंगाबाद जिले का हसपुरा प्रखंड.

दरअसल, दो जनवरी को हसपुरा में हर साल रामरूप मेहता महोत्सव का आयोजन होता है. यह आयोजन एक स्थानीय जननायक रामरूप मेहता की याद में होता है. उनके निधन के 37 साल बाद भी उनके नाम का ऐसा क्रेज है कि लोग खुद बखुद उस रोज आयोजन स्थल की तरह चले आते हैं. न सिर्फ उस गांव के बल्कि आस-पास के कई गांवों के लोगों के लिये यह एक यादगार मौका होता है. इस मौके पर फुटबाल मैच होता है और अच्छा काम करने वालों को पुरस्कृत किया जाता है.

यह समारोह पिछले 37 वर्षों से हो रहा है और अब यह वहां की लोक परंपरा का हिस्सा बन चुका है. रामरूप मेहता महोत्सव को हसपुरा और आसपास के इलाके में भीड़ के हिसाब से स्थानीय कुंभ का दर्जा हासिल है. इस समारोह में न सिर्फ हसपुरा प्रखंड, बल्कि गोह, कलेर, दाउदनगर, अरवल, ओबरा आदि प्रखंड के लोग भी बहुत बड़ी संख्या में शामिल होते हैं. इलाके के तमाम जागरूक लोग उस श्रद्धांजलि समारोह में शामिल होना अपना फर्ज समझते हैं. नई पीढ़ी अपनी पिछली पीढ़ी से समारोह में शामिल होने और इसे निबाहने की परंपरा ग्रहण कर रही है.

रामरूप मेहता अपने इलाके के सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रतिष्ठित नेता थे. इलाके के सभी समुदायों में उनकी गहरी पैठ थी. जनता उन पर जान छिड़कती थी. रामरूप मेहता हर गलत काम का विरोध करते थे, चाहे उसे करने वाला जो भी रहे. ऐसे में कुछ धूर्त नेताओं ने उनके खिलाफ साजिश रचना शुरू कर दिया. उनके घर में आग लगवाई गई तो कभी डकैती करवाई गई. परंतु, रामरूप मेहता हर मुसीबत के बाद और भी मजबूत और लोकप्रिय होते चले गए. अंत में विरोधियों ने उनकी हत्या की साजिश रची. एक हत्यारे गिरोह के माध्यम से उनके गांव बिरहारा में 16 मार्च 1980 की सुबह उनकी हत्या करवा दी. अपने प्रिय नेता की हत्या की खबर सुनते ही लोगों की आंखों में खून उतर आया. लोग हत्या कर भाग रहे हत्यारो पर टूट पड़े. निहत्थे ही लोगों ने पांच सशस्त्र हत्यारों को उसी समय पीट-पीटकर मार डाला.

दो जनवरी को हसपुरा में हर साल होने वाला फुटबॉल मैच

उनके करीबी साथी रहे जदयू नेता राजेंद्र सिंह जॉर्ज बताते हैं कि रामरूप मेहता की हत्या के बाद उनके साथी और पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की प्रेरणा से उनके साथियों और शिष्यों ने उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखने की योजना बनाई. रामरूप मेहता के जन्मदिवस दो जनवरी पर समारोह करने का फैसला किया और 1981 से प्रत्येक दो जनवरी को यह समारोह आयोजित किया जा रहा है. उस दिन एक फुटबॉल मैच कराने का निर्णय भी लिया गया था, जो अब तक जारी है. पूरे इलाके के लोग अपने प्रिय नेता को श्रद्धांजलि देने उमड़ते हैं.

जॉर्ज याद करते हैं कि 1977 में पूर्व मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिन्हा रामरूप मेहता की लोकप्रियता सुनकर उनसे मिलने खुद हसपुरा पहुंचे थे और कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने का आग्रह किया था, लेकिन रामरूप मेहता ने समाजवादी राजनीति के प्रति प्रतिबद्धता के कारण टिकट विनम्रता पूर्वक ठुकरा दिया. यहां तक कि उनकी अपनी पार्टी ने भी जब टिकट ऑफर किया तो उन्होंने सदन के बजाय समाज में काम करने को प्राथमिकता दी.

इस समारोह की नकल करने का भी प्रयास होता रहा है. इस गलतफहमी में कि यह जनसैलाब फुटबॉल मैच के कारण उमड़ता है. कई बार दो जनवरी के पहले या बाद में फुटबॉल मैच का आयोजन किया गया. दूसरे राज्यों से भी नामचीन फुटबॉल टीमें बुलवाई गर्इं. परंतु, रामरूप मेहता महोत्सव के 10वें हिस्से के बराबर भी लोग जमा नहीं हो सके. दो जनवरी को भीड़ का आलम यह होता है कि आयोजन स्थल क्रीड़ा स्थल हसपुरा के अतिरिक्त उसकी बाउंड्री पर, पेड़ों पर, अगल-बगल के घरों की छतों पर, गाड़ियों की छतों पर, सड़क पर यानी जहां तक निगाह जा सकती है, वहां तक लोग भरे होते हैं. इसके बावजूद हजारों लोग कहीं जगह नहीं मिल पाने के कारण मायूस लौट जाते हैं.

रामरूप मेहता औरंगाबाद जिले में समाजवादी आंदोलन और राजनीति के सबसे नामचीन योद्धा थे. हालांकि, उनका सामाजिक और सार्वजनिक जीवन काफी पहले से ही शुरू हो चुका था. उनके पुत्र सर्वोदय मेहता बताते हैं कि जब वे हसपुरा हाई स्कूल मे छात्र थे, तभी वहां विनोबा भावे अपने भूदान आंदोलन के सिलसिले में आए  थे. रामरूप मेहता उनसे प्रभावित हुए और अपने पिता रामप्रसन्न मेहता से आज्ञा लेकर विनोबा के साथ चल पड़े. उसी आंदोलन में उनकी भेंट लोकनायक जयप्रकाश नारायण से हुई. जब लोकनायक ने सर्वोदय आंदोलन शुरू किया तो रामरूप मेहता अग्रणी कार्यकर्ता के रूप में सामने आए. लंबे समय तक सर्वोदय आश्रम से लेकर ग्राम निर्माण मंडल तक से जुड़े रहे. उसी दौरान वे प्रखर समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया के संपर्क में आए और उनकी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ गए.

शहीद रामरूप मेहता की अंतिम तसवीर

उन्होंने औरंगाबाद में समाजवादी कार्यकर्ताओं की लंबी कतार खड़ी कर दी और समाजवादी आंदोलन का झंडा ऊंचा करने में दिन-रात जुट गए. पार्टी के दाम बांधो, भूमि सुधार आंदोलन का बखूबी नेतृत्व किया. इस दौरान तब के सभी बड़े समाजवादी नेताओं मधु लिमये, कर्पूरी ठाकुर, रामानंद तिवारी आदि के साथ उनके संबंध गहरे होते चले गए. आपातकाल के दौर में वे लंबे समय तक भूमिगत रहकर जेपी आंदोलन को संचालित करते रहे. उनके साथी बाबूचंद पासवान बताते हैं कि रामरूप मेहता ने अपने इलाके में सैंकड़ों भूमिहीनों को जमीन दिलवाई. कई स्कूल खुलवाए. सवर्णों और दलितों-पिछड़ों की खाई को पाटने में सक्रिय रहे. आपसी झगड़ों को सामाजिक तरीके से सुलझाया. बाढ़ हो या आगजनी, प्रशासन को सूचना पहुंचने तक रामरूप मेहता घटनास्थल पर अपने साथियों के साथ राहत सामग्री लेकर पहुंच जाते थे.

दो जनवरी 1936 को जन्मे रामरूप मेहता इलाके के गरीबों, दलितों, वंचितों का मसीहा बनते चले गए. इलाके के हर व्यक्ति और परिवार के सुख-दुख के साथ जुड़ गए. स्थानीय शिक्षाविद सर्वेश सिंह बताते हैं कि शिक्षा से रामरूप मेहता जितना लगाव किसी बिरले नेता को ही होगा. दुनिया के तमाम साहित्य, दर्शन और धर्मों का उन्होंने गहरा अध्ययन किया था. सर्वेश कहते हैं कि उनके जैसा निर्भीक व्यक्ति लाखों में एक होता है. उन्हें कभी किसी ने न तो भयभीत देखा और न ही गलत के समझौता करते. वे किसी भी सच को कहने का साहस रखते थे.

रामरूप मेहता के सहयोगी हरेश कुमार बताते हैं कि 1977 में संसोपा के विलय के बाद वे लोकदल के साथ जुड़ गए और अंतिम सांस तक उसी के साथ समाजवादी लक्ष्यों को पूरा करने में जुटे रहे. पूर्व प्रमुख और उनके साथी आरिफ रिजवी बताते हैं कि रामरूप मेहता की राजनीति से आज के नेताओं को सीख लेनी चाहिए. उन्होंने कहा कि वैचारिक मतभेद के बावजूद उनका तमाम दलों के कार्यकर्ताओं के साथ गहरा रिश्ता और अपनत्व था. चाहे वामपंथी विधायक रामशरण यादव हों या दूसरे कांग्रेसी नेता. अपने दल के तो वे मुख्य आधार ही थे.

शोषित समाज दल के अध्यक्ष जयराम प्रसाद ने एक बार कहा था कि एक बार वे रामरूप मेहता के क्षेत्र से ही विधानसभा का चुनाव लड़ रहे थे. यह तय था कि वे जिस उम्मीदवार का समर्थन करते, उसकी जीत निर्विवाद थी. रामरूप मेहता ने उनके बजाय समाजवादी आंदोलन और आदर्श राजनीति की प्रतिबद्धता के कारण अपने दल के उम्मीदवार रामविलास यादव का समर्थन किया. हालांकि तब उनका शोषित समाज दल के संस्थापक बिहार लेनिन जगदेव प्रसाद के साथ बहुत ही गहरा रिश्ता था. ऐसा कि जगदेव प्रसाद उस इलाके में रहते तो अपने किसी कार्यकर्ता के बजाय रामरूप मेहता के यहां ठहरते थे.

रामरूप मेहता समारोह

रालोसपा के औरंगाबाद जिला अध्यक्ष राजीव कुमार उर्फ बबलू कहते हैं कि जब भी आदर्श समाज और राजनीति की बात होगी, रामरूप मेहता से प्रेरणा लेने की जरूरत पड़ेगी. उन्हें कभी भूला नहीं जा सकता. वे पूरे इलाके में सबके दिलों में राज करते हैं. पूर्व मुखिया विजय कुमार अकेला कहते हैं कि आज रामरूप मेहता क्या होते, यह सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है, लेकिन इतना तय है कि अगर वे होते तो राजनीति का स्तर इतना नीचा नहीं होता और गरीब व वंचित तबका इतना असहाय नहीं होता.

आयोजन समिति के अभय कुमार व मंणिकांत पांडेय ने कहा कि रामरूप मेहता के नाम पर चार सम्मान दिये जा रहे हैं. कला, साहित्य, खेल और पत्रकारिता के क्षेत्र में बिहार में चार उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों को ये सम्मान दिये जाते हैं. इसके लिए पात्रों का चयन एक स्वतंत्र समिति करती है. इस बार चयन समिति में पत्रकार निराला व पुष्यमित्र, कार्टूनिस्ट पवन और रंगकर्मी अनीश अंकुर हैं. आयोजन समिति के अरविंद कुमार वर्मा उर्फ छोटू ने कहा कि वे लोग तैयारियों में दिन-रात लगे हुए हैं. उन्होंने कहा कि 38वां आयोजन होने जा रहा है. आज तक कोई दिक्कत नहीं हुई. लोग खुद ही सहयोग करते हैं. आर्थिक रूप से भी और शांति व्यवस्था के लिए भी. यह पूरी तरह से आम जनता का समारोह है. यही वजह है कि करीब 50 हजार की भीड़ होने के बावजूद कोई सुरक्षा व्यवस्था नहीं रहने पर भी आज तक कभी किसी तरह की दिक्कत नहीं हुई.

शोषित समाज दल के राष्ट्रीय महामंत्री रघुनीराम शास्त्री बताते हैं कि रामरूप मेहता के दिल में किसी तरह का भेदभाव नहीं था. प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. रामजतन सिंह कहते हैं कि रामरूप मेहता गांधी और जेपी के परंपरा के राही थे. वे किसी पद पर कभी नहीं रहे, लेकिन गांधी और जेपी की तरह उनका कद किसी भी पद से बड़ा था.

समारोह में अब तक मुख्यमंत्री और मंत्री से लेकर सांसद और विधायक तक शिरकत कर चुके हैं. रामरूप मेहता महोत्सव में मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर, शिक्षा मंत्री रामराज सिंह, कृषि एवं बागवानी मंत्री छेदी पासवान, कारा मंत्री रामविलास पासवान, ग्रामीण विकास मंत्री भगवान सिंह कुशवाहा, वाणिज्य मंत्री ददन पहलवान, सांसद सुशील कुमार सिंह, सांसद महाबली सिंह, विधायक रामशरण यादव, विधायक डीके शर्मा, विधायक राजाराम सिंह, विधायक रणविजय कुमार, विधायक रवींद्र कुमार, विधायक सोमप्रकाश, विधायक चितरंजन कुमार, विधायक सत्यदेव सिंह, विधायक सुरेश मेहता, प्रसिद्ध फिल्म निर्माता निर्देशक अशोकचंद जैन, अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष योगेंद्र पासवान, विधान पार्षद सीपी सिन्हा आदि सहित दर्जनों गणमान्य हस्तियां अतिथि के रूप में पधार चुकी हैं.

 

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