‘राजकमल का मूल्यांकन करने में नयी कहानी के आलोचक चूक गये थे’

नाटक मलाह टोली का एक दृश्य

बिहार कवरेज

जिस तरह ‘आग’, ‘मेरा नाम जोकर’ और ‘तीसरी कसम’ की पीढ़ी इन फिल्मों का सही मूल्यांकन करने से चूक गई, किन्तु बाद की पीढ़ी ने इन फिल्मों को होथों हाथ लिया उसी प्रकार नयी कहानी के आलोचक राजकमल का मूल्यांकन करने में चूक गए. यही वजह है कि नयी कहानी के सभी प्रमुख आलोचकों ने उन्हें ‘अन्यान्य’ खाते में डाल दिया. जब आचार्य शुक्ल ने अपने इतिहास में विद्यापति को ‘फुटकल’ खाते में डाल दिया तो इस हिंदी आलोचना परम्परा में राजकमल की क्या बकत? जैसे-जैसे जीवन-जगत अधिक से अधिक जटिल होता जाएगा, अर्थ और सेक्स के आपसी रिश्ते के पाट खुलते जाएंगे राजकमल की सार्थकता बढ़ती जाएगी और वे हमारे लिए और अधिक महत्वपूर्ण होते चले जाएंगे. इसी महता का परिचायक उनकी जयंती पर एक ही दिन में दिल्ली में दो-दो कार्यक्रम का होना है.

संगीत नाटक अकादमी और मैथिल-भोजपुरी अकादमी के सौजन्य से हिंदी रंगभूमि द्वारा दिल्ली में आयोजित राजकमल जयंती कार्यक्रम उनके साहित्य के पुनरवलोकन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा. ‘नया ज्ञानोदय’ के संपादक लीलाधर मंडलोई की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित ‘राजकमल चौधरी रचनावली’ के सम्पादक प्रो. देवशंकर नवीन, राजकमल के पुत्र नील माधव चौधरी नाट्य-निर्देशक सुमन कुमार, राजकमल विषयक शोधार्थी कंचन कुमारी एवं कमलानन्द झा ने राजकमल साहित्य पर गहन विचार-विमर्श किया.

मंचासीन अतिथि

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए लीलाधर मंडलोई ने कहा की राजकमल अपने समय के सबसे मौजू और जरुरी लेखक थे. उन्होंने समाज के सर्वथा उपेक्षित तबकों पर कथा के माध्यम से विचार-विमर्श किया. आज विचार ख़त्म हो गया और विमर्श रह गया है. प्रो देवशंकर नवीन ने रचनावली के संपादन में आने वाली समस्याओं को रेखांकित किया और कहा कि राजकमल को सायास हाशिये पर डाला गया क्योंकि राजकमल ने समाज में कम्बल के नीचे छिपी नैतिकता को देखा ही नहीं बल्कि उसके बारे में मुखर होकर लिख भी दिया.

कमलानन्द झा ने कहा कि राजकमल ऐसे तबके की बात कह रहे थे जिसकी नैतिकता के मानदंड अलग थे. उनकी कहानियों और उपन्यासों में अर्थ और सेक्स के आपसी रिश्ते को समझने की जरुरत है. नाट्य निर्देशक सुमन कुमार ने उन्हें विलक्षण कवि कहते हुए उनकी रचनाओं में नाट्य तत्व की सहज उपलब्धता को रेखांकित किया. नीलमाधव चौधरी ने राजकमल के पारिवारिक स्थितियों से श्रोताओं को रूबरू कराया. शोधार्थी कंचन ने राजकमल की मैथिली कहानियों की सार्थकता और अर्थवत्ता पर प्रकाश डाला. कर्यक्रम का सफल संचालान युवा कवि अरुणाभ सौरभ ने किया.

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण था राजकमल की प्रसिद्ध मैथिली कहानी ‘मलाहटोल : एक चित्र’ के हिंदी रूपान्तरण का मंचन. नीलेश दीपक के निर्देशन में मंचित इस नाटक में राजकमल के कथा-विन्यास तथा स्त्री के प्रति उनकी अथाह संवेदनशीलता को विलक्षण ढंग से प्रस्तुत किया गया. नाटक मछुआरे जीवन की विसंगतियों को पकड़ने में सफल रहा. इस नाटक में दलित समाज की अभावग्रस्तता और सवर्ण सामज के शोषण-तंत्र को विश्वसनीय तरीके से पेश किया गया. नाटक की कथात्मकता की खाशियत यह थी कि वह चरित्रों के प्रति जजमेंटल नहीं होता है. कोई पात्र समय विशेष में खलनायक प्रतीत हो सकता है लेकिन किसी खास अवसर पर उसकी अथाह संवेदनशीलता चकित कर जाती है.

नाटक मलाह टोली का एक दृश्य

नाटक में लगभग सभी पात्रों ने सशक्त अभिनय क्षमता का परिचय दिया. नाटक में आकर्षक मंच विन्यास ने दर्शकों का मन मोह लिया . मछली जाल का अत्यंत सर्जनात्मक उपयोग निर्देशक ने किया. इस जाल ने परिवेश निर्माण में सार्थक भूमिका अदा की. दिल्ली जैसे महानगर में ग्रामीण परिवेश और देहाती भावभूमि का नाट्य मंचन एक बड़ी चुनौती रही है किन्तु हिंदी रंगभूमि के रंगकर्मियों ने इस चुनौती को साहस के साथ स्वीकार ही नहीं किया बल्कि सफलतापूर्वक इसका निर्वाह भी किया. मछुआ टोल को प्रत्यक्ष करता मंच सज्जा, वेश-भूषा और भदेश संवाद अदायगी ने नाटक को यथार्थ के करीब ला दिया.

जटिल कथाविन्यास को नाट्याभिव्यक्ति के मध्यम से सरल बनाकर प्रस्तुत किया गया. किसी रचना या रचनाकार पर लम्बी-लम्बी बातें करना तो बुद्धिजीवियों का शौक होता है लेकिन योजना-बद्ध तरीके से कार्यक्रम करना विशेषकर नाटक करना अत्यंत कठिन और साहसपूर्ण कार्य है. निश्चित रूप से यह साहस नीलेश दीपक और उनके सहयोगियों ने मिलकर दिखाया है, हिंदी रंगभूमि के सभी सदस्यों को साधुवाद और बधाई.

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