टिकुली आर्ट से सजेगा राजेंद्र नगर टर्मिनल, आइये जानते हैं इस खूबसूरत चित्रकला की कहानी

आज दैनिक भास्कर अखबार के पन्ने पर यह खबर दिखी कि राजेंद्र नगर स्टेशन को टिकुली आर्ट से सजाया जायेगा. मधुबनी स्टेशन से शुरू हुई अपने स्टेशनों को स्थानीय चित्रकला से सजाने की परंपरा का यह विस्तार सुखद है. टिकुली कला का जन्म पटना के आसपास के इलाके में ही हुआ है, लिहाजा इसका राजेंद्र नगर स्टेशन की दीवारों पर उतरना न सिर्फ स्टेशन को खूबसूरत बनायेगा, बल्कि इसे एक स्थानीय पहचान भी देगा. मगर क्या आप टिकुली चित्रकला और इसकी खूबियों के बारे में जानते हैं? अगर नहीं तो यह परिचयात्मक आलेख आपके लिए है. जिसे हमने क्राफ्टवाला के फेसबुक वाल से लिया है, जिनके सक्रिय हस्तक्षेप से मधुबनी स्टेशन पर मिथिला चित्रकला को उकेरा गया था.

क्राफ्टवाला

टिकुली कला बिहार की एक अनोखी कला है, जिसका एक बहुत समृद्ध और गहरा पारंपरिक इतिहास है. ‘टिकुली’ शब्द ‘बिंदी’ का स्थानीय शब्द है, जिसे महिलाएं अपने माथे पर लगाती हैं. यह बिंदी भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है.

इतिहास

टिकुली कला की शुरुआत आज से 800 साल पहले पटना में बतायी जाती है. ये खूबसूरत चित्र शहर के स्थानीय इलाकों में बनते थे. पटना उस समय व्यापार का समृद्ध केंद्र था, अपनी विशिष्ट सुंदरता के कारण टिकुली कला पूरे देश के व्यापारियों को पटना की तरफ खींचने में कामयाब हुई. मुगलों की इस कला में दिलचस्पी थी, लिहाजा इसे राजकीय संरक्षण मिला और इसके प्रचार में सहायता मिली. यह बिहार की एक दुर्लभ कला है, चूंकि यह बहुत ही जटिल और विस्तृत है, इसलिए इसे बनाने में विशेष कौशल की आवश्यकता होती है.

मुगल साम्राज्य का पतन और ब्रिटिश राज के आगमन से टिकुली कला को गंभीर झटका लगा. ब्रिटिश सरकार ने औद्योगिकीकरण की शुरुआत की, जिसमें कई स्वदेशी सामान मशीन द्वारा बनाये जाने लगे. टिकुली भी इसमे से एक थी. इससे हजारों टिकुली कलाकार बेरोजगार हो गये. मशीन निर्मित बिंदीयाँ बाजार में आईं और बिंदियों के बाजार से टिकुली कला खो गई.

पुनरुत्थान

इस कला के पुनरुत्थान के लिए दो कलाकारों के योगदान को नही भुलाया जा सकता. प्रथम नाम चित्राचार्य पद्मश्री उपेंद्र महारथी का है जिन्होंने इस मरणशील कला रूप को पुनर्जीवित करने की पहल की. जापान में अपने प्रवास के दौरान इन्हें हार्डबोर्ड पर टिकुली कला को चित्रित करने का विचार मिला, जिससे इसे पारंपरिक शैली में बनाकर इसे वाणिज्यिक स्वरूप दिया जा सके.

दूसरे कलाकार, शिल्पकार और चित्रकार श्री अशोक कुमार बिस्वास थे जिन्होंने ने टिकुली कला को एक नए स्तर दिया. उन्होंने अपनी पत्नी शिबानी विश्वास के साथ इस कला को न केवल पुनर्जीवित किया बल्कि इसे आजीविका के स्रोत के रूप में भी विकसित किया. टिकुली कला अब बिहार में महिलाओं के लिए एक आर्थिक स्रोत के रूप में कार्य कर रही है.

निर्माण

टिकुली कला बनाना एक नाजुक और थकाऊ प्रक्रिया है. इसे सरल बनाने के लिए, मैंने इसे तीन चरणों में विभाजित किया है: टिकुली कलाकार पेंटिंग बनाने के लिए हार्डबोर्ड का उपयोग करते हैं. हार्डबोर्ड को विभिन्न आकारों में काट दिया जाता है जैसे चौकोर, आयताकार, त्रिकोणीय, या वर्ग. चार-पांच कोट एनेमल कोट के बाद लकड़ी को सैंडपेपर से घिसा जाता है, जिससे यह एक पॉलिश सतह देता है. ताएनेमल के अंतिम कोट के बाद डिजाइन रंग से बनता है यह स्वर्ण रंग के साथ सुशोभित होता है .

टिक्की और मधुबनी कला का सुंदर संयोजन

टिकुली कला अपने चित्रों में मधुबनी रूपांकनों का उपयोग करती है. यह कला की मिसाल है. वसंत और गर्मियों के मौसम इस कला को बनाने के लिए सबसे उपयुक्त हैं क्योंकि एनेमल पेंट के उपयोग के कारण शिल्प को कमरे के तापमान पर शुष्क हवा की आवश्यकता होती है. गिलहरी या सैबल के बाल ब्रश बनाने के लिए उपयोग किया जाता है और आकार सीमा 0.0-20 से भिन्न होती है.

विषय या थीम

एक उत्पाद के रूप में टिकुली कला को सांस्कृतिक महत्व के उत्पाद के रूप में निर्यात हेतु अधिक लोकप्रिय माना जाता है. उत्पादों का उद्देश्य शेष दुनिया में भारतीय संस्कृति को प्रदर्शित करना है. इस कला के ज्यादातर विषय बिहार के त्योहार, भारतीय शादी के दृश्य और कृष्ण लीला के आसपास घूमते हैं.

(क्राफ्टवाला के फेसबुक वाल से)

Spread the love
  • 137
    Shares

Related posts