रघुनाथ झा तरह-तरह के लोगों को फोन किया करते थे, हम उनके हाव-भाव पढ़ा करते थे

एक जमाने में बिहार की राजनीति की धुरी रहे रघुनाथ झा का आज निधन हो गया है. कभी उनके करीबी रहे पत्रकार हरेश कुमार टुकड़ों में उनके बारे में कई दिलचस्प जानकारियां दे रहे हैं. आप भी पढ़ें.

हरेश कुमार

हरेश कुमार

शिवहर विधानसभा क्षेत्र से लगातार 27 साल विधायक. गोपालगंज और बेतिया से 10 साल सांसद रहे रघुनाथ झा का दिल्ली के राममनोहर मनोहर लोहिया अस्पताल में निधन.
अंबा ओझा टोला के रहने वाले रघुनाथ झा ने मुखिया (ग्राम प्रधान)से राजनीतिक यात्रा शुरू की थी.
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रघुनाथ झा की शुरुआत ग्राम प्रधान के तौर पर हुई थी. आगे चलकर ठाकुर नवाब सिंह के परिवार के प्रभाकर सिंह, दिग्विजय सिंह और अन्य को विधानसभा चुनाव में हराया. बता दें कि वे ठाकुर नवाब सिंह के लठैतों में से एक थे और राजनीति की शुरुआत ही उसी परिवार के खिलाफ शुरू हुई. मध्यावधि चुनाव में ठाकुर रत्नाकर सिंह से वो लगभग 2500 वोटों से हार गए.
हुआ यूं कि एक दिन चुनाव प्रचार करते शिवहर बाजार में रघुनाथ झा और रत्नाकर सिंह की गाड़ी आमने-सामने हो गई. रत्नाकर सिंह अपनी गाड़ी से उतरे और झट से रघुनाथ झा का चरण स्पर्श कर उनसे विजयी होने का आशीर्वाद मांगा और रघुनाथ झा ने मार पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया. यह चुनाव रघुनाथ झा हार गए. यहां ठाकुर परिवार का पांचवां सदस्य चुनाव जीतने में कामयाब रहा.
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आरक्षण के कारण रघुनाथ झा मुख्यमंत्री नहीं बन सके थे. वे अपने आप में एक पार्टी थे. लगातार 27साल विधायक और दस साल सांसद रहे थे. कांग्रेस से शुरू हुआ सफर जनता पार्टी, जनता दल, समाजवादी पार्टी, समता पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल पर जाकर समाप्त हुआ.
राम सुंदर दास और लालू प्रसाद यादव के बीच बराबरी का टक्कर होने के बाद इन्होंने चंद्र शेखर और देवीलाल के कहने पर लालू प्रसाद यादव को अपने 19 विधायकों का समर्थन दे दिया. रघुनाथ झा एक दर्जन विभागों के मंत्री रहे थे.
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जगन्नाथ मिश्र के साथ मतभेदों के बाद इन्होंने कांग्रेस छोड़ दिया और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर में हुए चुनाव और राजीव गांधी की सभा के बावजूद शिवहर विधानसभा क्षेत्र से भारी बहुमत से चुनाव जीतकर दिखा दिया. इनके समर्थकों द्वारा राजीव गांधी की सभा में रघुनाथ नहीं तो हाथ नहीं के गगनभेदी नारे लगाए गए थे.
शिवहर से रघुनाथ झा सांसद नहीं बन सके. समाजवादी जनता दल के अध्यक्ष के तौर पर इन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ाने था, लेकिन लालू प्रसाद यादव ने हरि किशोर सिंह के पक्ष में जमकर हेराफेरी की. रघुनाथ झा के पक्ष में पड़े बैलेट बॉक्स को डुब्बा घाट बागमती नदी की धारा में फिंकवा दिया और इस तरह रघुनाथ झा जीतते-जीतते प्रशासनिक हेराफेरी की वजह से हार गए. अगला लोकसभा चुनाव गोपालगंज और बेतिया से जीता था.
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रघुनाथ झा

उनकी सबसे बड़ी खूबियों में से एक क्षेत्र के हर व्यक्ति को वो नाम और चेहरे से जानते थे.
मेरे पिताजी स्वर्गीय राज नारायण चौधरी एक महीने (17मई 1996 से 17जून 1996) तक पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के आपातकालीन वार्ड में रहे और रघुनाथ झा प्रतिदिन देर रात मिलने आते थे. दो दिन लालू प्रसाद यादव को भी लेकर आए थे.
बता दें कि पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के आपातकालीन वार्ड में तब मात्र 30 सीट ही था और बिहार और नेपाल से सारे मरीज आते थे, तब झारखंड भी बिहार का हिस्सा था. हालांकि, पिताजी को बचाया नहीं जा सका. डाक्टर श्रीवास्तव ने भरपूर कोशिश की थी. कई चिकित्सक इस बात को लेकर अंदर ही अंदर खार खाए थे कि आपातकालीन वार्ड में लगातार 30दिन भर्ती रखा गया था.
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कैसे लालू ने रघुनाथ झा से रांची वाला मकान, से लेकर कितने राज हमारे सीने में दफ़न हैं.
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शिवहर को जिला बनवाने में रघुनाथ झा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. लालू प्रसाद यादव के निकट सहयोगी और तब बेलसंड से विधायक रहे रघुवंश प्रसाद सिंह और रघुनाथ झा के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण शिवहर का क्षेत्रफल छोटा रह गया. रघुवंश प्रसाद सिंह चाहते थे कि बेलसंड जिला बने. अंत में बेलसंड को सीतामढ़ी जिला में अनुमंडल का दर्जा देकर शिवहर को जिला बनाया गया.
रघुनाथ झा के नाम से सीतामढ़ी में एक College है.
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पटना में रहते हुए जब कभी मन नहीं लगता था हम रघुनाथ झा के आवास पर चले जाते थे. गांव-जवार के लोगों से मुलाकात होने के साथ-साथ हर तरह के राजनीतिक रंग देखने को मिलता था. कैसे किसी अपराधी को जमानत दिलाना है. किसी को फंसाना है तो किसी दारोगा या एसपी को हड़काना है या किसी के घर का कोई सदस्य बीमार है और चिकित्सा मुहैया कराना है या किसी को पुलिस या रेल मंत्रालय में बहाली करना है. हम बैठे-बैठे सब देखते और फोन सुनते थे.
गांव-जवार के होने के कारण रघुनाथ झा से काफी लगाव था हम सभी को.
हमने अपने लिए कभी कुछ नहीं कहा. बराबर पूछते रहते थे, लेकिन हमने कभी कुछ नहीं कहा.
बस राजनीति और उसके बदलते रंगों को चुपचाप आराम से बैठे देखा करता था.
हमारे सामने रघुनाथ झा हर तरह के फोन किया करते थे और हम बैठे-बैठे चेहरे के भावों को पढ़ा करते थे.

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