‘बस पर बैठे लोगों को जरा भी अंदाजा नहीं था कि आगे क्या होने वाला है’

राजद के चक्का-जाम में फंसे गांव के गरीब-गुरबों की आपबीती और उनकी तकलीफों का वर्णन कर रहे हैं कवि-कथाकार मिथिलेश कुमार राय.

मिथिलेश कुमार राय

भीमपुर तक बस आराम से चलती रही. बस वाले ने बढ़िया सा गाना चला रखा था. सारे यात्री उसी में डूबे हुए थे. ऐसा नहीं लगता था कि किसी को पता था कि आगे जाकर यात्रा में परेशानी होगी. ऐसा होता तो लोग इसकी चर्चा कर रहे होते और उनके चेहरे पर परेशानी का भाव होता. लेकिन जब बस भीमपुर में जाकर खड़ी हो गयी और उसे जबरन रोक दिया गया तो लोगों की जैसे चेतना लौटी. बस की खिड़की से झांक कर देखने पर एनएच 57 पर गाड़ियों की एक लंबी सी क़तार नजर आ रही थी. एक बड़े से ट्रैक को सड़क पर आड़ी-तिरछी करके खड़ा कर दिया गया था. ड्राइवर और कंटक्टर ने उतर कर पता किया. बंद है. पूरे राज्य में चक्का जाम है. कहता है कि तीन बजे तक किसी भी गाड़ी को हिलने नहीं दिया जायेगा. सुन कर कइयों का दिल जैसे बैठ गया. वे उस मुहूर्त को कोसने लगे जिसमे उन्होंने घर से बाहर पैर निकाला था.

उधर राष्ट्रीय राजमार्ग पर बस में बैठी एक बुजुर्ग स्त्री आरजू-मिन्नत कर रही थी कि जाने दो गाड़ी को बाबू. बेटी बीमार है. डॉक्टर के पास जाना है. कुछ और स्त्रियां रास्ता दे देने का अनुरोध कर रही थीं. एक बार गाड़ी का ड्राइवर ने भी हौले स्वर में कुछ कहा. पर उसे डपट दिया गया. फिर डर के मारे उसने कुछ भी नहीं कहा. स्त्रियां अब सब्र कर रही थीं. पीछे एक एम्बुलेंस बड़ी देर से आवाज कर रही थी. उसे न रोकने के बारे में कहा जा रहा था. इस बात से सभी सहमत भी थे. लेकिन एम्बुलेंस के निकलने का रास्ता बने तो बने कैसे. कोई इसके पीछे दिमाग नहीं लगा रहा था. बगल से एक कच्चा रास्ता निकलता था. एम्बुलेंस उसी पर बढ़ गया. लोग देख रहे थे कि हिचकोले खाते एम्बुलेंस धीरे-धीरे बढ़ रहा है.

एनएच पर अब तक कितने लोगों की भीड़ जमा हो गई थी. गाड़ी में बैठे लोग बाहर निकल गए थे. उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था. वे बस इंतज़ार कर रहे थे और खीज रहे थे. आसपास दो चार पुलिस वाले कंधे पर बन्दूक टांगे टहल रहे थे. स्थानीय दुकानदार की आँखें चमक रही थीं. वे बहुत व्यस्त थे.
यह तो आज की मुसीबत की कथा है. राजनैतिक पार्टियों की तरफ से किया जाने वाला राज्य-बंदी में जब सड़क पर चल रहे वाहनों के चक्के को जाम कर दिया जाता है तो इसका सबसे अधिक खामियाजा आमजन को ही उठाना पड़ता है. लेकिन यह इनके लिए कितना पीड़ादायक है, इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि गाहे-बगाहे ये भी इन हरकतों को दुहराने से बाज नहीं आते. अपनी मांगों और किन्हीं आक्रोशों को लेकर अब ये भी सड़क पर उतर आते हैं और वाहनों की गति पर विराम लगा देते हैं. सोचने पर कुछ साफ-साफ समझ में नहीं आता है कि इस पीड़ादायक परंपरा की शुरुआत आमजन से राजनैतिक पार्टियों में गई है या राजनैतिक पार्टियों से यह आमजन के जीवन में आया है. जो भी हो, चक्का-जाम से चिट भी मेरी और पट भी मेरी वाली कहावत ही चरितार्थ होती है. यानी किसी भी सूरत में परेशानी आमजनों को ही उठाना पड़ता है.

हालाँकि आम आदमी को उतना पता नहीं होता है कि कल कौन क्या कर रहा है. वे आज की चिंता में इतने मशगूल रहते हैं कि कई बार दुनिया-जहान की बड़ी बात भी बाद में पता चलती है और कई बार तो कुछ भी पता नहीं चलता है. साधारण आदमी बहुत जरूरी होने पर ही शहर की तरफ का रुख करते हैं. कई बार तो वे शहर जाना टालते रहते हैं. टालते रहते हैं. जब उनके पास बहुत सारा काम इकठ्ठा हो जाता है, तभी निकलते हैं. शहर में जो रहते हैं वे तो रहते ही हैं. इसके अलावे रोज ही एक बड़ी आबादी इस कोने से और उस कोने से शहर का रुख करते हैं. शहर एक जरूरत है. शहर किसी चकाचौंध का नाम नहीं होता बल्कि जीवन की ज्यादातर सुविधाओं के समूह संचयन का नाम होता है. यही कारण होता है कि आम आदमी जो गांव देहात के बाशिंदे होते हैं, जरूरत पड़ने पर अपने बगल के शहर की शरण में जाते हैं और वहां से अपनी समस्या का समाधान करके राजी-खुशी लौट आते हैं. लेकिन कभी-कभी अपनी मांगों के समर्थन में या विरोध-प्रदर्शन में जब चक्का-जाम कर दिया जाता है, जरूरत के लिए घर से निकले आमजन को ही सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है.

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