हिंदू तीर्थ साबित करने की जिद में 2000 साल पुराने सिकलीगढ़ टीले पर मंदिर बनाने की तैयारी

इस बार होली के एक दिन पहले सिकलीगढ़ गया था. इस जगह पाये गये एक प्राचीन स्तंभ को प्रह्लाद का खंबा कहा जाता है और इस साल वहां होलिका दहन का राजकीय समारोह भी शुरू हुआ है. वहां, उस पूरे इलाके को घूमने के दौरान पता चला कि यह क्षेत्र कम से कम दो हजार साल पुरानी विरासत को अपने अंदर छिपाये हुए है. पुरातत्वविद वहां की ईंटों को दो से ढा़ई हजार साल पुराना बताते हैं. मगर जिस टीले से ये ईंटें मिली हैं वहां क्रेन से खुदाई कर मंदिर बनाने की तैयारी चल रही है. आखिर इस अनमोल विरासत के इस तरह के खिलवाड़ की वजह क्या है. इस स्टोरी के जरिये इसे समझने की कोशिश की गयी है.

पुष्यमित्र

आप इस तसवीर में जो ईंट देख रहे हैं, पुरातत्व के जानकार यह जानते होंगे कि यह पुराने जमाने की ईंट है. बौद्ध स्तूपों और उस काल के शिक्षण केंद्रों में अमूमन ऐसी ही ईंट का इस्तेमाल किया जाता रहा है. मगर ये ईंटें पूर्णिया जिले के बनमनखी के पास स्थित सिकलीगढ़ के टीले पर इस हालत में है. दो-चार रोज पहले संभवतः किसी क्रेन ने इस टीले पर नींव की खुदाई की है और कहा जा रहा है कि विश्व हिंदू परिषद इस टीले पर हनुमान जी का मंदिर बनवा रही है.

यह टूटा हुआ स्तंभ जिसे पुरातत्वविद अशोक स्तंभ के वक्त का बताते हैं, उसे स्थानीय लोग प्रहलाद का खंबा मानकर उसकी पूजा करते हैं.

आपको यह जान कर हैरत होगी कि महज तीन माह पहले बिहार विरासत समिति और बिहार सरकार के पुरातत्व विभाग की टीम यहां सर्वे करके गयी है. दिसंबर माह के दूसरे सप्ताह में हुए इस सर्वेक्षण में टीम ने खुद इस बात की संभावना जताई है कि इस टीले के नीचे कोई बौद्ध स्तूप रहा होगा. टीम ने यहां की ईंटों को ढाई हजार साल पुरानी ईंटें बताया है. इसके बावजूद लापरवाही का यह आलम है कि इस टीले पर कोई भी क्रेन से नींव खोद कर मंदिर बनाने की तैयारी कर बैठता है और कहीं कोई कार्रवाई नहीं होती.

दरअसल बनमनखी के सिकलीगढ़ में एक टूटा हुआ स्तंभ काफी दिनों से लोगों को नजर आता रहा है. इसके बारे में स्थानीय लोगों की धारणा है कि यह वह खंबा है जिसे तोड़कर भगवान नरसिंह प्रकट हुए थे. इसी वजह से पिछले कुछ सालों से यहां होलिका दहन का भव्य आयोजन होता रहा है. इस बार तो होलिका दहन के आयोजन को राजकीय समारोह में बदल दिया गया. इसकी वजह थी यहां के स्थानीय विधायक कृष्ण कुमार ऋषि का बिहार का संस्कृति और पर्यटन मंत्री होना. वे अपने क्षेत्र के इस स्थान को पर्यटन के मानचित्र पर लाना चाहते हैं.

सिकलीगढ़ पर मंदिर बनाने के लिए खोदी जा रही नीव

हालांकि उनका यह प्रयास कहीं से गलत नहीं है. इस बात के तमाम सुबूत मिलते रहे हैं कि इस जगह में कोई डेढ़ से दो हजार साल पुराना गढ़ जमीन के अंदर छिपा है और खुद वहां मिले स्तंभ का स्वरूप अशोक स्तंभ जैसा बताया जाता है. पुरातत्व के जानकार और भागलपुर के डीआईजी विकास वैभव भी इस स्थल पर आकर तफ्तीश कर चुके हैं और उन्होंने भी इस स्थल की एक पुरातात्विक स्थल के रूप में पहचान की है. मगर अब सवाल दूसरा है. वहां ज्यादातर लोग इस स्थल को प्रह्लाद की जन्मस्थली के रूप में प्रमाणित और प्रसारित करना चाहते हैं. वे नहीं चाहते कि पुरातत्व विभाग की इसकी खुदाई करे. क्योंकि खुदाई के बाद यह खतरा है कि उक्त स्थल किसी बौद्ध स्तूप या संघ निकले.

होलिका दहन के राजकीय समारोह की तैयारी

संभवतः इसी कोशिश में गढ़ के मुख्यभाग पर विश्व हिंदू परिषद की तरफ से हनुमान मंदिर बनाने की कोशिश चल रही है. इसी वजह से वहां होलिका दहन को राजकीय आयोजित की मान्यता दे दी गयी है, जबकि वहां की सच्चाई जानने में किसी की दिलचस्पी नहीं है. मगर एक पुरातात्विक स्थल की हिंदू तीर्थ साबित करने की कोशिश में वहां के धरोहर के साथ जो खिलवाड़ हो रहा है वह अक्षम्य है.

इस बीच एक और कहानी घट रही है. खुदाई के दौरान यहां एक सिक्का मिला था जो शक पीरियड का था. जिसका जिक्र कई जगह किया जाता रहा है. विकास वैभव ने अपने ब्लॉग साइलेंट पेजेज में भी इस सिक्के का जिक्र किया है. मगर पिछले दिनों वह सिक्का गायब हो गया है. कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि एक सिक्का नहीं पचास से अधिक सिक्के मिले थे. जिसे इस मंदिर की समिति के सदस्यों ने या तो गायब कर दिया या कहीं बेच दिया है. मंदिर के सदस्य कहते हैं कि सिक्का किसी सदस्य की गलती से खो गया है.

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