Power Department ने जिसे दी अरबों की उधारी, वह है एक लाख की पूंजी वाली Company

ज्योतिष कुमार

(jyotish01@hotmail.com)

ऐसा बिहार में ही मुमकिन था. ऊर्जा विभाग ने महज एक लाख रुपये की पूंजी वाली कम्पनी को एक बड़े शहर और आसपास के कुछ प्रखंडों में बिजली आपूर्ति का ठेका दे दिया. कुछ ही महीने में जाहिर हो गया कि इतना बड़ा काम इस छोटी सी कम्पनी के बस की बात नहीं. स्थानीय अधिकारियों ने कई दफा प्रस्ताव भेजा कि कम्पनी का ठेका रद्द कर दिया जाए. मगर सरकार मामले को टालती रही, इस बीच कम्पनी पर सरकार का बकाया बढ़ता गया. जब बकाया तीन सौ करोड़ पहुंच गया तो आपूर्ति में गड़बड़ी का बहाना बना कर कांट्रैक्ट कैंसिल किया गया. अब सवाल यह है कि विभाग की लापरवाही से जो तीन सौ करोड़ की उधारी फंस गयी है, जिसकी वापस की एक फीसदी गुंजाइश भी नहीं है. उसकी भरपाई बिहार सरकार करेगी या विभाग घाटा दिखा कर जनता से इसकी भरपाई करेगा. जानकार तो इसमें भी किसी बड़े घोटाले की बू महसूस कर रहे हैं. मुमकिन है कि इस तीन सौ करोड़ के गोलमाल में कुछ बड़े राजनीतिज्ञ भी शामिल हों.

एक लाख पेड अप कैपिटल, पांच लाख शेयर कैपिटल

यह मामला उसी भागलपुर शहर का है जो पिछले दिनों सृजन नामक अजीबोगरीब घोटाले की वजह से चर्चा में रहा है. उस एक घोटाले की जांच अभी चल ही रही है, इस बीच एक और घोटाले की आहट सुनाई देने लगी है. सवाल बिहार सरकार के ऊर्जा विभाग पर है, जिसने महज पांच लाख शेयर कैपिटल और महज एक लाख पेड अप कैपिटल वाली कंपनी भागलपुर इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी प्राइवेट लिमिटेड को भागलपुर जैसे शहर और आसपास के डेढ़ लाख से अधिक उपभोक्ताओं को बिजली आपूर्ति करने और बिल वसूलने का ठेका दे दिया गया. जब 1 जनवरी 2014 को इस कंपनी को भागलपुर शहर का ठेका दिया गया तो उर्जा विभाग खुद अपनी पीठ थपथपा रहा था कि उसने यह कदम उठाकर बिजली व्यवस्था को प्रोफेशनल बनने की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास किया है. यह कंपनी भागलपुर शहर की बिजली से संबंधित तमाम अनियमितता को दूर कर देगी और 24 घंटे बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करेगी. मगर ठेका जारी करते वक्त किसी ने यह चेक नहीं किया कि जिस कंपनी की असल पूंजी ही एक लाख रुपये है, वह इतना बड़ा काम कैसे करेगी.

काम मिलने से सात महीने पहले बनी थी कंपनी

रोचक तथ्य यह है कि इस कंपनी को भागलपुर शहर का ठेका 2014 में मिला जबकि कंपनी ने भागलपुर इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी प्राइवेट लिमिटेड का नाम 29 मई 2013 को ही रख लिया था, जब कोलकाता में कंपनी निबंधित हो रही थी. उस वक्त कंपनी ने सूचना दी थी कि वह स्टीम एंड हॉट वाटर सप्लाई का काम करती है. इसका मतलब यह है कि कंपनी को सात महीने पहले ही पता था कि उसे भागलपुर में बिजली आपूर्ति और वितरण का काम मिलने वाला है. बहरहाल समय के साथ यह जाहिर हो गया कि कंपनी की रुचि भागलपुर की लचर विद्युत व्यवस्था को दुरुस्त करने में नहीं है. बिजली आपूर्ति न सिर्फ पहले की तरह ही गड़बड़ रही बल्कि और तबाह होने लगी. कंपनी पर आरोप लगे कि पैसे बचाने के लिए वह घंटों बिजली की कटौती कर रही है. इस बीच इसी साल मुहर्रम में एक ऐसी गड़बड़ी हुई जिससे कंपनी की रही सही साख भी खत्म हो गयी. जुलूस के दौरान बिजली काटी गयी थी, मगर अचानक बिजली आपूर्ति शुरू कर दी गयी और चार लोगों की झुलस कर मौत हो गयी.

कंपनी का लेखा-जोखा

बिजली खरीद तो रही थी मगर पैसे नहीं चुका रही थी

हालांकि यह सब कहने की बातें थीं. असल बात है कंपनी साउथ बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड से बिजली तो खरीद रही थी मगर उसकी कीमत का भुगतान नहीं कर रही थी. तीन साल 11 महीने में यह लागत 300 करोड़ पहुंच गयी. दिलचस्प बात यह है कि अभियंताओं ने बार-बार विभाग को चेताया कि उधार बढ़ रहा है और वसूली नहीं हो पा रही है, कंपनी का ठेका रद्द किया जाये. मगर सरकार की तरफ से ढिलाई बरती जाती रही. अगस्त, 2016 में तो रद्द करने की प्रक्रिया भी शुरू हो गयी थी, मगर मामला तब भी टल गया. इस बीच एक बार स्थिति यह भी आयी कि कंपनी की सिक्योरिटी मनी आठ करोड़ रुपये को भी विभाग ने सीज कर लिया. अधिकारी कंपनी के लोगों से डांट-डपट कर लेते मगर न बकाये की वसूली हो पाती, न काम बंद किया जाता. जब इसका फैसला हुआ तब उधार 300 करोड़ पहुंच गया था.

कंपनी के कर्मचारियों को सरकार दे रही नौकरी

और अब जब कंपनी से काम छीन लिया गया है और सरकारी कंपनी ने बिजली आपूर्ति का काम शुरू कर दिया है, तो इस बात की रत्ती भर संभावना नजर नहीं आती कि एक लाख रुपये की पूंजी वाली कंपनी से 300 करोड़ की वसूली हो पायेगी. यही वह मसला है, जहां से इस पूरे मामले में घोटाले की बू आती है. क्योंकि कंपनी ने लोगों को बिजली बिल की अदायगी के मामले में रत्ती भर रियायत नहीं दी है, मगर उसने बिहार सरकार को बिजली की कीमत नहीं चुकाई है. इसके बावजूद अगर कंपनी को मौके मिलते रहे तो उसके पीछे घोटाले और कमीशन का खेल जरूर चल रहा होगा. कंपनी ने अपनी असल पूंजी भी संभवतः एक लाख रुपये इसलिए रखी होगी कि वह उधार खाकर दिवालिया हो जायेगी और माल हड़प जायेगी. दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने भले ही कंपनी का ठेका रद्द कर दिया है, मगर वह उसके 500 कर्मियों की नौकरी बहाल रखने की बात भी कह रही है.

14 दूसरी बड़ी कंपनियों के मालिक हैं बकलीवाल

सरकार अब कानूनी कार्रवाई के जरिये पैसे वसूलने की बात कर रही है, मगर कंपनी की जो हालत है उससे लगता है कि सेफ साइड पहले से तय कर लिया गया है. दिलचस्प है कि कंपनी के दो प्रोमोटरों अमर चंद बकलीवाल और महावीर प्रसाद वर्मा में से एक बकलीवाल 14 अलग-अलग कंपनियों के निदेशक हैं. जिनमें से कई और पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियां हैं. इनमें से किसी कंपनी की असल पूंजी इतनी कम नहीं है. ज्यादातर कंपनियों की पूंजी करोड़ों में है. जैसे उदाहरण के लिए भारत हाइड्रो पावर कारपोरेशन लिमिटेड की असल पूंजी 26 करोड़ 68 लाख बतायी जा रही है. दूसरी कंपनियों की पूंजी भी 20-25 करोड़ से कम नहीं. इसका एक ही मतलब है, वह यह कि घोटाले घपले की नीयत से ही महज एक लाख पूंजी वाली यह कंपनी भागलपुर इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी प्राइवेट लिमिटेड खड़ी की गयी और इसका मकसद ही बिहार सरकार के पैसे हड़प कर जाना था. यह तो जाहिर है, मगर सवाल यह भी है कि आखिर इस फरजी कंपनी को सरकार के पैसे हड़प कर जाने में सरकार का कौन सा बड़ा आदमी मदद कर रहा था? और यह भी कि कहीं इस घाटे की भरपाई भागलपुर या बिहार के बिजली उपभोक्ताओं से बिल बढ़ा कर तो नहीं की जायेगी?

बकलीवाल की कंपनियां

 

 

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