कोई खोया-खोया महसूस कर रहा है, कोई कह रहा है, अच्छा हुआ आदत छूटी

पुष्यमित्र

सुबह सवेरे चाय के साथ अखबार पढ़ना कई लोगों की आदत है. चौबीस घंटे वाले न्यूज चैनल और सोशल मीडिया के इस घनघोर दौर में भी यह आदत छूटती नहीं है. इसके बावजूद कि अखबार इन दिनों सरकार चालीसा में बदल चुके हैं. फिर भी राजधानी से लेकर राज्य के कोने-कोने से खबरों के अपडेट एक साथ यहीं मिलते हैं. भले ही अखबार के 24 पन्ने दो मिनट में पलटे जा सकते हैं, फिर भी अखबार एक आदत की तरह बची हुई है. यह बात तब और गंभीरता से समझ में आया जब दो दिन से राजधानी पटना में अखबार नहीं बंटा.

पिछले दो दिनों से बिहार की राजधानी पटना में कोई अखबार नहीं बंट रहा. कमीशन बढ़ाने की मांग पर सारे हॉकर हड़ताल पर हैं. हॉकरों और अखबार प्रबंधन का झगड़ा अपनी जगह मगर उन लोगों की सुबह मुश्किल से गुजर रही है. हालांकि कई लोग ऐसे हैं, जिन्हें कुछ खास फर्क नहीं पड़ रहा, क्योंकि सोशल मीडिया के जरिये ही उन्हें तमाम खबरें मिल जाती हैं. मैंने आज अपनी फेसबुक वॉल पर यह सवाल पूछा तो अलग-अलग किस्म की प्रतिक्रियाएं हैं.

कुछ लोगों ने साफ तौर पर कह दिया कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, बीबीसी की रिपोर्टर सीटू तिवारी ने तो लिख दिया कि उन्हें समझ नहीं आता कि अखबार छपते क्यों हैं. कैप्टन अभिषेक चंद्रा ने उनका समर्थन किया. प्रभात खबर के साथी अजय कुमार ने कहा कि हमलोग ईपेपर से काम चला लेते हैं. प्रभात खबर के ही एक सीनियर रिपोर्टर दीपक मिश्रा ने लिख दिया, कुछ नहीं. एक अन्य मित्र प्रदीप कुमार ने कहा, अखबारों को बंद हो जाना चाहिए, अखबार का उद्देश्य बदल गया है. विभाकर ठाकुर ने लिखा, अच्छा है, बड़े-बड़े विज्ञापनों के बीच बकवास खबरें पढ़ने की आदत छूट जायेगी. हां, ईनामी कूपन नहीं काट पा रहा हूं. फिरोज मंसूरी ने लिखा, मानसिक थकावट. उलूल-जुलुल बकवास पढने से मुक्ति मिली. टीवी न्यूज देखना लगभग दो वर्ष से छोड़ चुका हूं. मोहम्मद कासिफ युनूस ने लिखा, कुछ खास नहीं, मगर थोड़ा फर्क तो है. सुभाष चंद्रा लिखते हैं, अखबार पढना अब दूर की बात हो गयी है. खबरें अब internet पर मिल जाती हैं. बहुत से युवा अब नेट का सहारा लेते हैं. सुजाता शर्मा ने तो लिख दिया, ओ! नहीं आ रहा है? पता ही नहीं चला।

इस तरह की तीखी और बेबाक टिप्पणियों के बीच बड़ी संख्या में ऐसी टिप्पणियां भी आयीं, जिससे लगा कि अखबार आज भी आदत में शामिल है. फार्मासिस्टों के लिए संघर्ष करने वाले विनय कुमार भारती ने लिखा, अख़बार-अख़बार ही होता है. इंटरनेट, टेलीविजन उसका मुकाबला नहीं कर सकते. स्थानीय खबरें अख़बार ही कवर करते हैं…. लोगों को आदत होती है. वरिष्ठ पत्रकार उदय मिश्रा लिखते हैं, खोया-खोया सा लग रहा है. शशांक चंद्रा लिखते हैं, सुबह-सुबह तो अटपटा सा लगता है पर प्रमुख समाचार सोशल साइट्स पर पढ़ ले रहें. बाकी के न्यूज मिस कर रहे हैं. शशि शैलतारा भूषण लिखते हैं, दिन की शुरुआत कुछ फ़ीकी-फ़ीकी सी हो रही है.

बाल अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले सामाजिक कार्यकर्चा सुरेश कुमार लिखते हैं, अखबार के नहीं होने से अंधेरा महसूस हो रहा है. दिन की शुरुआत डल तरीके से होती है. चंद्रशेखर कुमार लिखते हैं, अख़बार के बिना ज़िन्दगी अधूरी-अधूरी लग रही है. किशोरियों और महिलाओं के बीच काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता शाहीना परवीन लिखती हैं, जिंदगी बेरंग और नीरस लग रही है. कुछ खोया-खोया सा महसूस हो रहा है. रोज अपने साथियों से पूछती हूं-तुम्हारे यहां अखबार आया क्या?

अंत में कमलेश सिंह की टिप्पणी, अभी दस मिनट पहले अपने दोनो हॉकर को रिंग करके पूछे तो दोनो बोला “भैया बीस पचीस रूपिया में आउ केतना दिन मुआईयेगा. ठंडा, गरमी, बरसात सैना नियन हमनीयो तत्पर रहते है. हमनीयो के बाल-बच्चा के पेट आउ पढाई है”
ये सुनकर सच में दिल भर आया.

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One Thought to “कोई खोया-खोया महसूस कर रहा है, कोई कह रहा है, अच्छा हुआ आदत छूटी”

  1. uday mishra

    aaj ki peedhee ko shayad akhbaar ka n aana nahi khale, lekin jinhe bachpan se akhbaar padhne ki aaday hai unhe to akharega hi.