रात में पार्टी, दिन में हनुमान जी, हम तो ऐसे मनाते हैं हैप्पी न्यू इय़र

नवहिंदुवादियों का एक धड़ा पिछले कुछ सालों से चैत्र प्रतिपदा को नव वर्ष के रूप में स्थापित कराने में जुटा है, मगर जो ठेठ हिंदू समाज है वह न जाने क्यों अंगरेजों के नव वर्ष पर मंदिरों में उमड़ने लगता है. आज मंदिरों में जैसी भीड़ है वैसी किसी पर्व त्योहार पर ही दिखती है. यह इस बात की निशानी है कि भले यह अंगरेजों का नया साल हो, यह हमारे खून में पूरी तरह से घुल गया है. पढ़ें इस मसले पर आशुतोष पांडेय जी आरा वाले का आलेख जो उनसे जबरदस्ती लिखवाया गया है…

आशुतोष कुमार पांडेय

धर्मपरायण भारतीय समाज में किसी भी पवित्र कार्य की शुरुआत पूजा-अर्चना के बाद ही शुरू होता है. गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित्र मानस को लिखते हुए सबसे पहले अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छंदों के साथ विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती और देवताओं में गणेश की आराधना किया. उसने लिखने की आध्यत्मिक इजाज़त हासिल कर उन सभी क्रियाओं और वर्जनाओं की भी आराधना की जिनके बारे में उन्हें लिखना था.

भारतीय संस्कृति के अनेक पक्षों में यह एक बहुत सहज़ दृश्य प्रत्येक वर्ष एक जनवरी अर्थात् नये साल के देखा जाता है कि लोग मंदिरों में जाकर पूजा करते हैं. जबकि कुछ दिन पहले से कुछ संगठन इसे भारतीय संस्कृति के विरुद्ध बताकर होली के दिन को नव वर्ष मनाने को कहते है. बहरहाल जो भी हो हम नहीं चाहते कि किसी वर्ष या कार्य में बाधा उत्पन हो. इसके लिए हम भगवान से प्रार्थना करते हैं. जिस दौर में बाजार ने भारतीय समाज को अपने आगोश में लेना शुरू किया तो उसने इंडियन कल्चर और भारतीय संस्कृति में एक बहुत पतली लक़ीर खिंच दी. रात के बारह-एक बजे तक मस्ती कीजिये सवेरे उठकर एक सच्चे भारतीय बतौर मंदिर जाना है.

आशुतोष कुमार पांडे आरा वाले

वह बात भाड़ में गयी कि यह भारतीय हिन्दू वर्ष नहीं है. हमारी पहले दिन की शुरूआत अच्छी होनी चाहिये. अच्छी तब होगी जब आप पूजा पाठ कीजिये. अभी सवेरे नहा-धोकर जब रमना वाले हनुमान जी पास गया तो प्रत्येक साल की भांति इस वर्ष भी हर-कीर्तन हो रहा था. इसके अलावा पूरे आरा भर के लोग तमाम विचार-धाराओं के लोग भी दिखे. चाहे कोई भी विचार धारा और मान्यता हो मगर किसी को भी अपवित्रता उससे अलग नहीं किया जा सकता. सबको शिष्टाचार पसंद है. तो नव वर्ष पर मंदिर जाना एक शिष्टाचार का हिस्सा हो गया है. इसको भारतीय समाज ने आत्मसात कर लिया है.

लेकिन इसमें आपको देखना होगा कि सभी मंदिरों में लोग पूजा करने नहीं जाते. कुछ प्रभावशाली मंदिर ही इसके हिस्से में आते हैं. आसपास नज़र दौड़ाने पर सबकुछ दिख जायेगा. आरा रमना मैदान के पास दो हनुमान मंदिर है. जो रमना मैदान में हनुमान मंदिर स्थित है, उसमें अधिक भीड़ होती है जबकि जो मंदिर बाहर है उसमें एक-आध लोग गाहे-बगाहे आ जाते है. जबकि दोनों एक-दूसरे के रास्ते में पड़ते है. मतलब मंदिरों में पूजा-अर्चना के साथ उसके प्रभाव को भी जानना समझाना होगा. भले ही हम किसी कार्यक्रम के अंत में यह कह कर संतोष कर ले कि अंत भला तो सब भला. लेकिन शुरुआत धाकड़ होनी चाहिए.

अपने मित्र और क्लास फ़ेलो अखिलेश से जब मैंने पूछा कि आप आज मंदिर क्यों गए थे. उनका जवाब था कि हम किसी चीज के शुभ शुरुआत से ज़्यादा अशांति की आसन्न आशंकाओं से ग्रसित रहते हैं. उन्हीं से निपटने की अचेतन अवस्था में हम मंदिर का रुख करते है. एक अन्य मित्र सुमन कुमार सिंह से चर्चा में बताया, हमें नहीं पता कि किसी चीज का सेलिब्रेशन कैसे करे करे. और नव वर्ष के सेलिब्रेशन का ठीक-ठीक कोई फार्मूला या विधि-विधान नहीं है. जैसा कि अन्य आयोजनों में होता है. इसलिए इसकी शुरुआत मंदिर जाने से हो गयी. इसके अलावा घरों में विशेष पकवान भी बनता है.

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