किसानों के धान बिक गए, सरकार अभी खरीदने की योजना ही बना रही है

यह हर साल की कहानी है, हर साल बिहार सरकार कसम खाकर कहती है कि वह बिहार के किसानों का एक-एक दाना धान न्यूनतम समर्थन मूल्य देकर खरीद लेगी. मगर हर साल वह खरीदने में इतना वक्त लगा देती है कि किसान मजबूर होकर औने-पौने दाम में अपनी उपज स्थानीय व्यापारियों को बेच दे. फिर शुरू होता है कमीशन का खेल. व्यापारी कमीशन देकर किसान बन जाते हैं और पैक्स वाले उनका धान समर्थन मूल्य पर खरीद लेते हैं. इस बार भी यही कहानी है औऱ इस कहानी को विद्रोही अपने गांव हसपुरा में घट रही घटनाओं को समेटते हुए बता रहे हैं.

विद्रोही

सरकार आंकड़ों में खूब विकास दिखाती है और जनता फिर भी पथराव करती है. यह विरोधाभास क्यों? आंकड़े और हकीकत के अंतर को समझने के ढेरों उदाहरण हैं. एक यह उदाहरण भी देखिए.

औरंगाबाद के हसपुरा प्रखंड के किसानों के पास भी बकी जगह की तरह मोबाइल पर सरकारी मैसेज आया था कि एक दिसंबर से धान की खरीद होगी. परंतु अभी तक धान का क्रय ही नहीं शुरू हुआ है. किसी किसान के पास ऐसी व्यवस्था नहीं होती कि वह एक-दो सप्ताह से अधिक धान का भंडारण कर सके. खेतों से खलिहानों में धान नवंबर से ही आने लगा था, लेकिन खरीद की सरकारी घोषणा सरकारी ही साबित हुई. किसानों ने कड़ी मेहनत से पैदा की हुई अपनी उपज मजबूर होकर बिचौलियों को माटी के मोल बेच दिया. दूसरी ओर, अधिकारी और सहकारिता विभाग कारण गिनाकर इस मामले को ही लगभग भूल चुके हैं. किसानों का आरोप है कि सहकारिता विभाग और प्रखंड के अधिकारी बिचौलियों के दबाव  में खामोश हैं और ऐसा ही हर साल होता है.

प्रखंड में करीब 9500 हेक्टेयर में धान की खेती हुई है. धान की बेहतर पैदावार देखकर किसानों के चेहरे खिल उठे थे. अनुमानित तौर पर करीब 5.13 लाख क्विंटल धान की उपज हुई. सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य 1700 रुपये रखा. साथ में यह भी बताया कि खरीद एक दिसंबर से शुरू हो जाएगी और 48 घंटे के अंदर भुगतान हो जाएगा. रैयतों से 200 क्विंटल तक और गैर रैयतों से 75 क्विंटल तक की खरीद करने की बात कई गई थी. किसान अपनी आमदनी को लेकर योजना बनाने लगे थे.

परंतु, अब किसानों के चेहरे पर खुशी की जगह मायूसी, दर्द आौर आक्रोश है. कुछ दिन तक तो किसानों ने क्रय केंद्र खुलने का इंतजार किया, लेकिन जब कोई हरकत नहीं दिखी तो उनकी बेचैनी बढ़ने लगी. स्थानीय किसान जब प्रखंड कार्यालय में जानकारी लेने पहुंचे तो वहां से उन्हें डांट-फटकार कर भगा दिया गया. हाथ जोड़कर और गिड़गिड़ाकर वोट मांगने वाले पैक्स अध्यक्षों ने भी उन्हें झिड़क दिया.

किसानों की इस स्थिति का फायदा उठाया बिचौलियों ने. उन्होंने 1700 की जगह मात्र एक हजार रुपये की दर से धान खरीदना शुरू कर दिया. इसमें पैक्स अध्यक्षों की भी मिलीभगत है. किसानों के पास कोई और चारा नहीं था. बताया जा रहा है कि प्रखंड के करीब 98 फीसदी किसान अपना धान बिचौलियों को बेच चुके हैं और अधिकारी अभी क्रय केंद्र खोलने की योजना ही बना रहे हैं.

पैक्स अध्यक्षों की सफाई है कि अभी तक सीसी नहीं हुआ है. प्रखंड कार्यालय के सूत्रों का कहना है कि बिचौलियों से ही 1700 की दर से धान खरीदकर किसानों से खरीद दिखा दिया जायेगा. इस तरह सरकारी आंकड़ों में किसानों से खरीद पूरी हो जाएगी. ऐसा ही करीब हर साल किया जाता है. किसान धान बेच चुके हैं और प्रशासन अभी खरीदारी की तैयारी में है. आंकड़ों में तो हर साल की तरह किसानों से लाखों क्विंटल धान न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद दिख ही जाएगी, लेकिन किसान तो पत्थर बरसाने वाली हालत में ही रह गए न?

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