जब पुरानी किताबों से धूल झाड़ने के लिए डस्टर नहीं है तो नयी किताबों की जरूरत क्या है

पिछले दिनों बिहार कवरेज में 500 पुस्तकालयों के बंद होने की खबर आयी तो बहस का सिलसिला बन गया. इस बहस के बीच कुमुद सिंह के एक मार्के का सवाल पेश किया है. जब बड़े-बड़े पुस्तकालयों में बहुमूल्य किताबों पर पड़ी धूल झाड़ने में समाज की रुचि नहीं है, पाठकों का इन्टरेसट नहीं है तो नयी किताबें क्यों खरीदे जायें. इस तीखे सवाल का सामना तो करना ही पड़ेगा.

कुमुद सिंह

पिछले दिनों एक खबर पढ़ी कि बिहार सरकार के पास किताब खरीदने के लिए राशि नहीं है. सरकार से पैसे नहीं मिलने के कारण एक दो नहीं बल्कि पांच सौ पुस्तकालय बंद हो गये. मुझे इस खबर को पढ़ कर पत्रकार हेमंत की याद आ गयी. हेमंत जी ने एक सम्मेलन में कहा था कि उस समाज में पुस्तकालय होने का क्या मतलब था जहां तीन वर्षों तक किताबें जलती रहीं और कोई एक पुस्तक नहीं बचा पाया.

फेसबुक पर कुमुद सिंह जाना पहचाना नाम है. मिथिला, महिला और बिहार के सवालों पर वे लगातार तीखे सवाल पेश करती हैं. ई-समाद नामक ई-पेपर का संपादन करती हैं.

बिहार एक बार फिर उसी सवाल पर आ खड़ा हुआ है. अकेले दरभंगा के दो पुस्तकालय में पिछले दो दशकों में सौ साल से अधिक पुरानी 35 हजार से ज्यादा पुस्तकें नष्ट हो चुकी हैं या चोरी कर ली गयीं हैं. किसी को इन पुस्तकों को सहेजने की जरूरत महसूस नहीं हुई. कोई यह पूछने का साहस तक नहीं कर पाया कि इतनी बड़ी संख्या में किताबें कैसे नष्ट हो गयीं. इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं. उसे बचाने का कौन सा प्रयास किया गया. आगे किताबें नष्ट न हों इसके लिए क्या प्रयास हो रहे हैं. दरअसल हालात इतनी बदतर हो चुकीं हैं कि कोई ये तक बताने को तैयार नहीं है कि क्या नष्ट हो गया.

जब तमाम पुस्तकालयों में किताबों पर से धूल हटाने के लिए डस्टर नहीं हैं, तब नयी पुस्तकों की जरूरत किसे महसूस हो रही है. जब गणित और राजनीतिक शास्त्र के शिक्षकों के पास पुस्तकालयाध्यक्ष का अतिरिक्त प्रभार है, तो नयी पुस्तकों की खरीद कौन करेगा. जब राज्य के तमाम पुस्तकालयों में पुरानी किताबें सड़ रही हैं, तो नये किताबों की खरीद पर यह शोर कौन मचा रहा है.

यह खबर सही है कि सरकारी आवंटन बंद होने से किताब खरीद बंद है. लेखक और प्रकाशक परेशान हैं. अधिकारी दुखी हैं. कमीशन का खेल बंद है. दरअसल, बिहार के पांच सौ पुस्तकालय देखरेख की कमी के कारण बंद हुए हैं. बिहार में पुस्तकालय आज भी बहुत समृद्ध हैं. नयी पुस्तकों से ज्यादा पुरानी पुस्तकों को बचाने, सहेजने और पढऩे की जरुरत है, जिसकी न उम्मीद दिख रही है ना कोई प्रयास ही नजर आ रहा है.

आज बिहार सरकार के तमाम अकादमी और पुस्तकालय में स्थायी अध्यक्षों के पद खाली हैं. मैथिली अकादमी से लेकर बिहार रिसर्च सोसायटी तक प्रभार में चल रहा है. केपी जायसवाल शोध संस्थान की पुस्तकें तो किराये के गोदाम में सड़ रही हैं. संस्थान में कितने कर्मचारी हैं यह भी एक यक्ष प्रश्र बन चुका है. खुदाबख्श हो या सिन्हा लाइब्रेरी सभी जगहों पर समस्या किताबों की देखरेख की है न कि नये किताबों की उपलब्धता का है. जो किताबें हैं उन्हें सहेजनेवालों  की कमी है. ऐसे में नये किताबों की खरीद नहीं होने का रोना कौन रो रहा है ये समझा जा सकता है. कम से कम पाठक तो नहीं.

दरभंगा के लक्ष्मीश्वर सार्वजनिक पुस्तकालय में बहुमूल्य किताबों की स्थिति

इतिहास देखने पर पता चलता है कि नालंदा विश्वविद्यालय के अवसान के बाद एक मिथिला विश्वविद्यालय का जिक्र कुछ विद्वान करते हैं, लेकिन उसकी समृद्धता का कोई प्रमाण अब तक नहीं मिला है. ऐसे में संगठित पुस्तकालय का इतिहास 19वीं शताब्दी में ही मिल रहा है. 20वीं शताब्दी के शुरुआत में पुस्तकालय स्थापित करने की परंपरा सबसे अधिक मिलती है. पुस्तकालय और वाचनालय परंपरा बिहार खास कर उत्तर बिहार के गांव-गांव तक देखने को मिलती है. कोई ऐसा समृद्ध गांव नहीं था जिसमें एक पुस्तकालय न हो. कई पुस्तकालयों के पास तो आधारभूत संरचना और धन की भी पुख्ता व्यवस्था है.

1886 में दरभंगा महाराज ने बिहार का सबसे पुराना पुस्तकालय दरभंगा में स्थापित किया जिसमें 8वीं और 9वीं शताब्दी से संग्रहित पांडुलिपियों और पुस्तकों को संग्रहित करने का प्रयास किया गया. डॉ सर गंगानाथ झा ने इस पुस्तकालय के माध्यम से बिहार में पुस्तकालय की परंपरा को पुनर्जिवित करने का काम किया. बाद में इस पुस्तकालय के पांच किस्से हुए. इसके किसी हिस्से को देखने के लिए आज स्थायी पुस्तकालयाध्यक्ष नहीं हैं.

ऐसा बिहार में पुस्तकालय विज्ञान की पढ़ाई नहीं होती है, लेकिन राज्य के बड़े पुस्तकालय भी प्रभारी अध्यक्ष के भरोसे चल रहे हैं. ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के पुस्तकालयाध्यक्ष गणित पढ़ानेवाले आरबी ठाकुर हैं. इसके पहले इस पुस्तकालय की जिम्मेदारी राजनीतिक विज्ञान के शिक्षक अनिल कुमार झा के पास थी, जिन्हें आज कल 1929 में स्थापित लक्ष्मीश्वर सार्वजनिक पुस्तकालय का जिम्मा मिला हुआ है. लक्ष्मीश्वर पब्लिक लाइब्रेरी, दरभंगा की स्थापना महारानी लक्ष्मीवती ने की थी. शंकरपुर इस्टेट (मधेपुरा) के जमींदार बाबू जनेश्वर सिंह ने 20 हजार पुस्तकों का अपना निजी संग्रह इस पुस्तकालय को दान किया था. यहां दो दशकों में 15 हजार से अधिक पुस्तकें पानी में डूब कर सड़ गयीं. बिहार का सबसे पुराना बाल पुस्तकालय भी इसी परिसर में था जो वर्षों पहले बंद हो गया. आज इस पुस्तकालय का परिसर कारोबारी गतिविधियों के लिए होता है.

यह एक उदाहरण मात्र है. ऐसे कई उदाहरण हैं, सीतामढ़ी के हुमायूंपुर गांव का पुस्तकालय भी दुर्दशा का शिकार है, उपेक्षित है. वैसे मधुबनी जिले के लालगंज स्थित यदुनाथ पुस्तकालय ने एक नजीर जरूर पेश की है जहां ग्रामीणों ने न केवल पढऩे की सूखती धार को अविरल किया है बल्कि किताबों की संख्या में भी यहां लगातार बढ़ रही है. यदुनाथ पुस्तकालय जैसा सार्वजनिक पुस्तकालय बताता है कि पुस्तकालय को बचाने के लिए नयी पुस्तकों की नहीं, पुरानी पुस्तकों को पढऩे की जरूरत है, सबसे बड़ी बात पुस्तकालय में जाकर पढऩे की जरूरत है. पुस्तकालय का सन्नाटा ही उसकी मौत का एक मात्र कारण है.

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